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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 531, कुल 690 में से

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पृष्ठ 531

श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ श्रीचरणदासजी कृत माखनचोरी
लीला वर्ण्यते ॥
एक समय गोपाल ग्वालसंग लेकर धाये ।
ग्वारिन गइ जल भरन देख सूने घर आये ॥
छींके पै माखन धरो लीनो ताहि उतार ।
तबही ग्वारिन आय के पकरे कृष्ण मुरार ॥
अचरज गाइए तुम सुनियो सन्त सुजान ।
तब गहलीनै श्याम चली ग्वारिन यशोदा पै॥
सखी और द्वे चार मिली संग भई जु ताके ।
बहुत दिनों चोरी करी आजही आये हाथ ॥
घुलचा देकर यों कह्यो अब क्यों न भाजो नाथ ।
अचरज गाइये तुम सुनियो सन्त सुजान ॥
हांते चली तुरत बेग माता पै आई ।
तेरो मोहन चपल जु ब्रज में धूम मचाई ॥
एक कहै मेरे घर धस्यो माखन दियो लुटाय ।
एक कहै मेरे शीशतें गागर दई ढरकाय ॥
अचरज गाइये तुम सुनियो सन्त सुजान ।
एक कहै गहि चीर हार हियेतें मेरो झटको ॥
एक कहै दधि माठ चाट धरती पर पटको ।
एक कहै मोहि घेरके दान लगावे आय ॥
तेरो मोहन ढीठ है बरज यशोदा माय ।
अचरज गाइयं तुम सुनियो सन्तसुजान ॥
तब श्रीमोहनलाल मतो मनमाहि विचारो ।
उनको मन लियो खैंच कछू टोना पढ़ डारो ॥