भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिसागरवर्णन । ४६७
साध मुक्ति नहिं चहत हैं, सिद्ध न चाहत साध ।
स्वर्गलोक नहिं चहत हैं, जिनका मता अगाध ॥
चौपाई ॥
इड़ा पिंगला सुखमन धारो । आसन बज्र नागिनी टारो ॥
द्वादश अंगुल होय वेध षट चक्कर लीजै ।
जब बाजै अनहद तूर जहां मन निज कर दीजै ॥
खेचरी मुद्रा त्रिकुटी आवै । अमृत पियै परम सुख पावै ॥
मेरुदण्डको प्राण चलावै । शून्य शिखर जब नगरी पावै ॥
जा नगरीमें चन्द न भान । पहुँचै साधू चतुर सुजान ॥
जाति पांति जहँ नाम न नाता । श्वेत श्याम पीता नहिं राता ॥
योग यज्ञ तप जहां न दाना । तीरथ बर्त्त जहां नहिं न्हाना ॥
किरिया कर्म जहां नहिं पूजा । मैं तू है नहिं एक न दूजा ॥
जहां न सांझ द्यौस नहिं राता । एकै ब्रह्म अखंड विधाता ॥
चरणदास रामकी घाटी पहुँचै गुरुमत शूरा ।
ओछी बुद्धि बाद बहुठानैं करणी करै सो पूरा ॥
छप्पै ॥
बैठ गुफाकेमध्य योगकी युक्ति बिचारै ।
आप अकेलो रहै और ना मनुष निहारै ॥
चारिबारि नितकरै जाप ॐकार अराधै ।
सूक्ष्म करै आहार ओगरो पतली साधै ॥
आसन पद्म लगाय कै सीधी राखै मेर ।
ठोढ़ी हिये लगाइये पलक झांपकरि हेर ॥
दो० कुंभक आठ प्रकारके, तिनमें उत्तम एक ।