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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 516, कुल 690 में से

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पृष्ठ 516

भक्तिसागरवर्णन । ४७५
सवैया ॥
भूलत भ्रर्मत कूर फिरै इन बातन में कह काज सरैगो ।
बैठिरहो हरिमार्ग में करता जो करै सोइ होय रहैगो ॥
अपनेहितसों जिन तोहिं सृज्योहै अलेख बिलोकिकै सोचकरैगो ।
चरणदास बिचारि कहा भटकै हरिनाम बिना दुख कौन हरैगो ॥
वही राम वही श्याम बिधाता वही विश्वंभर पतित तरै ।
वही बिष्णु वही कृष्णमुरारी वही निरञ्जन ज्योति धरै ॥
दीनानाथ हरि वह कहियतु है जो चाहै सो वही करै ।
चरणदास क्यों भटकै मूरुख राम बिना दुख कौन हरै ॥
कवित्त ॥
वही राम मेरो जिन रावण बिनाश्यो जाय वही राम मेरो
जिन लंकपुर जारी है । वही राम मेरो जिन कंस को पछारथो
जाय वही राम मेरो जिन नाथ्यो नागकारी है ॥ वही राम मेरो
सो डार पात रमिरह्यो वही राम मेरो जाकी जगमें उज्यारी
है । चरणदास कूर सब संतनको चेरो कहै वही राम मेरो
प्रहलाद पैज पारी है ॥
कुण्डलिया ॥
वेद पुराणन में सुनो संकटमेटन नाँवँ ।
चरणदासके काज को अब क्यों थाके पावँ ॥
अब क्यों थाके पावँ धाममें हो अक नाहीं ।
और हमारी कौन गहै या दुखमें बाहीं ॥
सकल सृष्टि बिसराय खैंचि मन तुमसों लायो ।
इन पांचन को मार करो मेरो मनभायो ॥
भीर परी जब दास पर जित तित धारो वेष ।
अगिले पिछले करमकी अब क्यों न मेटो रेष ॥