भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भन चरणदास चारों मुक्ति सो हाथ जोरि पायँनपरै ॥
मूल कमल में खेलि पिया कूं देखन चलिये ।
उलटि वेद षटचक्र जाइ सतवैंसे मिलिये ॥
प्राण अपान मिलाय राह पश्चिमकी लीजै ।
बंक नाल करि शुद्ध प्राण लै तामें दीजै ॥
मेरु दण्ड चढ़िजाय जब लोक लोक की गम परै ।
भन चरणदास ब्रह्माण्ड में ब्रह्मदर्शी दर्शन करै ॥
दोहा ॥
चरणदास यहि बिधिकही, चढ़िवे को आकास ।
शोधि साधि साधन अगम, पूर्ण ब्रह्म विलास ॥
छप्पै ॥
दल असंख्यको कमलरूप जहाँ सत्त बिराजै ।
अनंत भानु परकाश जहाँ अनहद धुनि गाजै ॥
सुन्दर छबि अति हंस सन्त जन आगे ठाढ़े ।
जहाँ पहुँचै कोइ शूरबीर नीशान जो गाड़े ॥
कमल मध्य जो तख्तहै सोभा अपार बरणूं कहा ।
कहैं चरणदास उसतख्तपर आदिपुरुष अद्भुतमहा ॥
छत्र फिरत नित रहत चँवर ढोरत जहँ हंसा ।
जहाँ दरशन कर शिष्य मिटै युग युगका संसा ॥
आवागमन है रहत मरण जीवन नहिं होई ।
आनि मिले जब चार मुक्ति कहियत है सोई ॥
जहाँ अमरलोक लीला अमरफल अनेक तहाँ पावई ।
भन चरणदास शुकदेव बल सु चौथापद इमि गावई ॥
जहां चन्द नहिं सूर जहां नहिं जगमग तारे ।
जहां नहीं त्रयदेव त्रिगुण माया नहिं लारे ॥