भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हो हरि अपनी कृपासों, कछु इक कथा सुनाव ॥
राजासों श्रीकृष्ण ने, जो कछु कह्यौ बनाय ।
सो अब तोसूं कहतहूं, सुनो शिष्य चितलाय ॥
अथ युधिष्ठिर के बचन श्रीकृष्णसों ॥
चौपाई ॥
हो हरि मैं पूछतहूं तोहीं । संशय वेगि मिटावो मोहीं ॥
मोहिं जागरण महात्म सुनावो । मेरे पूरण पाप मिटावो ॥
मैं मतिहीन भक्ति नहि जानूं । संसारी के सुख मैं मानूं ॥
निशिदिन कुटुँव जालमें पाग्यो।हरिकीरतन चित नहिंलाग्यो॥
मंगल छन्द ॥
लागै न चित छिन एक मेरो भक्ति प्रभु कैसे बने ।
निशि दिन वृथा संसार सुखकूं मानिकै जिय आपने ॥
दो० कुटुँव जाल के कारनैं, भ्रमत फिरूं चहुँ देश ।
एकघड़ी हरि भजनमें, नाहिं कियो परवेश ॥
श्रीभगवान् के बचन राजासों ॥
चौपाई ॥
सुन राजा अब तोहिं सुनाऊं । तेरे हित याकी विधि गाऊं॥
ग्यारसिको व्रत जबहीं लीजे । करिये व्रत जागरण करीजे ॥
जादिन करे सोई फलदायक । हरिकीर्तन सबतें सुखदायक॥
कोटि एकादशिको फललागै । पाप मिटै जो वा दिन जागै ॥
मैं प्रसन्नहो दरशन दैहों । आवागवनको दुःख मिटैहों ॥
दो० इक मन शुधचित होयके, सुन राजा सुज्ञान ।
ताके सरवन करतही, दूर होय अज्ञान ॥
चौपाई ॥
आप जगै अरु सबन जगावे । मेरे कौतुक अरु गुन गावे ॥