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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 515, कुल 690 में से

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पृष्ठ 515

४७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
आनंद बढ़ावै । ब्रह्म शुकदेव चरणदास भी ब्रह्म है ब्रह्मही
ब्रह्मका ध्यान लावै ॥
राग अरिल्ल ॥
आतम ज्ञान बिना नहिं मुक्त वेद भेद सब देखा जोय ।
ब्रह्मा शेश महेश पूजकरि बस वह लोकरहत नहिं सोय ॥
जल पाहन अरु भूत भवानी पूज पूज भर्मा सब कोय ।
चरणदास ततबिरला जानै आवागमन दुख बहुरि नहोय ॥
सवैया ॥
न ऊरधबाहुन अंगबिभूतिन धूनी लगाय जटा शिरडारूं ।
न मूड़ मुड़ाय फिरूं बनही बन तीरथ बर्त्त नहीं तनगारूं ॥
उलट लखो घटमें प्रतिबिंब सों दीपक ज्ञान चहूं दिशि जारूं ।
चरणदास कहैं मनहींमनमें अब तूही तुहीं करि तोहिं पुकारूं ॥
कवित्त ॥
तारी जो लगाय देखो वेद अर्थ पाय देखो भक्ति बिना
अखिल ईस कोहू नाहिं पायो है। दशौदिशा धाय देखो तीरथ
अन्हाय देखो भटको सब प्रेम बिना स्रुति यो गायो है॥ हिवारे
तनगोर देखो करवटसिमार देखो ऐसी ऐसी बातन चौरासी
भर्मायो है ॥ भाषै चरणदास शुकदेवके प्रताप सेती आदिपुरुष
भक्तिहेतु नंदगेह आयो है॥ मूड़हू मुड़ाय देखो जटाहू रखाय
देखो सेवरा कहाय देखो भेदहून पायो है। श्रवण चिराय देखो
नादहू बजाय देखो धूरहू लगाय देखो भर्म सबै छायो है ॥
धूम्रपान झूल देखो कोई भंमभूल देखो मोकूं हरिनाम नीको
गुरू जो बतायो है। भाषै चरणदास शुकदेव के प्रतापसेती
आदिपुरुष भक्तिहेतु नंदगेह आयो है ॥