भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अब क्यों न मेटो रेख करम कोई दुर कीन्हों ।
हम कुछ जानत नाहिं तुम्हीं काहे नहिं चीन्हों ॥
अब तुम करो सहाय इन्हों से मोहिं छुटावो ।
काम क्रोध मोह लोभ चक्रसों बेगि जलावो ॥
कवित्त ॥
सबही दुख पावैं बेर बेर पछितावैं अब तोहींको ध्यावैं दुख
वही काटि दीजिये । अन्नके दुखारी सब भये हैं भिखारी सृष्टि
काहे को बिसारी प्रभु बेगि जो पसीजिये ॥ जक्त गुणागार
करि देखो है विचार अब ना करो अवार बंदि छोड़ि जो कही-
जिये । दिल्लीकी अर्ज चरणदासकहूँ लर्ज स्याह नादरको बर्ज
अर्ज मेरी सुनि लीजिये ॥ यशोदाको लाल देखि मोहन ब्रज
बाल देखि गोपी अरु ग्वालदेखि प्राण वारि दीजिये । माथेपर
मुकुट देखि कुण्डलकी झलक देखि घूंघरवारी अलक देखि
ललकाही कीजिये ॥ बांकीसी मरोर देखि मुरली की घोर देखि
पैंजनी टकोर देखि देखाही कीजिये । चरणदास कूरदेखि नैनन
को मूंद देखि नैननके बीच देखि यही ध्यान कीजिये ॥ पीरा
सुधार फेंट तुर्रा छबि अधिक बनी करहू में मुरली गहि अध-
रनपैधारीजू । घेरदार नीमो पीरो प्यारो अंगशुभरहो एकपावँ
ठाढ़े सो प्रेमके अहारीजू ॥ सबही श्रूंगार किये राधेजू बायेंअंग
ठाढ़ी मुसक्यात प्राण पियासंग प्यारीजू । नवलकिशोर मोर
सांवरोसुजान प्यारो यार चरणदास कीन्हो अटल बिहारीजू ।
दो० मनदानिस्बतम् हिज्रने, दीगर वस्ल न कोय ।
चरणदास गफलत उठै, वाहिद वाहिद होय ॥
हिज्र वस्ल दोनों नहीं, नहिं दरिया नहिं मौज ।
चरणदास ज़र्रा नहीं, जो कर देखा खोज ॥