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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 529, कुल 690 में से

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पृष्ठ 529

छींको किन्हूं तराक दे, देखो भई संकारेही कांक ॥
हमहूं जब घरतें चले, सुगन भयो बन माहिं ।
तुमसों भेंट भई अबे, हम लूट दही सब खाहिं ॥
ऐंचातानी जिन करो, टूटैं मोती हार ।
छूटैं लर बिखरैं धरन, फिर बीनत होय जंजार ॥
दाऊ की सों खातहूं, बिन लिये जान न देउँ ।
टूटे तो लूटैं सखा, मैं तो गोरस को रस लेउँ ॥
रसको चसको जो परो, मसको घर क्यों न खाव ।
छोटे अति खोटे महा, कहा सीखे करन चवाव ॥
हमरे तो यही नेम है, तुमसों कह्यो सुनाय ।
प्रेम प्रोति की रीति को, रस कैसें छांड़ो जाय ॥
चरणदासि है चरण की, मान लेउ घनश्याम ।
काहूविधि छाड़ो हमें, करजोर करें परनाम ॥
क्योंहूं जान न पावहो, अहो सयानी नार ।
चरणदासि कहे लालजू, ऐसे बोले बचन संभार ॥
बातें कहा बनाय के, कविता करत बखान ।
हा हा अब घर जानदै, मेरे प्यारे चतुर सुजान ॥
हा हा खा कैसैं छुटौ, छांडू नाच नचाय ।
देखूं तो कैसो जम्यों, नेक दीजे दही चखाय ॥
उठ बोली एक ग्वारिनी, भौंह मटक मुसकाय ।
पीवो गोरस पेट भर, तुम दोऊ कर ओकबनाय ॥
बैठ ऊकड़ू चावसों, कीनी ओक बनाय ।
पीवन की इच्छा करी, मनमें अतिही ललचाय ॥
मटकीसों डहकाय के, गुंठा दियो दिखाय ।
कहो स्वाद बतलाइये, कछू मीठो है मनभाय ॥