भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 522, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंजागरणमाहात्म्य । ४८१
ताल मृदंग झांझ मुरलीधुन । शब्द करत गावे मेरे गुन ॥
प्रेम मगनसों नृत्य जु करै । मेरे चरण कमल चित धरै ॥
मैंहूँ वा सँग-गावन लागूं । नृत्य करूं वाहूतें आगू ॥
दो० श्रीभागौत की कथाकूं, जो मनसूं सुनलेह ।
कोटि जनम के पाप सब, हरिहौं निस्सन्देह ॥
चौपाई ॥
अब सुन याकी महिमा जेती । तेरे हित भाषतहूं तेती ॥
एक भक्त के नेम यहौ थो । व्रत इकादशी नित्य करै थो ॥
पूजाकी विधि सबही करिके । नेम धरम चित माहीं धरिके ॥
साधुन की सेवा अति करतो । मेरे चरण ध्यान मन धरतो ॥
भली भांतिसों व्रत करिके तब । जात हुतो जागरण माहिं जब ॥
दो० व्रत इकादशी नित करै, सुनै कथा मन लाय ।
रैन बितावे प्रीति सों, मेरेई गुण गाय ॥
चौपाई ॥
एक समय मारग के माहीं । ठाढ़ौ हुतो दैत्य बलबाहीं ॥
महाभयानक घोर सरूपा । ओड़ो मुख ज्यों अन्धो कूप ॥
बड़ी भुजा दोउ सूंड समाना । सन्मुख भक्तकि कियो पयाना ॥
दो० जात उतैं वा भक्तकूं, भई दैत्य सों भेंट ।
भली भई तू मोहिं मिल्यो, अब तोहिं लेउँ लपेट ॥
चौपाई ॥
दौरद्यो कूदि मारि किलकारी । हाथ चलाय थापकी मारी ॥
थाप दुष्ट की निष्फल गई । देह भक्त की निर्मल भई ॥
बहुरि क्रोध करि ठाढ़ो रह्यऊ । मुख पसारि फिरि ऐसे कह्यऊ ॥
मैं अब तोकूं जान न दैंहूं । भूखो बहुत बेगि तोहिं खैंहूं ॥
भक्त कहै सुन दैत्य भाई । तू या बनसूं कहूं न जाई ॥
मेरो नेम आज तू राख । भोर आयहूं हरि साख ॥