भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 512, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंभक्तिसागरवर्णन । ४७१
जहाँ वेद नहिं भेद जहाँ नहिं योग यज्ञ तप ।
जहाँ पवन नहिं धरणि अगिनि नहिं जहाँ गगन अप॥
अरु जहाँ रात नहिं दिवस है पाप पुण्य नहिं व्यापई ।
आदि अन्त अरु मध्य है कहैं चरणदास ब्रह्म आपही ॥
जहाँ काल नहिं ज्वाल भर्म नहिं तिमि उजारा ।
जहाँ राग नहिं द्वेष जहाँ नहिं कर्म अचारा ॥
जहाँ काम नहिं क्रोध लोभ नहिं मोह नरेशा ।
जहाँ मित्र नहिं शत्रु जहाँ नहिं देश विदेशा ॥
अरु चरणदास इक ब्रह्म है और न दूजा कोइ तहाँ ।
भया जीव सों ब्रह्म जब योग युक्ति पहुँचे जहाँ ॥
जहाँ आतम देव अभेव सेव कबहूं न करावै ।
इच्छा दुई न द्रोह कर्म नहिं भर्म सतावै ॥
जहाँ जाप थाप नहिं आप तहाँ नहिं रूप न रेखा ।
जासु जाति नहिं पांति नारि नहिं पुरुष विशेखा ॥
अरु पारब्रह्म पूरणसदा है अखण्ड नहिं खण्डिता ।
भनै चरणदास ताड़ीलगै सो शून्य शिखरमें मण्डिता॥
चौपाई ॥
ब्राह्मण सो जो ब्रह्म पिछानै । बाहर जाता भीतर आनै ।
पांचौ बशकरि झूठ न भाखै । दया जनेऊ हिरदय राखै ।
आतम विद्या पढ़ै पढ़ावै । परमातम का ध्यानलगावै ॥
काम क्रोध मद लोभ न होई । चरणदास कहैं ब्राह्मण सोई ॥
छप्पै ॥
हुतो आपमें आप सृष्टि नहिं देत दिखाई ।
ज्यों पाला जलमाहिं धरणिपर लीक लिखाई ॥
३२