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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 507

४६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ भक्तिसागर प्रारम्भः ॥
अथ छपै छन्द कवित्त चौपाई दोहा प्रारम्भ ॥
छप्पै ॥
श्री ब्यास को पुत्र तासु कों दास कहाऊं ।
सदा रहूं हरि शरण और ना शीश नवाऊं ॥
साधनसूं यह चहूं मोहिं यह बात दृढ़ावो ।
माया जाल संसार तासुसों वेगि छुटावो ॥
अहो श्रीब्रजनाथ बिनय सुनि लीजिये ।
चरणदास को भक्ति कृपा करि दीजिये ॥
गुरु ईश्वर गुरु ईशरीझ गुरु राम बतावैं ।
गुरु काटैं यमफांस बिपति सब अघै नशावैं ॥
गुरुदेवन के देव भेव ब्रह्मादि लखावैं ।
गुरु भवसागर तार पार वह लोक बसावैं ॥
चरणदास यह जानिकै सतसंगति हरिको भजो ।
शुकदेव चरण चितलायकै सो झूठकानि दुबिधा तजो ॥
पग तब होवैं शुद्ध साधुके मग को धावै ।
हस्त शुद्ध तब होयँ दोऊकर शीश नवावै ॥
नैन शुद्ध जब होयँ साधु के दर्शन पावै ।
रसन शुद्ध तब होय रामगुण मुख सों गावै ॥
भनै चरणदास सब शुद्धहो जब चरण परस गुरुदेवके ।
वै आतम तत्त्व बिचार देखकर दर्शन अलख अभेवके ॥
दो० दुखमेटन सुखके करन, चरणदास वे साध ।
दाता ज्ञान विज्ञान के, देवैं मता अगाध ॥