भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिसागरवर्णन । ४७७
दरियावाहिद लामका, बाजत अनहद बीन ।
सकल चरण फ़रज़न्दना, नाहीं संग ताबीन ॥
दीद शुनीद जहां नहीं, तहां न काल न हाल ।
जौहर जिसम इसम नहीं, चरणदास नहिं काल ॥
बुरी सिफ़ारश यामिनी, और सगाई होय ।
चरणदास यों कहत है, भूलकरो मति कोय ॥
कवित्त ॥
काहेको भक्तपै समान हैं बगलेको ध्यान तो लगायो है
मीनके पचावनको । भीतर और विषय वास चरणदास बाहर
तिलक छापेकिये जक्तके दिखावनको ॥ हरिके गुण गावनको
रसना रिसात अधिक मनतौ हुलास वाद निन्दा के बढ़ावन
को । बहुत बात सीखराखी लोक और बड़ाई को काया नाहिं
शोधी एक रामजी के पावनको ॥ यह है काल तामें विकराल
जहां चरचा गोपाल जाकी निन्दाकरें जानिकै । जोई करै भक्त
जाकूं दुष्ट बहु नामधरैं वचन कुवचन कहैं क्रोध मन आनिकै ॥
देखें अब जायगों तू परम वैकुण्ठही कूं बड़ो भयो साधु माला
धारि तिलक ठानिकै । ऐसे दुष्ट नीचन कि बात नहिं मानिये
जू कहैं चरणदास सबै पापी नरक खानिकै ॥ आप बड़े
नीच करतूति करें नीचनकी नीचनको संग जिन्हें भावै उत्पात
है । रामनाम सुनतहिये लागतहै आगि जान कोऊ करै भजन
ताहि देख जरजात है ॥ खोंटेभये आपकहें औरनकूं खोंटे वै
तो महामोटे पापी माया माहिं इतरात है । साधन के निंदक
सुतौ परेंगे नरकमांझ कहैं चरणदास दुख पावैं बहुभांति है ॥
दो० चरणदास हितसों कियो, ग्रन्थ अनेक प्रकारं ।
अष्टादश अरु चारको, काढ़लियो ततसार ॥