भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिसागरवर्णन । ४६६
छप्पै ॥
सूक्ष्म करै अहार जीति धरणी जब लेई ।
नीर जीति जब लेय बिंद जाने नहिं देई ॥
मोह लोभ जब तजै अग्निको जीति मिलावै ।
पवनजीति जब लेय गगनको बाध चलावै ॥
अरु हर्ष शोक समकरि गनै पांच जीत एकैकरै ।
भन चरणदास साधनगहै होय प्रकाश कारजसरै ॥
दो० गगन मध्य जो कमल है, बाजत अनहद तूर ।
दलहजारको कमल है, पहुँचै गुरु मत शूर ॥
गगन मँडल के कमलमें, सतगुरु ध्यान निहार ।
चरणदास शुकदेव परसै, मिटै सकल विकार ॥
सहसदल के कमलमें, रूप अगम आपार ।
सोहं सोहं जाप सहजै, होत एक हजार ॥
छप्पै ॥
नौ नाड़ीकी खैंच पवन लै उरमें दीजै ।
बज्जर ताला लाय द्वार नौ बन्ध करीजै ॥
तीनौ बन्ध लगाय अस्थिर अनहद आराधै ।
सुरति निरतिका काम राह चल गगन अगाधै ॥
शून्य शिखर चढ़िरहै दृढ़ जहां जाय आसन करै ।
भने चरणदास ताड़ीलगै सो रामदरश कलिमल हरै ॥
चौथा पद निर्वाण धाम बेगमपुर कहिये ।
गुण अतीत जहाँ रामनिरखि नैनन सुख लहिये ॥
अद्वै रूप अखण्ड मण्ड मण्डल बहु बंका ।
जहां काल नहिं ज्वाल शब्द अति उठत निशंका ॥
निज पारब्रह्म चौरी रची शिव सहित शक्ति फेरी करैं ।