भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
आनि१ धर्म और क्रिया कर्म में दीन्हों मोहिं भर्माय ॥
भटकत भटकत जब मैं हारी चरण सखी गहे आय ।
शुकदेव साहब किरपा करिकै दीन्हो अलख लखाय ॥
देखतही सब भ्रम भय भागे शिरसूं गई बलाय ।
चरणदास जब प्रीतम पायो दर्शन किये अघाय ॥
हरि पीव पाइया सखी पूरण मेरे भाग ।
सुखसागर आनन्द में मैं नित उठि खेलूं फाग ॥
चोवा चन्दन प्रीतिकै सखी केशरि ज्ञान घसाय ।
पुहुप वाससूं जो वह झीनो ताके अंग लगाय ॥
बेरंगी के रंगसूं सखी गागर लई भराय ।
शून्य महल में जायकै सखी पियपर दई ढरकाय ॥
भरम गुलालजब कर लियो सखी बालम गयो दुराय ।
सतगुरुने अंजन दियो तब सम्मुख दरशे आय ॥
ताली लाई प्रेमकी सखी अनहद नाद बजाय ।
सर्वमयी पिय पायकै हम आनँद मंगल गाय ॥
रलमिल प्रियतम द्वै गये सखी दुईगई सब भाग ।
चरणदास शुकदेव दयासूं पायो अचल सुहाग ॥
मैं तो ह्वां खेलूंगी जाय जित मेरो पिया बसै ।
व्याधि उपाधि न संशयकोई आनंदहि आनंद लसै ॥
नितही फागुन एकरस होरी खंडित कबहुं न होय ।
मुक्ति पदारथ फगुवा पइये आपा सरवस खोय ॥
जिनके रसिया शिव ब्रह्मादिक खेलत चावहिचाव ।
ऋषिमुनिदेवत खेलत निशिदिन करिकरिबहुतकभाव॥
भाग बड़े उन्हीं के जानो वा पदलागे धाय ।
१ शपथ ॥