भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भांड़े माटी माहिं कनक में भूषण राजैं।
तरवर बीरजमाहिं यथा फलफूल बिराजैं ॥
गुण रूप नाम सब ब्रह्म में ॐकार तासूं भई ।
चरणदास शुकदेव सो वही ब्रह्म माया वही ।
पांचतत्त्व तेहि माहिं तीनगुण जुदे न होई ॥
चित बुधि इन्द्री तहाँ पाप अरु पुण्य समोई ।
विष अमृत तेहि माहिं भूत अरु देव मुनीश्वर ।
फूल शूल तेहिमाहिं यमन अवतार ऋषीश्वर ॥
चरणदास शुकदेव भज ये सबदरशै दृष्टिअव ।
निराकार निरगुणकहत भूले भटके लोग सब ॥
सवैया ॥
जैसे जल में जलकुंभ बसै जल भीतर बाहर पूरिरह्यो है ।
तैसे जलमें जल पाला बँध्यो जब फूटिगयो जल आप भयो है ॥
ऐसे जगमें वह व्यापरह्यो किनहूं कर लोचन नाहिं गह्यो है ।
चरणदास कहैं दुइ दूरि करो सगरो जग एकहिडोरि गुह्यो है ॥
जैसे पट मैलकी संग कियो जु गयो सब श्वेत भयो तनकारो ।
श्यामस्वरूप अकाश भयो जब धूम धुवांजो भयो भौ भारो ॥
माया पिशाचिको संग कियो जब नीचभयो करता करतारो ।
शुकदेव कहैं दुइ दूरकरो चरणदास सभी इकसूत निहारो ॥
कवित्त ॥
दीसत न वारपार पूरि रह्यो जगतसार ऐसोही अटल नेक
टारो न टरत है। ताको तौ नहिं नाश ठौर ठौर रह्यो भास जैसे
रहत पुष्प वास पासही रहत है॥ लोचन रह्यो समाय वेदहू सकै न
गाय पुस्तक लिखो न जाय जारो ना जरतहै। शुकदेवजी की