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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 514, कुल 690 में से

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पृष्ठ 514

भक्तिसागरवर्णन । ४७३

दया चरणदास को प्रकाश भयो जैसे मैं खोजि पायो पायौं
ना परतहैं ॥ कई कोटि दुर्गा जहां हाथ जोरे रहें कई कोटि
शंभू जहां ध्यान लावैं । कई कोटि ब्रह्मा जहां खड़े अस्तुतिकरैं
शेष नारद नहीं पारपावैं ॥ वेद यशही कहैं भेद कछु ना लहैं
पंथकी बात वे भी बतावैं । चरणहीदास की आस जितही
रहो कोटि तैंतीसहू शीश नावैं ॥ रामही देव अरु राम
देवल भयो रामही रामकी करै पूजा । रामही धर्म अरु भर्म
मै रामही रामही ज्ञान अज्ञानसूझा ॥ रामही एक अनेक हैं
रामही राम परगट भयो रामगूझा । चरणदास शुकदेव
सब रामही राम हैं शोधि निश्चय किया नाहिं दूजा ॥
रामही बीज अरु रामही पेड़हैं रामही फूल अरु राम पाती ।
रामही भोगिया रामही योगिया राम जप तप करै दिवसराती॥
रामही नारि अरु रामही पुरुषहै राम मा बाप अरु पूत नाती ।
शुकदेव चरणदास सब रामही राम है रामही दीवला रामवाती ॥
रामही चोर अरु रामही ठग भयो राम बटमार अरु रामघाती ।
रामही साधु यत सतभयो रामही राम रक्षाकरैं रामसाती ॥
रामही देह इन्द्री भयो रामही मन भयो रामही सुरत माती ।
गुरु शुकदेवचरणदास चेला भयो रामही सीप अरु राम स्वाती ॥
आपही वेद अरु आप पण्डित भयो आप कत्तेब अरु आपकाजी ।
आप काशी भयो आपजाती भयो आप मक्का भयो आपहाजी ॥
आपही बांग अरु आप मुल्ला भयो आप पंडा भयो घंटबाजी ।
चरणदास शुकदेव हरि मुरीद मुरशिद भयो मुकति और
बंद सब आपसाजी ॥ ब्रह्मही आदि अरु ब्रह्मही मध्य है ब्रह्मही
अंतकूं वेदगावै । ब्रह्मही एक अन्नेक हैं ब्रह्मही आपनी दृष्टि में
आप आवै ॥ होय दूजा कोई नाहि ऐसी भई आपही आप