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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

४६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दम्भ पाखण्ड गहे करमें डफ डूबड़ डूबड़की तारी ।
त्रैगुण तार तंबूरा साजे आशा तृष्णा गति धारी ॥
पाप पुण्य दोउ लै पिचकारी छूटत हैं बारी वारी ।
सम्मुख ह्वै करि जो नर खेलौ ताके चोट लगी 'कारी ॥
लोभ मोह अभिमान भरो है ले माया गागरि डारी ।
राजा परजा भोगी तपसी भीजि रहे हैं संसारी ॥
कुबुधि गुलाल डारि मुख मींजो काम कला पुटली मारी ।
युग युग खेलत यों चलि आई काहू ते नाहीं हारी ॥
जड़ चेतन दोउ रूप सवाँरे एक कनक दूजी नारी ।
पांच पचीसलिये सँग अबला हँसि हँसि मिलि गावत गारी ॥
चतुरा फगुवा दै दै छूटे मूरख को लागी प्यारी ।
चरणदास शुकदेव बतावैं निर्गुण ज्ञान गली न्यारी ॥
होरी राग काफी ॥ ''
ज्ञानरंग हो हो हो होरी ॥
निहरूपी बहुरूप धरे हैं नाना भेष करोरी ।
देखन निकसी अपने पियाको समझ भवन की पौरी ॥
बुद्धि विचार शिंगार सजो है निश्चय माथे रोरी ।
जीवन्मुक्त हुलास बढ़ो है परगट खेल मचोरी ॥
खेलत खेलत आपन बिसरो लागी कौन ठगोरी ।
आपा खोजि रामहीं पाये मैं नाहीं निकसोरी ॥
चरणदास नहिंहरिही हरि हैं आपहि आप रहोरी ।
उपजै कौन कौन अब बिनशै बंध मुक्त केहि ठौरी ॥
होरी राग धनाश्री ॥
साधौ घूंघुट भर्म उठाय होरी खेलिये ॥
वेद पुराण लाज तजिबारी इनमें ना उरझैये ।
१ असर कर जानेवाली ॥

शब्दवर्णन । ४६१
शिर सों सकुच उतारि चदरिया पियसों रंग बढ़इये ॥
रूप न रेख न सूरति मूरति ताके बलि बलि जइये ।
अचल अजर अविनाशी सोई सम्मुख दरशन पइये ॥
सत चेतन आनन्द सदाही निर्भय ताल बजइये ।
पाप पुण्य की शंका त्यागो जहां मर्याद न पइये ॥
ओलो नीर विचारौ जैसे यों आपन विसरइये ।
चरणदास वासना तजिकै सागर बूंद समइये ॥
राग सोरठ ॥
हिलिमिलि होरी खेलि लईहो बालमां घर पाइया ।
पांच सखी पच्चीस सहेली आनंद मंगल गाइया ।
समझ बूझका चोवा चरचा भर्भगुलाल उड़ाइया ॥
दुई गई जब इच्छा कैसी खेलन सकल बहाइया ।
चरणदास बासना तजिकै सागर लहर समाइया ॥
होरी राग सोरठ ॥
कांसू खेलै को होरियां हो बालमनाहीं मैं नहीं ॥
अबिर गुलाल अरगजा नाहीं रंग नहीं गागर नहीं ।
ताल मृदंग झाँझ डफ नाहीं राग नहीं रागिनि नहीं ॥
फाग महीना वा घर नाहीं कन्थ नहीं कामिनि नहीं ।
चरणदास नहीं तब हरिकहुकैसो सबकुछ है और कुछ नहीं ॥
होरी राग धमारि ॥
आदिपुरुष अविगत अविनाशी नाना कौतुकै लावैरे ।
आपहि आप और नहिं कोई बहुतक रूप बनावैरे ॥
आपहि मोहनलाल ग्वालहो मुरली आनि बजावैरे ।
आपहि ब्रजकी बनिता होकर वनको दौरी आवैरे ॥
१ बर्फ २ खेल ॥

४६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
आपहि गोपी कान्ह विराजै आपहि रासरचावैरे ।
अन्तर्द्धान होय फिर आपहिआपहि ढूंढ़न धावैरे ॥
आपहि व्याकुल अप देखनकूं लीला प्रेम बनावैरे ।
परगट होय सबन सुख देवै आपहि रंग बढ़ावैरे ॥
भोर भये जब खेल मचावै आप आप रहजावैरे ।
कबहुँ एक अनेक कभी हैं विधि निषेध गति भावै रे ॥
सत चित आनंद रूप सदाही शुकदेव हो समुझावैरे ।
चरणदास हो समझि समझिकरि आपहिआनंदपावैरे ॥
होरी राग धनाश्री ॥
साधौ बुद्धि विवेक सँभारि होरी खेलिये ॥
सांख्ययोग की युक्तिसों कीजै नित्यअनित्य विचार ।
माया सकल निवारिकैरे आतम रूप निहार ॥
पांचतत्त्व तीनों गुण परगट इनको दो दिन फाग ।
इकरस सत पद जानि लेरे ताहीसों मन पाग ॥
निश्चय चोवा लाइयेरे भर्म गुलाल उड़ाय ।
देह करमके रंगकीरे गागर दे ढरकाय ॥
जीवन मुक्त जु फगुवा पइये गुरुके चरणन लाग ।
जो कोई ऐसी होरी खेलै जाके ऊंचे भाग ॥
चरणदास कहैं शुकदेव बताई हमहूँ खेलैं जाग ।
प्रियतम प्रियतम जित तित देखे द्वेष गयो अरु राग१ ॥
सखीरी ततम२तले संग खेलिये रस होरी हो ।
निर्गुण निज निर्धार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी शील शृङ्गार सवांरिये रस होरी हो ।
दुविधा मानि निवार सरस रस होरी हो ॥
१ प्रेम २ ओंकार ॥

शब्दवर्णन । ४६३
सखीरी रहनी केसर घोरिये रस होरी हो ।
बहुरि न ऐसों बार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी सतगुण करि पिचकारि ले रस होरी हो
तमरजके भर मार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी गर्बगुलाल उड़ाइये रस होरी हो ।
मोह मटुकिया डारि सरस रस होरी हो ॥
सखीरी मिल मिल रंग लगाइये रस होरी हो ।
चंदन चरच विचार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी निश्चल सिन्धु समाइये रस होरी हो ।
रिमझिम झमक फुहार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी शून्य नगर में नृत्तिये रस होरी हो ।
अनहद झनक झिंगार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी सैन सुरति सों समझिये रस होरी हो ।
सोहंब्रह्म खिलार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी पांच पचीसौ रल मिले रस होरी हो ।
मंगल शब्द उचार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी अलख पुरुष फगुवा लहो रस होरी हो ।
आपा आप बिसारि सरस रस होरी हो ॥
चरणदास रमइया रमि रह्यो रस होरी हो ।
दर्शो है फाग अपार सरस रस होरी हो ॥
गुरु दूती बिना सखी पीव न देखो जाय ।
भावै तुम जप तप करि देखो भावै तीरथ न्हाय ॥
पांच सखी पचीस सहेली अति चतुर अधिकाय ।
मोहिं अयानी जानिकै मेरो बालम लियो लुकाय ॥
वेद पुराण सबै जो ढूंढ़े सुरति स्मृति सब धाय ।

४६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
आनि१ धर्म और क्रिया कर्म में दीन्हों मोहिं भर्माय ॥
भटकत भटकत जब मैं हारी चरण सखी गहे आय ।
शुकदेव साहब किरपा करिकै दीन्हो अलख लखाय ॥
देखतही सब भ्रम भय भागे शिरसूं गई बलाय ।
चरणदास जब प्रीतम पायो दर्शन किये अघाय ॥
हरि पीव पाइया सखी पूरण मेरे भाग ।
सुखसागर आनन्द में मैं नित उठि खेलूं फाग ॥
चोवा चन्दन प्रीतिकै सखी केशरि ज्ञान घसाय ।
पुहुप वाससूं जो वह झीनो ताके अंग लगाय ॥
बेरंगी के रंगसूं सखी गागर लई भराय ।
शून्य महल में जायकै सखी पियपर दई ढरकाय ॥
भरम गुलालजब कर लियो सखी बालम गयो दुराय ।
सतगुरुने अंजन दियो तब सम्मुख दरशे आय ॥
ताली लाई प्रेमकी सखी अनहद नाद बजाय ।
सर्वमयी पिय पायकै हम आनँद मंगल गाय ॥
रलमिल प्रियतम द्वै गये सखी दुईगई सब भाग ।
चरणदास शुकदेव दयासूं पायो अचल सुहाग ॥
मैं तो ह्वां खेलूंगी जाय जित मेरो पिया बसै ।
व्याधि उपाधि न संशयकोई आनंदहि आनंद लसै ॥
नितही फागुन एकरस होरी खंडित कबहुं न होय ।
मुक्ति पदारथ फगुवा पइये आपा सरवस खोय ॥
जिनके रसिया शिव ब्रह्मादिक खेलत चावहिचाव ।
ऋषिमुनिदेवत खेलत निशिदिन करिकरिबहुतकभाव॥
भाग बड़े उन्हीं के जानो वा पदलागे धाय ।
१ शपथ ॥

शब्दवर्णन । ४६५
ज्ञान ध्यान के रंगमें डूबे सोई पहुंचे जाय ॥
गुरु शुकदेव बताई हमको जबसों बाढ़ी प्रीति ।
चरणदासहु अति ललचाये सुनि सुनि ह्वांकी रीति ॥
साधौ प्रेम नगर के माहि होरी होयरही ।
जबसूं खेली हमहूं चितदै आपनहूं को खोयरही ॥
बहुतन कुल अरु लाज गँवाई रहो न कोई काम ।
नाचि उठैं कभी गावन लागैं भूले तन धन धाम ॥
बहुतन की मति रंग रँगी है जिनको लागो प्रेम ।
बहुतनको अपनी सुधि नाहीं -कौन करै ऐसो नेम ॥
बहुतन को गद्गदही वांणी नैनन नीर ढराय ।
बहुतनको बौरापन लागो ह्वांकी कही न जाय ॥
प्रेमीकी गति प्रेमी जानै जाके लागी होय ।
चरणदास उस नेह नगरकी शुकदेवा कहि सोय ॥
कोई जानै संत सुजान उलटे भेदकूं ।
वृक्ष चढ़ो माली के ऊपर धरती चढ़ी अकास ।
नारि पुरुष विपरीतभये हैं देखत आवै हास ॥
बैल चढ़ो शंकर के ऊपर हंस ब्रह्म के शीश ।
सिंह चढ़ो देवी के ऊपर गुरुही की बखशीश ॥
नाव चढ़ी केवट के ऊपर सुतकी गोदी माय ।
जो तू भेदी अमर नगरको तौ तू अर्थ बताय ॥
चरणदास शुकदेव सहाई अब कह करिहै काल ।
बांबी उलटि सर्प में पैठी जबसूं भये निहाल ॥
इति श्रीचरणदासकृत शब्द सम्पूर्णम् ॥

४६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ भक्तिसागर प्रारम्भः ॥
अथ छपै छन्द कवित्त चौपाई दोहा प्रारम्भ ॥
छप्पै ॥
श्री ब्यास को पुत्र तासु कों दास कहाऊं ।
सदा रहूं हरि शरण और ना शीश नवाऊं ॥
साधनसूं यह चहूं मोहिं यह बात दृढ़ावो ।
माया जाल संसार तासुसों वेगि छुटावो ॥
अहो श्रीब्रजनाथ बिनय सुनि लीजिये ।
चरणदास को भक्ति कृपा करि दीजिये ॥
गुरु ईश्वर गुरु ईशरीझ गुरु राम बतावैं ।
गुरु काटैं यमफांस बिपति सब अघै नशावैं ॥
गुरुदेवन के देव भेव ब्रह्मादि लखावैं ।
गुरु भवसागर तार पार वह लोक बसावैं ॥
चरणदास यह जानिकै सतसंगति हरिको भजो ।
शुकदेव चरण चितलायकै सो झूठकानि दुबिधा तजो ॥
पग तब होवैं शुद्ध साधुके मग को धावै ।
हस्त शुद्ध तब होयँ दोऊकर शीश नवावै ॥
नैन शुद्ध जब होयँ साधु के दर्शन पावै ।
रसन शुद्ध तब होय रामगुण मुख सों गावै ॥
भनै चरणदास सब शुद्धहो जब चरण परस गुरुदेवके ।
वै आतम तत्त्व बिचार देखकर दर्शन अलख अभेवके ॥
दो० दुखमेटन सुखके करन, चरणदास वे साध ।
दाता ज्ञान विज्ञान के, देवैं मता अगाध ॥

भक्तिसागरवर्णन । ४६७
साध मुक्ति नहिं चहत हैं, सिद्ध न चाहत साध ।
स्वर्गलोक नहिं चहत हैं, जिनका मता अगाध ॥
चौपाई ॥
इड़ा पिंगला सुखमन धारो । आसन बज्र नागिनी टारो ॥
द्वादश अंगुल होय वेध षट चक्कर लीजै ।
जब बाजै अनहद तूर जहां मन निज कर दीजै ॥
खेचरी मुद्रा त्रिकुटी आवै । अमृत पियै परम सुख पावै ॥
मेरुदण्डको प्राण चलावै । शून्य शिखर जब नगरी पावै ॥
जा नगरीमें चन्द न भान । पहुँचै साधू चतुर सुजान ॥
जाति पांति जहँ नाम न नाता । श्वेत श्याम पीता नहिं राता ॥
योग यज्ञ तप जहां न दाना । तीरथ बर्त्त जहां नहिं न्हाना ॥
किरिया कर्म जहां नहिं पूजा । मैं तू है नहिं एक न दूजा ॥
जहां न सांझ द्यौस नहिं राता । एकै ब्रह्म अखंड विधाता ॥
चरणदास रामकी घाटी पहुँचै गुरुमत शूरा ।
ओछी बुद्धि बाद बहुठानैं करणी करै सो पूरा ॥
छप्पै ॥
बैठ गुफाकेमध्य योगकी युक्ति बिचारै ।
आप अकेलो रहै और ना मनुष निहारै ॥
चारिबारि नितकरै जाप ॐकार अराधै ।
सूक्ष्म करै आहार ओगरो पतली साधै ॥
आसन पद्म लगाय कै सीधी राखै मेर ।
ठोढ़ी हिये लगाइये पलक झांपकरि हेर ॥
दो० कुंभक आठ प्रकारके, तिनमें उत्तम एक ।

४६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
केवल कुंभक जानिये, साधै ताहि विशेख ॥
त्रिकुटी में तीरथ अगम, तिरवेणी जेहि नाम ।
न्हाय योगकी युक्ति सूं, पूरण हो सब काम ॥
रणजीत कहैं जहाँ न्हाइये, त्रिकुटी तीरथ धाम ।
नित परबी जहाँ होत है, भजनकरो निष्काम ॥
चौपाई ॥
जा तीरथ को पवन न लागै । जा तीरथ में जन अनुरागै ॥
जा तीरथ में रतन अनेका । पूरे गुरुसों मिलमिल देखा ॥
वा तीरथमें जो कोइ 'न्हावै । भवसागर में बहुरि न आवै ॥
जहां न चन्द सूर नहिं तारे । गुंरुगम पहुँचे अति मतवारे ॥
जा तीरथका बँधा जो नीर । उज्ज्वल निर्मल गहिर गँभीर ॥
ब्रह्मा विष्णु जहां त्रयदेवा । योग युक्ति में लावैं सेवा ॥
बारह मास दामिनी दमकै । सोन पटीला जुगुनू झमकै ॥
रणजित मीत बास जहाँ कीजै । नित अस्नान महासुख लीजै ॥
छप्पै ॥
अमरी वजरी साध बायु सरने नहिं पावै ।
द्वादश अंगुल प्राण सुरतदे ताहि घटावै ॥
मौन गहै नितरहै अल्प सूक्ष्म सो बोलै ।
एकबार आहार जँभाई कबहुँ न खोलै ॥
बांधैसो जाय दृढ़ छीकको अनहद धुनि अति गाजई ।
भन चरणदास शुकदेव बल सुयोग युक्ति इमि साजई ॥
दो० मन पवना वश कीजिये, ज्ञान युक्तिसों रोक ।
सुरति बांधि भीतर धसै, सूझै काया लोक ॥
मन हिरदे में रहत है, पवन नाभिके माहि ।
इन्द्री रोकै ये रुकें, और कछू बिधि नाहिं ॥

भक्तिसागरवर्णन । ४६६
छप्पै ॥
सूक्ष्म करै अहार जीति धरणी जब लेई ।
नीर जीति जब लेय बिंद जाने नहिं देई ॥
मोह लोभ जब तजै अग्निको जीति मिलावै ।
पवनजीति जब लेय गगनको बाध चलावै ॥
अरु हर्ष शोक समकरि गनै पांच जीत एकैकरै ।
भन चरणदास साधनगहै होय प्रकाश कारजसरै ॥
दो० गगन मध्य जो कमल है, बाजत अनहद तूर ।
दलहजारको कमल है, पहुँचै गुरु मत शूर ॥
गगन मँडल के कमलमें, सतगुरु ध्यान निहार ।
चरणदास शुकदेव परसै, मिटै सकल विकार ॥
सहसदल के कमलमें, रूप अगम आपार ।
सोहं सोहं जाप सहजै, होत एक हजार ॥
छप्पै ॥
नौ नाड़ीकी खैंच पवन लै उरमें दीजै ।
बज्जर ताला लाय द्वार नौ बन्ध करीजै ॥
तीनौ बन्ध लगाय अस्थिर अनहद आराधै ।
सुरति निरतिका काम राह चल गगन अगाधै ॥
शून्य शिखर चढ़िरहै दृढ़ जहां जाय आसन करै ।
भने चरणदास ताड़ीलगै सो रामदरश कलिमल हरै ॥
चौथा पद निर्वाण धाम बेगमपुर कहिये ।
गुण अतीत जहाँ रामनिरखि नैनन सुख लहिये ॥
अद्वै रूप अखण्ड मण्ड मण्डल बहु बंका ।
जहां काल नहिं ज्वाल शब्द अति उठत निशंका ॥
निज पारब्रह्म चौरी रची शिव सहित शक्ति फेरी करैं ।

४७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भन चरणदास चारों मुक्ति सो हाथ जोरि पायँनपरै ॥
मूल कमल में खेलि पिया कूं देखन चलिये ।
उलटि वेद षटचक्र जाइ सतवैंसे मिलिये ॥
प्राण अपान मिलाय राह पश्चिमकी लीजै ।
बंक नाल करि शुद्ध प्राण लै तामें दीजै ॥
मेरु दण्ड चढ़िजाय जब लोक लोक की गम परै ।
भन चरणदास ब्रह्माण्ड में ब्रह्मदर्शी दर्शन करै ॥
दोहा ॥
चरणदास यहि बिधिकही, चढ़िवे को आकास ।
शोधि साधि साधन अगम, पूर्ण ब्रह्म विलास ॥
छप्पै ॥
दल असंख्यको कमलरूप जहाँ सत्त बिराजै ।
अनंत भानु परकाश जहाँ अनहद धुनि गाजै ॥
सुन्दर छबि अति हंस सन्त जन आगे ठाढ़े ।
जहाँ पहुँचै कोइ शूरबीर नीशान जो गाड़े ॥
कमल मध्य जो तख्तहै सोभा अपार बरणूं कहा ।
कहैं चरणदास उसतख्तपर आदिपुरुष अद्भुतमहा ॥
छत्र फिरत नित रहत चँवर ढोरत जहँ हंसा ।
जहाँ दरशन कर शिष्य मिटै युग युगका संसा ॥
आवागमन है रहत मरण जीवन नहिं होई ।
आनि मिले जब चार मुक्ति कहियत है सोई ॥
जहाँ अमरलोक लीला अमरफल अनेक तहाँ पावई ।
भन चरणदास शुकदेव बल सु चौथापद इमि गावई ॥
जहां चन्द नहिं सूर जहां नहिं जगमग तारे ।
जहां नहीं त्रयदेव त्रिगुण माया नहिं लारे ॥

भक्तिसागरवर्णन । ४७१
जहाँ वेद नहिं भेद जहाँ नहिं योग यज्ञ तप ।
जहाँ पवन नहिं धरणि अगिनि नहिं जहाँ गगन अप॥
अरु जहाँ रात नहिं दिवस है पाप पुण्य नहिं व्यापई ।
आदि अन्त अरु मध्य है कहैं चरणदास ब्रह्म आपही ॥
जहाँ काल नहिं ज्वाल भर्म नहिं तिमि उजारा ।
जहाँ राग नहिं द्वेष जहाँ नहिं कर्म अचारा ॥
जहाँ काम नहिं क्रोध लोभ नहिं मोह नरेशा ।
जहाँ मित्र नहिं शत्रु जहाँ नहिं देश विदेशा ॥
अरु चरणदास इक ब्रह्म है और न दूजा कोइ तहाँ ।
भया जीव सों ब्रह्म जब योग युक्ति पहुँचे जहाँ ॥
जहाँ आतम देव अभेव सेव कबहूं न करावै ।
इच्छा दुई न द्रोह कर्म नहिं भर्म सतावै ॥
जहाँ जाप थाप नहिं आप तहाँ नहिं रूप न रेखा ।
जासु जाति नहिं पांति नारि नहिं पुरुष विशेखा ॥
अरु पारब्रह्म पूरणसदा है अखण्ड नहिं खण्डिता ।
भनै चरणदास ताड़ीलगै सो शून्य शिखरमें मण्डिता॥
चौपाई ॥
ब्राह्मण सो जो ब्रह्म पिछानै । बाहर जाता भीतर आनै ।
पांचौ बशकरि झूठ न भाखै । दया जनेऊ हिरदय राखै ।
आतम विद्या पढ़ै पढ़ावै । परमातम का ध्यानलगावै ॥
काम क्रोध मद लोभ न होई । चरणदास कहैं ब्राह्मण सोई ॥
छप्पै ॥
हुतो आपमें आप सृष्टि नहिं देत दिखाई ।
ज्यों पाला जलमाहिं धरणिपर लीक लिखाई ॥
३२

४७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भांड़े माटी माहिं कनक में भूषण राजैं।
तरवर बीरजमाहिं यथा फलफूल बिराजैं ॥
गुण रूप नाम सब ब्रह्म में ॐकार तासूं भई ।
चरणदास शुकदेव सो वही ब्रह्म माया वही ।
पांचतत्त्व तेहि माहिं तीनगुण जुदे न होई ॥
चित बुधि इन्द्री तहाँ पाप अरु पुण्य समोई ।
विष अमृत तेहि माहिं भूत अरु देव मुनीश्वर ।
फूल शूल तेहिमाहिं यमन अवतार ऋषीश्वर ॥
चरणदास शुकदेव भज ये सबदरशै दृष्टिअव ।
निराकार निरगुणकहत भूले भटके लोग सब ॥
सवैया ॥
जैसे जल में जलकुंभ बसै जल भीतर बाहर पूरिरह्यो है ।
तैसे जलमें जल पाला बँध्यो जब फूटिगयो जल आप भयो है ॥
ऐसे जगमें वह व्यापरह्यो किनहूं कर लोचन नाहिं गह्यो है ।
चरणदास कहैं दुइ दूरि करो सगरो जग एकहिडोरि गुह्यो है ॥
जैसे पट मैलकी संग कियो जु गयो सब श्वेत भयो तनकारो ।
श्यामस्वरूप अकाश भयो जब धूम धुवांजो भयो भौ भारो ॥
माया पिशाचिको संग कियो जब नीचभयो करता करतारो ।
शुकदेव कहैं दुइ दूरकरो चरणदास सभी इकसूत निहारो ॥
कवित्त ॥
दीसत न वारपार पूरि रह्यो जगतसार ऐसोही अटल नेक
टारो न टरत है। ताको तौ नहिं नाश ठौर ठौर रह्यो भास जैसे
रहत पुष्प वास पासही रहत है॥ लोचन रह्यो समाय वेदहू सकै न
गाय पुस्तक लिखो न जाय जारो ना जरतहै। शुकदेवजी की

भक्तिसागरवर्णन । ४७३

दया चरणदास को प्रकाश भयो जैसे मैं खोजि पायो पायौं
ना परतहैं ॥ कई कोटि दुर्गा जहां हाथ जोरे रहें कई कोटि
शंभू जहां ध्यान लावैं । कई कोटि ब्रह्मा जहां खड़े अस्तुतिकरैं
शेष नारद नहीं पारपावैं ॥ वेद यशही कहैं भेद कछु ना लहैं
पंथकी बात वे भी बतावैं । चरणहीदास की आस जितही
रहो कोटि तैंतीसहू शीश नावैं ॥ रामही देव अरु राम
देवल भयो रामही रामकी करै पूजा । रामही धर्म अरु भर्म
मै रामही रामही ज्ञान अज्ञानसूझा ॥ रामही एक अनेक हैं
रामही राम परगट भयो रामगूझा । चरणदास शुकदेव
सब रामही राम हैं शोधि निश्चय किया नाहिं दूजा ॥
रामही बीज अरु रामही पेड़हैं रामही फूल अरु राम पाती ।
रामही भोगिया रामही योगिया राम जप तप करै दिवसराती॥
रामही नारि अरु रामही पुरुषहै राम मा बाप अरु पूत नाती ।
शुकदेव चरणदास सब रामही राम है रामही दीवला रामवाती ॥
रामही चोर अरु रामही ठग भयो राम बटमार अरु रामघाती ।
रामही साधु यत सतभयो रामही राम रक्षाकरैं रामसाती ॥
रामही देह इन्द्री भयो रामही मन भयो रामही सुरत माती ।
गुरु शुकदेवचरणदास चेला भयो रामही सीप अरु राम स्वाती ॥
आपही वेद अरु आप पण्डित भयो आप कत्तेब अरु आपकाजी ।
आप काशी भयो आपजाती भयो आप मक्का भयो आपहाजी ॥
आपही बांग अरु आप मुल्ला भयो आप पंडा भयो घंटबाजी ।
चरणदास शुकदेव हरि मुरीद मुरशिद भयो मुकति और
बंद सब आपसाजी ॥ ब्रह्मही आदि अरु ब्रह्मही मध्य है ब्रह्मही
अंतकूं वेदगावै । ब्रह्मही एक अन्नेक हैं ब्रह्मही आपनी दृष्टि में
आप आवै ॥ होय दूजा कोई नाहि ऐसी भई आपही आप

४७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
आनंद बढ़ावै । ब्रह्म शुकदेव चरणदास भी ब्रह्म है ब्रह्मही
ब्रह्मका ध्यान लावै ॥
राग अरिल्ल ॥
आतम ज्ञान बिना नहिं मुक्त वेद भेद सब देखा जोय ।
ब्रह्मा शेश महेश पूजकरि बस वह लोकरहत नहिं सोय ॥
जल पाहन अरु भूत भवानी पूज पूज भर्मा सब कोय ।
चरणदास ततबिरला जानै आवागमन दुख बहुरि नहोय ॥
सवैया ॥
न ऊरधबाहुन अंगबिभूतिन धूनी लगाय जटा शिरडारूं ।
न मूड़ मुड़ाय फिरूं बनही बन तीरथ बर्त्त नहीं तनगारूं ॥
उलट लखो घटमें प्रतिबिंब सों दीपक ज्ञान चहूं दिशि जारूं ।
चरणदास कहैं मनहींमनमें अब तूही तुहीं करि तोहिं पुकारूं ॥
कवित्त ॥
तारी जो लगाय देखो वेद अर्थ पाय देखो भक्ति बिना
अखिल ईस कोहू नाहिं पायो है। दशौदिशा धाय देखो तीरथ
अन्हाय देखो भटको सब प्रेम बिना स्रुति यो गायो है॥ हिवारे
तनगोर देखो करवटसिमार देखो ऐसी ऐसी बातन चौरासी
भर्मायो है ॥ भाषै चरणदास शुकदेवके प्रताप सेती आदिपुरुष
भक्तिहेतु नंदगेह आयो है॥ मूड़हू मुड़ाय देखो जटाहू रखाय
देखो सेवरा कहाय देखो भेदहून पायो है। श्रवण चिराय देखो
नादहू बजाय देखो धूरहू लगाय देखो भर्म सबै छायो है ॥
धूम्रपान झूल देखो कोई भंमभूल देखो मोकूं हरिनाम नीको
गुरू जो बतायो है। भाषै चरणदास शुकदेव के प्रतापसेती
आदिपुरुष भक्तिहेतु नंदगेह आयो है ॥

भक्तिसागरवर्णन । ४७५
सवैया ॥
भूलत भ्रर्मत कूर फिरै इन बातन में कह काज सरैगो ।
बैठिरहो हरिमार्ग में करता जो करै सोइ होय रहैगो ॥
अपनेहितसों जिन तोहिं सृज्योहै अलेख बिलोकिकै सोचकरैगो ।
चरणदास बिचारि कहा भटकै हरिनाम बिना दुख कौन हरैगो ॥
वही राम वही श्याम बिधाता वही विश्वंभर पतित तरै ।
वही बिष्णु वही कृष्णमुरारी वही निरञ्जन ज्योति धरै ॥
दीनानाथ हरि वह कहियतु है जो चाहै सो वही करै ।
चरणदास क्यों भटकै मूरुख राम बिना दुख कौन हरै ॥
कवित्त ॥
वही राम मेरो जिन रावण बिनाश्यो जाय वही राम मेरो
जिन लंकपुर जारी है । वही राम मेरो जिन कंस को पछारथो
जाय वही राम मेरो जिन नाथ्यो नागकारी है ॥ वही राम मेरो
सो डार पात रमिरह्यो वही राम मेरो जाकी जगमें उज्यारी
है । चरणदास कूर सब संतनको चेरो कहै वही राम मेरो
प्रहलाद पैज पारी है ॥
कुण्डलिया ॥
वेद पुराणन में सुनो संकटमेटन नाँवँ ।
चरणदासके काज को अब क्यों थाके पावँ ॥
अब क्यों थाके पावँ धाममें हो अक नाहीं ।
और हमारी कौन गहै या दुखमें बाहीं ॥
सकल सृष्टि बिसराय खैंचि मन तुमसों लायो ।
इन पांचन को मार करो मेरो मनभायो ॥
भीर परी जब दास पर जित तित धारो वेष ।
अगिले पिछले करमकी अब क्यों न मेटो रेष ॥

४७६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अब क्यों न मेटो रेख करम कोई दुर कीन्हों ।
हम कुछ जानत नाहिं तुम्हीं काहे नहिं चीन्हों ॥
अब तुम करो सहाय इन्हों से मोहिं छुटावो ।
काम क्रोध मोह लोभ चक्रसों बेगि जलावो ॥
कवित्त ॥
सबही दुख पावैं बेर बेर पछितावैं अब तोहींको ध्यावैं दुख
वही काटि दीजिये । अन्नके दुखारी सब भये हैं भिखारी सृष्टि
काहे को बिसारी प्रभु बेगि जो पसीजिये ॥ जक्त गुणागार
करि देखो है विचार अब ना करो अवार बंदि छोड़ि जो कही-
जिये । दिल्लीकी अर्ज चरणदासकहूँ लर्ज स्याह नादरको बर्ज
अर्ज मेरी सुनि लीजिये ॥ यशोदाको लाल देखि मोहन ब्रज
बाल देखि गोपी अरु ग्वालदेखि प्राण वारि दीजिये । माथेपर
मुकुट देखि कुण्डलकी झलक देखि घूंघरवारी अलक देखि
ललकाही कीजिये ॥ बांकीसी मरोर देखि मुरली की घोर देखि
पैंजनी टकोर देखि देखाही कीजिये । चरणदास कूरदेखि नैनन
को मूंद देखि नैननके बीच देखि यही ध्यान कीजिये ॥ पीरा
सुधार फेंट तुर्रा छबि अधिक बनी करहू में मुरली गहि अध-
रनपैधारीजू । घेरदार नीमो पीरो प्यारो अंगशुभरहो एकपावँ
ठाढ़े सो प्रेमके अहारीजू ॥ सबही श्रूंगार किये राधेजू बायेंअंग
ठाढ़ी मुसक्यात प्राण पियासंग प्यारीजू । नवलकिशोर मोर
सांवरोसुजान प्यारो यार चरणदास कीन्हो अटल बिहारीजू ।
दो० मनदानिस्बतम् हिज्रने, दीगर वस्ल न कोय ।
चरणदास गफलत उठै, वाहिद वाहिद होय ॥
हिज्र वस्ल दोनों नहीं, नहिं दरिया नहिं मौज ।
चरणदास ज़र्रा नहीं, जो कर देखा खोज ॥

भक्तिसागरवर्णन । ४७७
दरियावाहिद लामका, बाजत अनहद बीन ।
सकल चरण फ़रज़न्दना, नाहीं संग ताबीन ॥
दीद शुनीद जहां नहीं, तहां न काल न हाल ।
जौहर जिसम इसम नहीं, चरणदास नहिं काल ॥
बुरी सिफ़ारश यामिनी, और सगाई होय ।
चरणदास यों कहत है, भूलकरो मति कोय ॥
कवित्त ॥
काहेको भक्तपै समान हैं बगलेको ध्यान तो लगायो है
मीनके पचावनको । भीतर और विषय वास चरणदास बाहर
तिलक छापेकिये जक्तके दिखावनको ॥ हरिके गुण गावनको
रसना रिसात अधिक मनतौ हुलास वाद निन्दा के बढ़ावन
को । बहुत बात सीखराखी लोक और बड़ाई को काया नाहिं
शोधी एक रामजी के पावनको ॥ यह है काल तामें विकराल
जहां चरचा गोपाल जाकी निन्दाकरें जानिकै । जोई करै भक्त
जाकूं दुष्ट बहु नामधरैं वचन कुवचन कहैं क्रोध मन आनिकै ॥
देखें अब जायगों तू परम वैकुण्ठही कूं बड़ो भयो साधु माला
धारि तिलक ठानिकै । ऐसे दुष्ट नीचन कि बात नहिं मानिये
जू कहैं चरणदास सबै पापी नरक खानिकै ॥ आप बड़े
नीच करतूति करें नीचनकी नीचनको संग जिन्हें भावै उत्पात
है । रामनाम सुनतहिये लागतहै आगि जान कोऊ करै भजन
ताहि देख जरजात है ॥ खोंटेभये आपकहें औरनकूं खोंटे वै
तो महामोटे पापी माया माहिं इतरात है । साधन के निंदक
सुतौ परेंगे नरकमांझ कहैं चरणदास दुख पावैं बहुभांति है ॥
दो० चरणदास हितसों कियो, ग्रन्थ अनेक प्रकारं ।
अष्टादश अरु चारको, काढ़लियो ततसार ॥

४७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौपाई ॥
संवत सत्रह सै इक्यासी । चैत सुदी तिथि पूरणमासी ॥
शुक्लपक्ष दिन सोमहिवारा । रच्यों ग्रन्थ यों कियो विचारा ॥
तबहीं सूं अस्थापन धरिया । कछुकबानी वादिन करिया ॥
ऐसेहि पांच हजार बनाई । नाम गुरू के गंगबहाई ॥
फिर भइ बानी पांचहजारा । हरिके नाम अगिनिमें जारा ॥
तीजे गुरु आज्ञा सो कीन्हीं । सो अपने साधुन को दीन्हीं ॥
अद्भुतग्रन्थ महा सुखदाई । ताकी शोभा कही न जाई ॥
तामें ज्ञानयोग वैरागा । प्रेमभक्ति जामें अनुरागा ॥
निर्गुण सगुण सबही कहिया । फिर गुरुचरणकमल में रहिया ॥
जोकोइ पढ़िपढ़ि अर्थ विचारै । आप तरै औरन को तारै ॥
ना मैं किया न करने हारा । गुरु हिरदे में आय उचारा ॥
चरणदास मुखसों शुकदेवा । आन कहे चारोही भेवा ॥
दो० जल घृतसूं रक्षा करौ, मूरख हाथ न देव ।
ढीलौ कर नहिं बांधिये, ग्रन्थ कहत यह भेव ॥
सम्प्रदाय शुकदेव मुनि, चरणदास गुरु द्वार ।
परमधर्म भागवत मत, भक्ति अनन्य विचार ॥
पद ॥
जय जय राधे कृष्ण मुरारी, जय जय व्यास सकल गुनगुनी ।
जय जय महाबिदेह जनकजी, श्रीशुकदेव अवतार मुनी ॥
इनको नामरटे निशिवासर, जीभरहै हरिभक्ति सनी ।
चरणदास सुख बास लहै, नित पास रहै यही आसबनी ॥
इति श्रीचरणदासजीकृत भक्तिसागर सम्पूर्णम ॥

श्रीः ॥
श्रीशुकदेवाय नमः ॥
अथ श्रीचरणदासजीकृत जागरणमाहात्म्यं
प्रारभ्यते ॥
छप्पै ॥
प्रथम सुमिरि गुरु चरण बहुरि सुमिरूं हरि चरणा ।
गुरु कूं करूं प्रणाम आय साधों की शरणा ॥
गुरु किरपा सों हिरदै ज्ञान और बुधि परकाशे ।
गुरु किरपासों तिमिर अज्ञान दुरमत सब नाशे ॥
गुरु शुकदेव के चरण चित्त सदा सर्वदा राखिये ।
कहै चरणदास आधीनहो जु दुबिधा मनकी नाखिये ॥
दो० अब मैं विनती करतहूं, श्री सतगुरु महराज ।
दयाकरो आधीन पर, मो सिरके सिरताज ॥
तनमन निवछावर करूं, दोउ कर लेउँ वलाय ।
चरणदास शुकदेव के, चरणन पै बलिजाय ॥
तिमि अज्ञान मेरो हरो, ज्ञान देउ प्रगटाय ।
कृपाकरो मों पतित पै, रहूं चरण लिपटाय ॥
तुमसों दाता और को, जाहि नवाऊं शीश ।
मनसा वाचा कर्म करि, तुमहीं मेरे ईश ॥
शुकदेवगुरु सुनलीजिये, मोकूं करो सनाथ ।
ज्ञानभक्ति जासे बढ़े, सो कहिये हो नाथ ॥
गुरुबचन ॥
दो० सुनो शिष्य अबकहतहूँ, अद्भुत कथा पुनीति ।
निहचे ताके सुनेतें, बढ़े भक्ति और प्रीति ॥
एक समय श्रीकृष्णसों, कहत युधिष्ठिर राव ।