भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
आपहि गोपी कान्ह विराजै आपहि रासरचावैरे ।
अन्तर्द्धान होय फिर आपहिआपहि ढूंढ़न धावैरे ॥
आपहि व्याकुल अप देखनकूं लीला प्रेम बनावैरे ।
परगट होय सबन सुख देवै आपहि रंग बढ़ावैरे ॥
भोर भये जब खेल मचावै आप आप रहजावैरे ।
कबहुँ एक अनेक कभी हैं विधि निषेध गति भावै रे ॥
सत चित आनंद रूप सदाही शुकदेव हो समुझावैरे ।
चरणदास हो समझि समझिकरि आपहिआनंदपावैरे ॥
होरी राग धनाश्री ॥
साधौ बुद्धि विवेक सँभारि होरी खेलिये ॥
सांख्ययोग की युक्तिसों कीजै नित्यअनित्य विचार ।
माया सकल निवारिकैरे आतम रूप निहार ॥
पांचतत्त्व तीनों गुण परगट इनको दो दिन फाग ।
इकरस सत पद जानि लेरे ताहीसों मन पाग ॥
निश्चय चोवा लाइयेरे भर्म गुलाल उड़ाय ।
देह करमके रंगकीरे गागर दे ढरकाय ॥
जीवन मुक्त जु फगुवा पइये गुरुके चरणन लाग ।
जो कोई ऐसी होरी खेलै जाके ऊंचे भाग ॥
चरणदास कहैं शुकदेव बताई हमहूँ खेलैं जाग ।
प्रियतम प्रियतम जित तित देखे द्वेष गयो अरु राग१ ॥
सखीरी ततम२तले संग खेलिये रस होरी हो ।
निर्गुण निज निर्धार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी शील शृङ्गार सवांरिये रस होरी हो ।
दुविधा मानि निवार सरस रस होरी हो ॥
१ प्रेम २ ओंकार ॥