भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ४६१
शिर सों सकुच उतारि चदरिया पियसों रंग बढ़इये ॥
रूप न रेख न सूरति मूरति ताके बलि बलि जइये ।
अचल अजर अविनाशी सोई सम्मुख दरशन पइये ॥
सत चेतन आनन्द सदाही निर्भय ताल बजइये ।
पाप पुण्य की शंका त्यागो जहां मर्याद न पइये ॥
ओलो नीर विचारौ जैसे यों आपन विसरइये ।
चरणदास वासना तजिकै सागर बूंद समइये ॥
राग सोरठ ॥
हिलिमिलि होरी खेलि लईहो बालमां घर पाइया ।
पांच सखी पच्चीस सहेली आनंद मंगल गाइया ।
समझ बूझका चोवा चरचा भर्भगुलाल उड़ाइया ॥
दुई गई जब इच्छा कैसी खेलन सकल बहाइया ।
चरणदास बासना तजिकै सागर लहर समाइया ॥
होरी राग सोरठ ॥
कांसू खेलै को होरियां हो बालमनाहीं मैं नहीं ॥
अबिर गुलाल अरगजा नाहीं रंग नहीं गागर नहीं ।
ताल मृदंग झाँझ डफ नाहीं राग नहीं रागिनि नहीं ॥
फाग महीना वा घर नाहीं कन्थ नहीं कामिनि नहीं ।
चरणदास नहीं तब हरिकहुकैसो सबकुछ है और कुछ नहीं ॥
होरी राग धमारि ॥
आदिपुरुष अविगत अविनाशी नाना कौतुकै लावैरे ।
आपहि आप और नहिं कोई बहुतक रूप बनावैरे ॥
आपहि मोहनलाल ग्वालहो मुरली आनि बजावैरे ।
आपहि ब्रजकी बनिता होकर वनको दौरी आवैरे ॥
१ बर्फ २ खेल ॥