भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौपाई ॥
संवत सत्रह सै इक्यासी । चैत सुदी तिथि पूरणमासी ॥
शुक्लपक्ष दिन सोमहिवारा । रच्यों ग्रन्थ यों कियो विचारा ॥
तबहीं सूं अस्थापन धरिया । कछुकबानी वादिन करिया ॥
ऐसेहि पांच हजार बनाई । नाम गुरू के गंगबहाई ॥
फिर भइ बानी पांचहजारा । हरिके नाम अगिनिमें जारा ॥
तीजे गुरु आज्ञा सो कीन्हीं । सो अपने साधुन को दीन्हीं ॥
अद्भुतग्रन्थ महा सुखदाई । ताकी शोभा कही न जाई ॥
तामें ज्ञानयोग वैरागा । प्रेमभक्ति जामें अनुरागा ॥
निर्गुण सगुण सबही कहिया । फिर गुरुचरणकमल में रहिया ॥
जोकोइ पढ़िपढ़ि अर्थ विचारै । आप तरै औरन को तारै ॥
ना मैं किया न करने हारा । गुरु हिरदे में आय उचारा ॥
चरणदास मुखसों शुकदेवा । आन कहे चारोही भेवा ॥
दो० जल घृतसूं रक्षा करौ, मूरख हाथ न देव ।
ढीलौ कर नहिं बांधिये, ग्रन्थ कहत यह भेव ॥
सम्प्रदाय शुकदेव मुनि, चरणदास गुरु द्वार ।
परमधर्म भागवत मत, भक्ति अनन्य विचार ॥
पद ॥
जय जय राधे कृष्ण मुरारी, जय जय व्यास सकल गुनगुनी ।
जय जय महाबिदेह जनकजी, श्रीशुकदेव अवतार मुनी ॥
इनको नामरटे निशिवासर, जीभरहै हरिभक्ति सनी ।
चरणदास सुख बास लहै, नित पास रहै यही आसबनी ॥
इति श्रीचरणदासजीकृत भक्तिसागर सम्पूर्णम ॥