भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
केवल कुंभक जानिये, साधै ताहि विशेख ॥
त्रिकुटी में तीरथ अगम, तिरवेणी जेहि नाम ।
न्हाय योगकी युक्ति सूं, पूरण हो सब काम ॥
रणजीत कहैं जहाँ न्हाइये, त्रिकुटी तीरथ धाम ।
नित परबी जहाँ होत है, भजनकरो निष्काम ॥
चौपाई ॥
जा तीरथ को पवन न लागै । जा तीरथ में जन अनुरागै ॥
जा तीरथ में रतन अनेका । पूरे गुरुसों मिलमिल देखा ॥
वा तीरथमें जो कोइ 'न्हावै । भवसागर में बहुरि न आवै ॥
जहां न चन्द सूर नहिं तारे । गुंरुगम पहुँचे अति मतवारे ॥
जा तीरथका बँधा जो नीर । उज्ज्वल निर्मल गहिर गँभीर ॥
ब्रह्मा विष्णु जहां त्रयदेवा । योग युक्ति में लावैं सेवा ॥
बारह मास दामिनी दमकै । सोन पटीला जुगुनू झमकै ॥
रणजित मीत बास जहाँ कीजै । नित अस्नान महासुख लीजै ॥
छप्पै ॥
अमरी वजरी साध बायु सरने नहिं पावै ।
द्वादश अंगुल प्राण सुरतदे ताहि घटावै ॥
मौन गहै नितरहै अल्प सूक्ष्म सो बोलै ।
एकबार आहार जँभाई कबहुँ न खोलै ॥
बांधैसो जाय दृढ़ छीकको अनहद धुनि अति गाजई ।
भन चरणदास शुकदेव बल सुयोग युक्ति इमि साजई ॥
दो० मन पवना वश कीजिये, ज्ञान युक्तिसों रोक ।
सुरति बांधि भीतर धसै, सूझै काया लोक ॥
मन हिरदे में रहत है, पवन नाभिके माहि ।
इन्द्री रोकै ये रुकें, और कछू बिधि नाहिं ॥