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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 501, कुल 690 में से

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पृष्ठ 501

४६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दम्भ पाखण्ड गहे करमें डफ डूबड़ डूबड़की तारी ।
त्रैगुण तार तंबूरा साजे आशा तृष्णा गति धारी ॥
पाप पुण्य दोउ लै पिचकारी छूटत हैं बारी वारी ।
सम्मुख ह्वै करि जो नर खेलौ ताके चोट लगी 'कारी ॥
लोभ मोह अभिमान भरो है ले माया गागरि डारी ।
राजा परजा भोगी तपसी भीजि रहे हैं संसारी ॥
कुबुधि गुलाल डारि मुख मींजो काम कला पुटली मारी ।
युग युग खेलत यों चलि आई काहू ते नाहीं हारी ॥
जड़ चेतन दोउ रूप सवाँरे एक कनक दूजी नारी ।
पांच पचीसलिये सँग अबला हँसि हँसि मिलि गावत गारी ॥
चतुरा फगुवा दै दै छूटे मूरख को लागी प्यारी ।
चरणदास शुकदेव बतावैं निर्गुण ज्ञान गली न्यारी ॥
होरी राग काफी ॥ ''
ज्ञानरंग हो हो हो होरी ॥
निहरूपी बहुरूप धरे हैं नाना भेष करोरी ।
देखन निकसी अपने पियाको समझ भवन की पौरी ॥
बुद्धि विचार शिंगार सजो है निश्चय माथे रोरी ।
जीवन्मुक्त हुलास बढ़ो है परगट खेल मचोरी ॥
खेलत खेलत आपन बिसरो लागी कौन ठगोरी ।
आपा खोजि रामहीं पाये मैं नाहीं निकसोरी ॥
चरणदास नहिंहरिही हरि हैं आपहि आप रहोरी ।
उपजै कौन कौन अब बिनशै बंध मुक्त केहि ठौरी ॥
होरी राग धनाश्री ॥
साधौ घूंघुट भर्म उठाय होरी खेलिये ॥
वेद पुराण लाज तजिबारी इनमें ना उरझैये ।
१ असर कर जानेवाली ॥