भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 520, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीः ॥
श्रीशुकदेवाय नमः ॥
अथ श्रीचरणदासजीकृत जागरणमाहात्म्यं
प्रारभ्यते ॥
छप्पै ॥
प्रथम सुमिरि गुरु चरण बहुरि सुमिरूं हरि चरणा ।
गुरु कूं करूं प्रणाम आय साधों की शरणा ॥
गुरु किरपा सों हिरदै ज्ञान और बुधि परकाशे ।
गुरु किरपासों तिमिर अज्ञान दुरमत सब नाशे ॥
गुरु शुकदेव के चरण चित्त सदा सर्वदा राखिये ।
कहै चरणदास आधीनहो जु दुबिधा मनकी नाखिये ॥
दो० अब मैं विनती करतहूं, श्री सतगुरु महराज ।
दयाकरो आधीन पर, मो सिरके सिरताज ॥
तनमन निवछावर करूं, दोउ कर लेउँ वलाय ।
चरणदास शुकदेव के, चरणन पै बलिजाय ॥
तिमि अज्ञान मेरो हरो, ज्ञान देउ प्रगटाय ।
कृपाकरो मों पतित पै, रहूं चरण लिपटाय ॥
तुमसों दाता और को, जाहि नवाऊं शीश ।
मनसा वाचा कर्म करि, तुमहीं मेरे ईश ॥
शुकदेवगुरु सुनलीजिये, मोकूं करो सनाथ ।
ज्ञानभक्ति जासे बढ़े, सो कहिये हो नाथ ॥
गुरुबचन ॥
दो० सुनो शिष्य अबकहतहूँ, अद्भुत कथा पुनीति ।
निहचे ताके सुनेतें, बढ़े भक्ति और प्रीति ॥
एक समय श्रीकृष्णसों, कहत युधिष्ठिर राव ।