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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 506, कुल 690 में से

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पृष्ठ 506

शब्दवर्णन । ४६५
ज्ञान ध्यान के रंगमें डूबे सोई पहुंचे जाय ॥
गुरु शुकदेव बताई हमको जबसों बाढ़ी प्रीति ।
चरणदासहु अति ललचाये सुनि सुनि ह्वांकी रीति ॥
साधौ प्रेम नगर के माहि होरी होयरही ।
जबसूं खेली हमहूं चितदै आपनहूं को खोयरही ॥
बहुतन कुल अरु लाज गँवाई रहो न कोई काम ।
नाचि उठैं कभी गावन लागैं भूले तन धन धाम ॥
बहुतन की मति रंग रँगी है जिनको लागो प्रेम ।
बहुतनको अपनी सुधि नाहीं -कौन करै ऐसो नेम ॥
बहुतन को गद्गदही वांणी नैनन नीर ढराय ।
बहुतनको बौरापन लागो ह्वांकी कही न जाय ॥
प्रेमीकी गति प्रेमी जानै जाके लागी होय ।
चरणदास उस नेह नगरकी शुकदेवा कहि सोय ॥
कोई जानै संत सुजान उलटे भेदकूं ।
वृक्ष चढ़ो माली के ऊपर धरती चढ़ी अकास ।
नारि पुरुष विपरीतभये हैं देखत आवै हास ॥
बैल चढ़ो शंकर के ऊपर हंस ब्रह्म के शीश ।
सिंह चढ़ो देवी के ऊपर गुरुही की बखशीश ॥
नाव चढ़ी केवट के ऊपर सुतकी गोदी माय ।
जो तू भेदी अमर नगरको तौ तू अर्थ बताय ॥
चरणदास शुकदेव सहाई अब कह करिहै काल ।
बांबी उलटि सर्प में पैठी जबसूं भये निहाल ॥
इति श्रीचरणदासकृत शब्द सम्पूर्णम् ॥