सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

४७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भन चरणदास चारों मुक्ति सो हाथ जोरि पायँनपरै ॥
मूल कमल में खेलि पिया कूं देखन चलिये ।
उलटि वेद षटचक्र जाइ सतवैंसे मिलिये ॥
प्राण अपान मिलाय राह पश्चिमकी लीजै ।
बंक नाल करि शुद्ध प्राण लै तामें दीजै ॥
मेरु दण्ड चढ़िजाय जब लोक लोक की गम परै ।
भन चरणदास ब्रह्माण्ड में ब्रह्मदर्शी दर्शन करै ॥
दोहा ॥
चरणदास यहि बिधिकही, चढ़िवे को आकास ।
शोधि साधि साधन अगम, पूर्ण ब्रह्म विलास ॥
छप्पै ॥
दल असंख्यको कमलरूप जहाँ सत्त बिराजै ।
अनंत भानु परकाश जहाँ अनहद धुनि गाजै ॥
सुन्दर छबि अति हंस सन्त जन आगे ठाढ़े ।
जहाँ पहुँचै कोइ शूरबीर नीशान जो गाड़े ॥
कमल मध्य जो तख्तहै सोभा अपार बरणूं कहा ।
कहैं चरणदास उसतख्तपर आदिपुरुष अद्भुतमहा ॥
छत्र फिरत नित रहत चँवर ढोरत जहँ हंसा ।
जहाँ दरशन कर शिष्य मिटै युग युगका संसा ॥
आवागमन है रहत मरण जीवन नहिं होई ।
आनि मिले जब चार मुक्ति कहियत है सोई ॥
जहाँ अमरलोक लीला अमरफल अनेक तहाँ पावई ।
भन चरणदास शुकदेव बल सु चौथापद इमि गावई ॥
जहां चन्द नहिं सूर जहां नहिं जगमग तारे ।
जहां नहीं त्रयदेव त्रिगुण माया नहिं लारे ॥

भक्तिसागरवर्णन । ४७१
जहाँ वेद नहिं भेद जहाँ नहिं योग यज्ञ तप ।
जहाँ पवन नहिं धरणि अगिनि नहिं जहाँ गगन अप॥
अरु जहाँ रात नहिं दिवस है पाप पुण्य नहिं व्यापई ।
आदि अन्त अरु मध्य है कहैं चरणदास ब्रह्म आपही ॥
जहाँ काल नहिं ज्वाल भर्म नहिं तिमि उजारा ।
जहाँ राग नहिं द्वेष जहाँ नहिं कर्म अचारा ॥
जहाँ काम नहिं क्रोध लोभ नहिं मोह नरेशा ।
जहाँ मित्र नहिं शत्रु जहाँ नहिं देश विदेशा ॥
अरु चरणदास इक ब्रह्म है और न दूजा कोइ तहाँ ।
भया जीव सों ब्रह्म जब योग युक्ति पहुँचे जहाँ ॥
जहाँ आतम देव अभेव सेव कबहूं न करावै ।
इच्छा दुई न द्रोह कर्म नहिं भर्म सतावै ॥
जहाँ जाप थाप नहिं आप तहाँ नहिं रूप न रेखा ।
जासु जाति नहिं पांति नारि नहिं पुरुष विशेखा ॥
अरु पारब्रह्म पूरणसदा है अखण्ड नहिं खण्डिता ।
भनै चरणदास ताड़ीलगै सो शून्य शिखरमें मण्डिता॥
चौपाई ॥
ब्राह्मण सो जो ब्रह्म पिछानै । बाहर जाता भीतर आनै ।
पांचौ बशकरि झूठ न भाखै । दया जनेऊ हिरदय राखै ।
आतम विद्या पढ़ै पढ़ावै । परमातम का ध्यानलगावै ॥
काम क्रोध मद लोभ न होई । चरणदास कहैं ब्राह्मण सोई ॥
छप्पै ॥
हुतो आपमें आप सृष्टि नहिं देत दिखाई ।
ज्यों पाला जलमाहिं धरणिपर लीक लिखाई ॥
३२

४७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भांड़े माटी माहिं कनक में भूषण राजैं।
तरवर बीरजमाहिं यथा फलफूल बिराजैं ॥
गुण रूप नाम सब ब्रह्म में ॐकार तासूं भई ।
चरणदास शुकदेव सो वही ब्रह्म माया वही ।
पांचतत्त्व तेहि माहिं तीनगुण जुदे न होई ॥
चित बुधि इन्द्री तहाँ पाप अरु पुण्य समोई ।
विष अमृत तेहि माहिं भूत अरु देव मुनीश्वर ।
फूल शूल तेहिमाहिं यमन अवतार ऋषीश्वर ॥
चरणदास शुकदेव भज ये सबदरशै दृष्टिअव ।
निराकार निरगुणकहत भूले भटके लोग सब ॥
सवैया ॥
जैसे जल में जलकुंभ बसै जल भीतर बाहर पूरिरह्यो है ।
तैसे जलमें जल पाला बँध्यो जब फूटिगयो जल आप भयो है ॥
ऐसे जगमें वह व्यापरह्यो किनहूं कर लोचन नाहिं गह्यो है ।
चरणदास कहैं दुइ दूरि करो सगरो जग एकहिडोरि गुह्यो है ॥
जैसे पट मैलकी संग कियो जु गयो सब श्वेत भयो तनकारो ।
श्यामस्वरूप अकाश भयो जब धूम धुवांजो भयो भौ भारो ॥
माया पिशाचिको संग कियो जब नीचभयो करता करतारो ।
शुकदेव कहैं दुइ दूरकरो चरणदास सभी इकसूत निहारो ॥
कवित्त ॥
दीसत न वारपार पूरि रह्यो जगतसार ऐसोही अटल नेक
टारो न टरत है। ताको तौ नहिं नाश ठौर ठौर रह्यो भास जैसे
रहत पुष्प वास पासही रहत है॥ लोचन रह्यो समाय वेदहू सकै न
गाय पुस्तक लिखो न जाय जारो ना जरतहै। शुकदेवजी की

भक्तिसागरवर्णन । ४७३

दया चरणदास को प्रकाश भयो जैसे मैं खोजि पायो पायौं
ना परतहैं ॥ कई कोटि दुर्गा जहां हाथ जोरे रहें कई कोटि
शंभू जहां ध्यान लावैं । कई कोटि ब्रह्मा जहां खड़े अस्तुतिकरैं
शेष नारद नहीं पारपावैं ॥ वेद यशही कहैं भेद कछु ना लहैं
पंथकी बात वे भी बतावैं । चरणहीदास की आस जितही
रहो कोटि तैंतीसहू शीश नावैं ॥ रामही देव अरु राम
देवल भयो रामही रामकी करै पूजा । रामही धर्म अरु भर्म
मै रामही रामही ज्ञान अज्ञानसूझा ॥ रामही एक अनेक हैं
रामही राम परगट भयो रामगूझा । चरणदास शुकदेव
सब रामही राम हैं शोधि निश्चय किया नाहिं दूजा ॥
रामही बीज अरु रामही पेड़हैं रामही फूल अरु राम पाती ।
रामही भोगिया रामही योगिया राम जप तप करै दिवसराती॥
रामही नारि अरु रामही पुरुषहै राम मा बाप अरु पूत नाती ।
शुकदेव चरणदास सब रामही राम है रामही दीवला रामवाती ॥
रामही चोर अरु रामही ठग भयो राम बटमार अरु रामघाती ।
रामही साधु यत सतभयो रामही राम रक्षाकरैं रामसाती ॥
रामही देह इन्द्री भयो रामही मन भयो रामही सुरत माती ।
गुरु शुकदेवचरणदास चेला भयो रामही सीप अरु राम स्वाती ॥
आपही वेद अरु आप पण्डित भयो आप कत्तेब अरु आपकाजी ।
आप काशी भयो आपजाती भयो आप मक्का भयो आपहाजी ॥
आपही बांग अरु आप मुल्ला भयो आप पंडा भयो घंटबाजी ।
चरणदास शुकदेव हरि मुरीद मुरशिद भयो मुकति और
बंद सब आपसाजी ॥ ब्रह्मही आदि अरु ब्रह्मही मध्य है ब्रह्मही
अंतकूं वेदगावै । ब्रह्मही एक अन्नेक हैं ब्रह्मही आपनी दृष्टि में
आप आवै ॥ होय दूजा कोई नाहि ऐसी भई आपही आप

४७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
आनंद बढ़ावै । ब्रह्म शुकदेव चरणदास भी ब्रह्म है ब्रह्मही
ब्रह्मका ध्यान लावै ॥
राग अरिल्ल ॥
आतम ज्ञान बिना नहिं मुक्त वेद भेद सब देखा जोय ।
ब्रह्मा शेश महेश पूजकरि बस वह लोकरहत नहिं सोय ॥
जल पाहन अरु भूत भवानी पूज पूज भर्मा सब कोय ।
चरणदास ततबिरला जानै आवागमन दुख बहुरि नहोय ॥
सवैया ॥
न ऊरधबाहुन अंगबिभूतिन धूनी लगाय जटा शिरडारूं ।
न मूड़ मुड़ाय फिरूं बनही बन तीरथ बर्त्त नहीं तनगारूं ॥
उलट लखो घटमें प्रतिबिंब सों दीपक ज्ञान चहूं दिशि जारूं ।
चरणदास कहैं मनहींमनमें अब तूही तुहीं करि तोहिं पुकारूं ॥
कवित्त ॥
तारी जो लगाय देखो वेद अर्थ पाय देखो भक्ति बिना
अखिल ईस कोहू नाहिं पायो है। दशौदिशा धाय देखो तीरथ
अन्हाय देखो भटको सब प्रेम बिना स्रुति यो गायो है॥ हिवारे
तनगोर देखो करवटसिमार देखो ऐसी ऐसी बातन चौरासी
भर्मायो है ॥ भाषै चरणदास शुकदेवके प्रताप सेती आदिपुरुष
भक्तिहेतु नंदगेह आयो है॥ मूड़हू मुड़ाय देखो जटाहू रखाय
देखो सेवरा कहाय देखो भेदहून पायो है। श्रवण चिराय देखो
नादहू बजाय देखो धूरहू लगाय देखो भर्म सबै छायो है ॥
धूम्रपान झूल देखो कोई भंमभूल देखो मोकूं हरिनाम नीको
गुरू जो बतायो है। भाषै चरणदास शुकदेव के प्रतापसेती
आदिपुरुष भक्तिहेतु नंदगेह आयो है ॥

भक्तिसागरवर्णन । ४७५
सवैया ॥
भूलत भ्रर्मत कूर फिरै इन बातन में कह काज सरैगो ।
बैठिरहो हरिमार्ग में करता जो करै सोइ होय रहैगो ॥
अपनेहितसों जिन तोहिं सृज्योहै अलेख बिलोकिकै सोचकरैगो ।
चरणदास बिचारि कहा भटकै हरिनाम बिना दुख कौन हरैगो ॥
वही राम वही श्याम बिधाता वही विश्वंभर पतित तरै ।
वही बिष्णु वही कृष्णमुरारी वही निरञ्जन ज्योति धरै ॥
दीनानाथ हरि वह कहियतु है जो चाहै सो वही करै ।
चरणदास क्यों भटकै मूरुख राम बिना दुख कौन हरै ॥
कवित्त ॥
वही राम मेरो जिन रावण बिनाश्यो जाय वही राम मेरो
जिन लंकपुर जारी है । वही राम मेरो जिन कंस को पछारथो
जाय वही राम मेरो जिन नाथ्यो नागकारी है ॥ वही राम मेरो
सो डार पात रमिरह्यो वही राम मेरो जाकी जगमें उज्यारी
है । चरणदास कूर सब संतनको चेरो कहै वही राम मेरो
प्रहलाद पैज पारी है ॥
कुण्डलिया ॥
वेद पुराणन में सुनो संकटमेटन नाँवँ ।
चरणदासके काज को अब क्यों थाके पावँ ॥
अब क्यों थाके पावँ धाममें हो अक नाहीं ।
और हमारी कौन गहै या दुखमें बाहीं ॥
सकल सृष्टि बिसराय खैंचि मन तुमसों लायो ।
इन पांचन को मार करो मेरो मनभायो ॥
भीर परी जब दास पर जित तित धारो वेष ।
अगिले पिछले करमकी अब क्यों न मेटो रेष ॥

४७६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अब क्यों न मेटो रेख करम कोई दुर कीन्हों ।
हम कुछ जानत नाहिं तुम्हीं काहे नहिं चीन्हों ॥
अब तुम करो सहाय इन्हों से मोहिं छुटावो ।
काम क्रोध मोह लोभ चक्रसों बेगि जलावो ॥
कवित्त ॥
सबही दुख पावैं बेर बेर पछितावैं अब तोहींको ध्यावैं दुख
वही काटि दीजिये । अन्नके दुखारी सब भये हैं भिखारी सृष्टि
काहे को बिसारी प्रभु बेगि जो पसीजिये ॥ जक्त गुणागार
करि देखो है विचार अब ना करो अवार बंदि छोड़ि जो कही-
जिये । दिल्लीकी अर्ज चरणदासकहूँ लर्ज स्याह नादरको बर्ज
अर्ज मेरी सुनि लीजिये ॥ यशोदाको लाल देखि मोहन ब्रज
बाल देखि गोपी अरु ग्वालदेखि प्राण वारि दीजिये । माथेपर
मुकुट देखि कुण्डलकी झलक देखि घूंघरवारी अलक देखि
ललकाही कीजिये ॥ बांकीसी मरोर देखि मुरली की घोर देखि
पैंजनी टकोर देखि देखाही कीजिये । चरणदास कूरदेखि नैनन
को मूंद देखि नैननके बीच देखि यही ध्यान कीजिये ॥ पीरा
सुधार फेंट तुर्रा छबि अधिक बनी करहू में मुरली गहि अध-
रनपैधारीजू । घेरदार नीमो पीरो प्यारो अंगशुभरहो एकपावँ
ठाढ़े सो प्रेमके अहारीजू ॥ सबही श्रूंगार किये राधेजू बायेंअंग
ठाढ़ी मुसक्यात प्राण पियासंग प्यारीजू । नवलकिशोर मोर
सांवरोसुजान प्यारो यार चरणदास कीन्हो अटल बिहारीजू ।
दो० मनदानिस्बतम् हिज्रने, दीगर वस्ल न कोय ।
चरणदास गफलत उठै, वाहिद वाहिद होय ॥
हिज्र वस्ल दोनों नहीं, नहिं दरिया नहिं मौज ।
चरणदास ज़र्रा नहीं, जो कर देखा खोज ॥

भक्तिसागरवर्णन । ४७७
दरियावाहिद लामका, बाजत अनहद बीन ।
सकल चरण फ़रज़न्दना, नाहीं संग ताबीन ॥
दीद शुनीद जहां नहीं, तहां न काल न हाल ।
जौहर जिसम इसम नहीं, चरणदास नहिं काल ॥
बुरी सिफ़ारश यामिनी, और सगाई होय ।
चरणदास यों कहत है, भूलकरो मति कोय ॥
कवित्त ॥
काहेको भक्तपै समान हैं बगलेको ध्यान तो लगायो है
मीनके पचावनको । भीतर और विषय वास चरणदास बाहर
तिलक छापेकिये जक्तके दिखावनको ॥ हरिके गुण गावनको
रसना रिसात अधिक मनतौ हुलास वाद निन्दा के बढ़ावन
को । बहुत बात सीखराखी लोक और बड़ाई को काया नाहिं
शोधी एक रामजी के पावनको ॥ यह है काल तामें विकराल
जहां चरचा गोपाल जाकी निन्दाकरें जानिकै । जोई करै भक्त
जाकूं दुष्ट बहु नामधरैं वचन कुवचन कहैं क्रोध मन आनिकै ॥
देखें अब जायगों तू परम वैकुण्ठही कूं बड़ो भयो साधु माला
धारि तिलक ठानिकै । ऐसे दुष्ट नीचन कि बात नहिं मानिये
जू कहैं चरणदास सबै पापी नरक खानिकै ॥ आप बड़े
नीच करतूति करें नीचनकी नीचनको संग जिन्हें भावै उत्पात
है । रामनाम सुनतहिये लागतहै आगि जान कोऊ करै भजन
ताहि देख जरजात है ॥ खोंटेभये आपकहें औरनकूं खोंटे वै
तो महामोटे पापी माया माहिं इतरात है । साधन के निंदक
सुतौ परेंगे नरकमांझ कहैं चरणदास दुख पावैं बहुभांति है ॥
दो० चरणदास हितसों कियो, ग्रन्थ अनेक प्रकारं ।
अष्टादश अरु चारको, काढ़लियो ततसार ॥

४७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौपाई ॥
संवत सत्रह सै इक्यासी । चैत सुदी तिथि पूरणमासी ॥
शुक्लपक्ष दिन सोमहिवारा । रच्यों ग्रन्थ यों कियो विचारा ॥
तबहीं सूं अस्थापन धरिया । कछुकबानी वादिन करिया ॥
ऐसेहि पांच हजार बनाई । नाम गुरू के गंगबहाई ॥
फिर भइ बानी पांचहजारा । हरिके नाम अगिनिमें जारा ॥
तीजे गुरु आज्ञा सो कीन्हीं । सो अपने साधुन को दीन्हीं ॥
अद्भुतग्रन्थ महा सुखदाई । ताकी शोभा कही न जाई ॥
तामें ज्ञानयोग वैरागा । प्रेमभक्ति जामें अनुरागा ॥
निर्गुण सगुण सबही कहिया । फिर गुरुचरणकमल में रहिया ॥
जोकोइ पढ़िपढ़ि अर्थ विचारै । आप तरै औरन को तारै ॥
ना मैं किया न करने हारा । गुरु हिरदे में आय उचारा ॥
चरणदास मुखसों शुकदेवा । आन कहे चारोही भेवा ॥
दो० जल घृतसूं रक्षा करौ, मूरख हाथ न देव ।
ढीलौ कर नहिं बांधिये, ग्रन्थ कहत यह भेव ॥
सम्प्रदाय शुकदेव मुनि, चरणदास गुरु द्वार ।
परमधर्म भागवत मत, भक्ति अनन्य विचार ॥
पद ॥
जय जय राधे कृष्ण मुरारी, जय जय व्यास सकल गुनगुनी ।
जय जय महाबिदेह जनकजी, श्रीशुकदेव अवतार मुनी ॥
इनको नामरटे निशिवासर, जीभरहै हरिभक्ति सनी ।
चरणदास सुख बास लहै, नित पास रहै यही आसबनी ॥
इति श्रीचरणदासजीकृत भक्तिसागर सम्पूर्णम ॥

श्रीः ॥
श्रीशुकदेवाय नमः ॥
अथ श्रीचरणदासजीकृत जागरणमाहात्म्यं
प्रारभ्यते ॥
छप्पै ॥
प्रथम सुमिरि गुरु चरण बहुरि सुमिरूं हरि चरणा ।
गुरु कूं करूं प्रणाम आय साधों की शरणा ॥
गुरु किरपा सों हिरदै ज्ञान और बुधि परकाशे ।
गुरु किरपासों तिमिर अज्ञान दुरमत सब नाशे ॥
गुरु शुकदेव के चरण चित्त सदा सर्वदा राखिये ।
कहै चरणदास आधीनहो जु दुबिधा मनकी नाखिये ॥
दो० अब मैं विनती करतहूं, श्री सतगुरु महराज ।
दयाकरो आधीन पर, मो सिरके सिरताज ॥
तनमन निवछावर करूं, दोउ कर लेउँ वलाय ।
चरणदास शुकदेव के, चरणन पै बलिजाय ॥
तिमि अज्ञान मेरो हरो, ज्ञान देउ प्रगटाय ।
कृपाकरो मों पतित पै, रहूं चरण लिपटाय ॥
तुमसों दाता और को, जाहि नवाऊं शीश ।
मनसा वाचा कर्म करि, तुमहीं मेरे ईश ॥
शुकदेवगुरु सुनलीजिये, मोकूं करो सनाथ ।
ज्ञानभक्ति जासे बढ़े, सो कहिये हो नाथ ॥
गुरुबचन ॥
दो० सुनो शिष्य अबकहतहूँ, अद्भुत कथा पुनीति ।
निहचे ताके सुनेतें, बढ़े भक्ति और प्रीति ॥
एक समय श्रीकृष्णसों, कहत युधिष्ठिर राव ।

४८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हो हरि अपनी कृपासों, कछु इक कथा सुनाव ॥
राजासों श्रीकृष्ण ने, जो कछु कह्यौ बनाय ।
सो अब तोसूं कहतहूं, सुनो शिष्य चितलाय ॥
अथ युधिष्ठिर के बचन श्रीकृष्णसों ॥
चौपाई ॥
हो हरि मैं पूछतहूं तोहीं । संशय वेगि मिटावो मोहीं ॥
मोहिं जागरण महात्म सुनावो । मेरे पूरण पाप मिटावो ॥
मैं मतिहीन भक्ति नहि जानूं । संसारी के सुख मैं मानूं ॥
निशिदिन कुटुँव जालमें पाग्यो।हरिकीरतन चित नहिंलाग्यो॥
मंगल छन्द ॥
लागै न चित छिन एक मेरो भक्ति प्रभु कैसे बने ।
निशि दिन वृथा संसार सुखकूं मानिकै जिय आपने ॥
दो० कुटुँव जाल के कारनैं, भ्रमत फिरूं चहुँ देश ।
एकघड़ी हरि भजनमें, नाहिं कियो परवेश ॥
श्रीभगवान् के बचन राजासों ॥
चौपाई ॥
सुन राजा अब तोहिं सुनाऊं । तेरे हित याकी विधि गाऊं॥
ग्यारसिको व्रत जबहीं लीजे । करिये व्रत जागरण करीजे ॥
जादिन करे सोई फलदायक । हरिकीर्तन सबतें सुखदायक॥
कोटि एकादशिको फललागै । पाप मिटै जो वा दिन जागै ॥
मैं प्रसन्नहो दरशन दैहों । आवागवनको दुःख मिटैहों ॥
दो० इक मन शुधचित होयके, सुन राजा सुज्ञान ।
ताके सरवन करतही, दूर होय अज्ञान ॥
चौपाई ॥
आप जगै अरु सबन जगावे । मेरे कौतुक अरु गुन गावे ॥

जागरणमाहात्म्य । ४८१
ताल मृदंग झांझ मुरलीधुन । शब्द करत गावे मेरे गुन ॥
प्रेम मगनसों नृत्य जु करै । मेरे चरण कमल चित धरै ॥
मैंहूँ वा सँग-गावन लागूं । नृत्य करूं वाहूतें आगू ॥
दो० श्रीभागौत की कथाकूं, जो मनसूं सुनलेह ।
कोटि जनम के पाप सब, हरिहौं निस्सन्देह ॥
चौपाई ॥
अब सुन याकी महिमा जेती । तेरे हित भाषतहूं तेती ॥
एक भक्त के नेम यहौ थो । व्रत इकादशी नित्य करै थो ॥
पूजाकी विधि सबही करिके । नेम धरम चित माहीं धरिके ॥
साधुन की सेवा अति करतो । मेरे चरण ध्यान मन धरतो ॥
भली भांतिसों व्रत करिके तब । जात हुतो जागरण माहिं जब ॥
दो० व्रत इकादशी नित करै, सुनै कथा मन लाय ।
रैन बितावे प्रीति सों, मेरेई गुण गाय ॥
चौपाई ॥
एक समय मारग के माहीं । ठाढ़ौ हुतो दैत्य बलबाहीं ॥
महाभयानक घोर सरूपा । ओड़ो मुख ज्यों अन्धो कूप ॥
बड़ी भुजा दोउ सूंड समाना । सन्मुख भक्तकि कियो पयाना ॥
दो० जात उतैं वा भक्तकूं, भई दैत्य सों भेंट ।
भली भई तू मोहिं मिल्यो, अब तोहिं लेउँ लपेट ॥
चौपाई ॥
दौरद्यो कूदि मारि किलकारी । हाथ चलाय थापकी मारी ॥
थाप दुष्ट की निष्फल गई । देह भक्त की निर्मल भई ॥
बहुरि क्रोध करि ठाढ़ो रह्यऊ । मुख पसारि फिरि ऐसे कह्यऊ ॥
मैं अब तोकूं जान न दैंहूं । भूखो बहुत बेगि तोहिं खैंहूं ॥
भक्त कहै सुन दैत्य भाई । तू या बनसूं कहूं न जाई ॥
मेरो नेम आज तू राख । भोर आयहूं हरि साख ॥

४८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
इहीं ठौर तू ठाढ़ो रहियो । प्रात भये ही मोकूं खैयो ॥
दो० इक बाचा द्वे बाच हैं, और तीन बाचहैं मोहिं ।
निश कीरतनकर प्रातही, आन देउँ तन तोहिं ॥
राक्षसोवाच-चौपाई ॥
राक्षस कहै तू कैसे आवै । झूठ बातसों जीव छुटावै ॥
तेरी बाचा कैसे मानूं । सांच बात तेरी क्यों जानूँ ॥
अरे बावरे भयो बावरो । आज बन्यो है मेरो दावरो ॥
मेरी बुध ऐसी क्या सठिया । हाथपरो तोहि छांडूं बटिया ॥
भक्त कहै मैं सांची भाखूं । यामें कपट न मन मैं राखूं ॥
चार घरी रैन जब रहै । इहीं ठौर तू मोकूं लहै ॥
दो० जैसे तैसे दैत्य ने, कह्यो बेगही जाव ।
मोकूं बाचा देयके, भोर भये फिर आव ॥
चल्यो भक्त अति प्रेमसों, नेम निबाहन काज ।
सुफल जनम तबजानिहौं, करूं जागरण आज ॥
चौपाई ॥
मनकर तनकर राम रिझाऊं । असिप्रसन्नहो हरिगुन गाऊं ॥
बहु हुलाससों बेगही चल्यो । रोम रोम फुल्लत मन भलो ॥
उमगं उछाहसों पहुँचो जहां । साध सन्त मिल गावैं जहां ॥
पहुँचो आय साधन के तीरा । भजन होत जहां गहरगंभीरा ॥
कथा कीरतन सब मिल गावैं । तालमृदंग और बीन बजावैं ॥
कोइ नाचत कोईरीझरीझावत । कोइ प्रेमसों मोद बढ़ावत ॥
इनहूँ बैठ भजन अति कीना । हरिके चरण कमल चितदीना ॥
प्रभुके प्रेम जु विह्वल भयो । भजन करत निरमल ह्वैगयो ॥
ताली ताल बजाय रिझायो । हरिगुन गाय परम सुखपायो ॥
भोर आरती करी सुहाई । चलबे की चिन्ता मन आई ॥

जागरणमाहात्म्य । ४८३
दो० ऐसी विधिसों रैन सब, बीती भजन प्रताप ।
ताके दरशन करतही, दैत्य भयो निहपाप ॥
चौपाई ॥
दौरयो निकट दैत्य के आयो । जोर दोऊकर शीश नवायो ॥
कहै भक्त तू अब मोहिं खाय । भूखो है तू लेह अघाय ॥
धन धन मेरे भाग बड़ाई । यह काया तो कारज आई ॥
दो० देख्यो दिव्य सरूप तब, दैत्य भयो निहपाप ।
कुबुध बुध सब नसगई, छूट्यो सबै सराप ॥
चौपाई ॥
दैत्य कहै मैं अब नहिं खाऊं । इक इकादशी को फल पाऊं ॥
दो० भक्त कहै एकादशी, कैसे के तोहिं देउं ।
मेरे तो पूंजी यहै, तोकूं दे कहा लेउं ॥
चौपाई ॥
तन मेरो तोहिं जा विधिभावे । लेह खाहि मोहिं यही सुहावे ॥
दो० दैत्य कहै जु इकादशी, याको फल तू लेह ।
कर आयो जो जागरण, ताही को फल देह ॥
चौपाई ॥
भक्त कहै यहहू नहीं दैहूं । तोकूं दैके मैं कित जैहूँ ॥
यह शरीर तू क्यों नहिं खावे । जाकूं खाय परम सुख पावे ॥
फिर बोल्यो दैत्य कर जोरे । बहुत भांतसों किये निहोरे ॥
अरे साध अब दया करीजे । मोहिं इकतालीको फल दीजे ॥
दो० जगत परायन कारनै, प्रगट भये हैं साध ।
इकताली को फल दियो, हरी दुष्ट की व्याध ॥
ताली को फल देतही, दिव्यरूप भयो तास ।
चढ़ विमान स्वर्गहि गयो, तहां पयो सुख वास ॥

४८४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
श्रीभगवान् के बचन राजासों ॥
दो० इक प्रसंग तोसों कहूं, सुन राजा मनलाय ।
ता प्रसंग के सुनतहीं, तम अज्ञान मिटजाय ॥
चौपाई ॥
कलि में प्राणी ऐसे हैंहैं। कथा भजनमें मन नहिं दैहैं ॥
गणिका नृत्य करेंगी जहां । अति हुलास सों जैहैं तहां ॥
कुबुधि दृष्टि सों देखें सोई । खरचें दाम मगन 'मन होई ॥
नेम धरमकी बात न भैहै । वृथा वादकूं मन ललचैहै ॥
जहां ज्ञानकी चरचा परिहै । अज्ञानी तिनसों लरपरिहै ॥
धर्म घटे पाप बहु होई । पाप आचरण करें सब कोई ॥
दो० बढ़ि है पूरन पाप जब, घटि है राज प्रताप ।
उमर छीन धन हीन होय, घटै पुण्य बढ़ै पाप ॥
चौपाई ॥
कुबुध संग ते नरकै जैहैं । भुगतै कष्ट महा दुख पैहैं ॥
असुर जोन को पावे सोई । नीच संग को यह फल होई ॥
दो० इहिविधिकलियुग प्रगट है, साध चहै नहीं कोय ।
कामी क्रोधी अति छली, तिनकी सेवा होय ॥ १ ॥
चौपाई ॥
सत संगत तें मोकूं पावे । निकट रहै मेरे मन भावे ॥
गरभ जौन नहिं आवै सोई । सतसंगति बिन मुक्त न होई ॥
कथा पुनीत यह तोहि सुनाई। हो राजा तेरे मन भाई ॥
याविधिसो जे कलियुग माहीं । जागरण कर मेरे गुन गाई ॥
तिनको मैं सब दुःख निवारूं । भवसागरतें बेग उबारूं ॥
सतयुग त्रेता द्वापर माहीं । करत तपस्या बहु कठिनाई ॥
तबहूं मेरो दरश न पावै । इती घनी जो प्रीति लगावै ॥

जागरण माहात्म्य । ४८५
जे कलियुग में कीरतन करें। पावें सुख भवसागर तरें ॥
युगमरीति यह तोहिं बताई। सुन राजा तेरे हित गाई ॥
दो० इहि विधि श्रीभगवानने, राजहि कियो उपदेश ।
पद्मपुराण में यह कथा, कही व्यास योगेश ॥
पानी का सा बुलबुला, ऐसे सुख संसार ।
भवसागर के तरनकूं, कीरतन है ततसार ॥
पलपल छिनछिन अवध यह, घटत जात है सोय ।
शुकदेव कहें याकथा को, सुन लीजो सब कोय ॥
अहो शिष्य तोसों कही, अचरज कथा अनूप ।
शुकदेव कहैं कोई सुनै, देखे हरि को रूप ॥
श्री सतगुरु शुकदेवकूं, हितसों करूं परनाम ।
चरणदास कों दीजिये, चरणन में बिसराम ॥
इति श्रीचरणदासजीकृत जागरणमाहात्म्यं संपूर्णम् ॥

४८६ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ।
अथ दानलीला श्रीमहाराज साहबश्री
चरणदासजीकृत प्रारभ्यते ॥
दो० ब्रजवनिता और श्यामकी, लीला कही शुकदेव ।
चरणदास जाके सुनें, बढ़े भक्त को भेव ॥
बालचरित्र गोपाल के, पढ़त हियो हुलसाय ।
चरणदास कहें सन्त जन, गावो मन चित लाय ॥
एक समय ब्रजभामिनि, मिल दधि वेचन जात ।
मारग रोक्यो सांवरे, लियें लकुटियां हाथ ॥
मांगन लागे दान जब, मोहन वांके छैल ।
हँसकर बोली ग्वालिनि, तू छांड़ हमारी गैल ॥
अरे तू कैसो मांगे दान, मोहन सांवरे ।
हम मांगे दधि को दान, गूजर बावरी ॥
चल्यो जारे कृष्ण मुरार, गऊ चरावरे ।
तुम ठाढ़ी रहो री गँवार, याही ठांवरी ॥
भली भांत सों देहु, तो रार सबै मिटजाय ।
जो तुम मानों नाहिनै, तो मैं ग्वालहिं देउँ सिखाय ॥
ऐसो को है लालजू, छुवे हमारी बांह ।
सुन पावेगो कंस जो, तुम भाजो ओरे ठांह ॥
को है कंस कहां को राजा, मोकूं कहा डराव ।
वाहू मार निकासहूं, तुम अब पुकारो जाव ॥
हम जानत तुम अतिबलदाई, प्रगटे मदन गुपाल ।
मुख छोटो बातें बड़ी, तुम काहे बजावत गाल ॥
तीन लोक चौदह भुवन, और सकल विस्तार ।
मेरे मुख की दाढ़ में, सदा रहे निरधार ॥

दानलीलावर्णन । ४८७
कहा बड़ाई करत हो, वन के पींचू खाय ।
गऊ चरावो ग्वाल संग, तुम बातें करत बनाय ॥
एक एककी मटकी छीनूं, देहूं दही लुटाय ।
कहा गरब की बात ये, तुम बोलत नैन नचाय ॥
सुनहु कुँवर नन्दराय के, हम बरसाने की ग्वार ।
ठाकुर है वृषभान हां, तोहि जानतसव संसार॥
पहल बोहनी के समय, मेटो नाट हमार ।
भोरही कहा झगरो करो, तुम एहो बृज की नार ॥
बड़े जकाती भये हो, ढोटा मदन मुरार ।
कांन करत हैं महर की, नहीं देंह प्रीत की गार ॥
हम नन्दलाल कहावई, या जग के सिरताज ।
लेहूं हांसिल मही को, तुम दान देहु मेरो आज ॥
इति रार क्यों करतहौ, ठाली कोऊ नाहिं ।
मारग हमरो छांड़दे, हम फिर अपनेघर जाहि ॥
कंप क्रूर मति हीन के, मैतें क्यों डरपाव ।
अपने आभूषण कोई, मोपै गहने धर २ जाव ॥
रंतन जटित गहनेन की, तुम कहा जानों सार ।
गुंजमाल पहरत सदा, मुरली के बजावनहार ॥
इन बंशी मोहे सबे, ब्रह्मा और महेश ।
सुर नर मुनि सनकादहूं, इन्द्रादिक नारद शेष ॥
कहा सराहो आपहो, कांधे कांवर राख ।
कर लकुटी तनियां पहर, चोरी को माखन चाख ॥
कोट कोट ब्रह्माण्ड हैं, रोम रोम के माहि ।
ऐसी है यह कामरी, जाकू जोगीदेख लुभाहिं ॥
जब हम घरतें नीकसी, दहनो फरको आंख ।
३३

छींको किन्हूं तराक दे, देखो भई संकारेही कांक ॥
हमहूं जब घरतें चले, सुगन भयो बन माहिं ।
तुमसों भेंट भई अबे, हम लूट दही सब खाहिं ॥
ऐंचातानी जिन करो, टूटैं मोती हार ।
छूटैं लर बिखरैं धरन, फिर बीनत होय जंजार ॥
दाऊ की सों खातहूं, बिन लिये जान न देउँ ।
टूटे तो लूटैं सखा, मैं तो गोरस को रस लेउँ ॥
रसको चसको जो परो, मसको घर क्यों न खाव ।
छोटे अति खोटे महा, कहा सीखे करन चवाव ॥
हमरे तो यही नेम है, तुमसों कह्यो सुनाय ।
प्रेम प्रोति की रीति को, रस कैसें छांड़ो जाय ॥
चरणदासि है चरण की, मान लेउ घनश्याम ।
काहूविधि छाड़ो हमें, करजोर करें परनाम ॥
क्योंहूं जान न पावहो, अहो सयानी नार ।
चरणदासि कहे लालजू, ऐसे बोले बचन संभार ॥
बातें कहा बनाय के, कविता करत बखान ।
हा हा अब घर जानदै, मेरे प्यारे चतुर सुजान ॥
हा हा खा कैसैं छुटौ, छांडू नाच नचाय ।
देखूं तो कैसो जम्यों, नेक दीजे दही चखाय ॥
उठ बोली एक ग्वारिनी, भौंह मटक मुसकाय ।
पीवो गोरस पेट भर, तुम दोऊ कर ओकबनाय ॥
बैठ ऊकड़ू चावसों, कीनी ओक बनाय ।
पीवन की इच्छा करी, मनमें अतिही ललचाय ॥
मटकीसों डहकाय के, गुंठा दियो दिखाय ।
कहो स्वाद बतलाइये, कछू मीठो है मनभाय ॥

दानलीलावर्णन । ४८६
भलैं भलैं चुपकी रहो, अब द्यूं स्वाद बताय ।
रैता पैता मनसुखा, और सबलू लियो बुलाय ॥
दूरही सों बातें करों, जिन छूवो मटकी आय ।
पकड़ ले चलें नन्द पै, तेरे गुलचें दोय लगाय ॥
तबै लाड़ले सखनकुं, दीनी सैन बताय ।
चटपट मटकी झटक कै, गटक लई दधिजाय ॥
कर ठोढ़ी धर यों कहें, दइया इन कहा कीन ।
अहो लाल ठाढ़े रहो, तुमकाहिलियो दधि छीन ॥
हम तो चाह्यो पहलही, दही नैकसो लैन ।
तुम चतुराई ठान कै, लगी मोहिं अँगूठा दैन ॥
कहा कहैं, घर जायकै, सुन हो नन्दकिशोर ।
तैं लूट्यो सगरो दही, और भाजन डारे फोर ॥
अरस परस झगरें सरस, नेह बढ़यो दोउ ओर ।
केलि करें ब्रजनागरी, नटनागर कुंवर किशोर ॥
प्रेम मगन ग्वारिन भई, बाढ़ो अधिक अनन्द ।
सरबस दे पांयन परी, तब मेटे सब दुख द्वन्द ॥
अचरज लीला कृष्ण की, कहांलग करूं बखान ।
चरणदास सुकदेव दयासूं, पावे पद निज अस्थान ॥
जो कोऊ यह लीला सुनत, गावत करत बिलास ।
अमरलोक निहचय मिलै, तहां पावै नितही बास ॥
इति श्रीमहाराज-साहब श्रीचरणदासजीकृत दान लीला सम्पूर्णम् ॥