सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 508, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 508

भक्तिसागरवर्णन । ४६७
साध मुक्ति नहिं चहत हैं, सिद्ध न चाहत साध ।
स्वर्गलोक नहिं चहत हैं, जिनका मता अगाध ॥
चौपाई ॥
इड़ा पिंगला सुखमन धारो । आसन बज्र नागिनी टारो ॥
द्वादश अंगुल होय वेध षट चक्कर लीजै ।
जब बाजै अनहद तूर जहां मन निज कर दीजै ॥
खेचरी मुद्रा त्रिकुटी आवै । अमृत पियै परम सुख पावै ॥
मेरुदण्डको प्राण चलावै । शून्य शिखर जब नगरी पावै ॥
जा नगरीमें चन्द न भान । पहुँचै साधू चतुर सुजान ॥
जाति पांति जहँ नाम न नाता । श्वेत श्याम पीता नहिं राता ॥
योग यज्ञ तप जहां न दाना । तीरथ बर्त्त जहां नहिं न्हाना ॥
किरिया कर्म जहां नहिं पूजा । मैं तू है नहिं एक न दूजा ॥
जहां न सांझ द्यौस नहिं राता । एकै ब्रह्म अखंड विधाता ॥
चरणदास रामकी घाटी पहुँचै गुरुमत शूरा ।
ओछी बुद्धि बाद बहुठानैं करणी करै सो पूरा ॥
छप्पै ॥
बैठ गुफाकेमध्य योगकी युक्ति बिचारै ।
आप अकेलो रहै और ना मनुष निहारै ॥
चारिबारि नितकरै जाप ॐकार अराधै ।
सूक्ष्म करै आहार ओगरो पतली साधै ॥
आसन पद्म लगाय कै सीधी राखै मेर ।
ठोढ़ी हिये लगाइये पलक झांपकरि हेर ॥
दो० कुंभक आठ प्रकारके, तिनमें उत्तम एक ।