भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
शब्दवर्णन । ४१७-
हिलमिल हरियश गाइये दृढ़ता जीकी बाहिं ॥
जन्म सफल जब होयगो कुल पारायण होय ।
एकरु सौ पीढ़ी तरैं रसना हरिगुण पोय ॥
यही स्मृति यहि वेद है यहि साधन को भेव ।
चरणदास हिय में धरौ कहिया गुरु शुकदेव ॥
और न मीता कोय हेली समुझि सँभारो रामजी ।
जीवत की रक्षा करै मुये मुक्त करें तोहिं ॥
अरु सब स्वारथके सगेरी अन्त न कोई साथ ।
सुखमें सबही रल मिलै दुखमें सुनै न बात ॥
छल करि मनकी बूझले पाछे दारै घात ।
तिनको तू अपनो कहै सो दोषी है जात ।
भेद न अपनो दीजियेरी अरी हेली कोऊ कैसो होय ।
हिरदय की हिरदय रहैं हरिही जानै सोय ॥
कै गुरु अपनो जानिये कै सतसंगत वास ।
गुरु शुकदेव बतावई देख चरणहींदास ॥
यह नहिं अपना देश हेली ह्वां नहिं मनको दीजिये ।
अपने घरको चालियेरी करि योगिनिको वेष ॥
कानन मुद्रा योगकीरी अरी हेली ज्ञान जटा शिरधारि ।
चोला भक्ति सोहावनो धीरज आसन मारि ॥
सेली¹ सतवैराग की अरी हेली शील विभूति रमाय ।
यतकी सींगी कीजिये वारंवार बजाय ॥
कर्म जलाय धूनी करो झूमौं दशवेंद्वार ।
अमल सुधारस पीजिये बाढ़ रंग अपार ॥
इसबाने पियको मिलौरी अरी हेली सदासुहागिनिहोय।
१ गुदरी ।
४१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरु शुकदेव बतावई चरणदास बन सोय ॥
अथ ज्ञान अंग ॥
राग करषा ॥
साधो गुरु दया आपको यों विचारा ।
झूठ अरु सांचको समुझिकरि मूलसों माया अरु ब्रह्मको
किया न्यारा ॥ पांच अरु तीन गुण देहको ठाटहै तासुको लगत
है सब विकारा । ब्रह्म अडोल अबोल अतोल है और निर्लिप्त
हरि निर्विकारा ॥ जाके रूप नहिं रेख अरु नाम सूरत नहीं सोई
निज तत्त्वहै निराकारा । सुरति अरु निरति दोऊ जहां थकिरहैं
तहां बिन भान अतिहै उज्यारा ॥ बिना गुरुमुखी कोउ पहुँचि
हां ना सकै कनक अरु कामिनी घेरि मारा । चलै सोइ सन्त
निर्वाण द्वै शूरमा ज्ञान अरु ध्यानको कर अहारा ॥ आवा अरु
गमनकी टूटि फांसी गई पायो गुरु भेद गयो तिमिर सारा ।
चरणदास शुकदेव मिले भर्म सब दलि मले होय रणजीत
अविगति निहारा ॥
साधो ब्रह्म दरियाव नहिं वारपारा ।
आदि अरु मध्यकहुं अन्त सूझै नहीं नेतिही नेति वेदन पुकारा ॥
मूल परकिर्त्तिसी बहुत लहरें उठैं सकै को पाय गुणहैं अपारा ।
विरंचि महादेवसे मीन बहुतै जहां होय परगट कभी गोत मारा ॥
तासुमें बुदबुदे अण्ड उपजें मिटें गुरु दई दृष्टि जासों निहारा ।
छका छवि देखिकै अतिथिका भेषकरि जगे जब भाग निरखी
बहारा ॥ मरजिया पैठिया थाह पाई नहीं थका हांईरहा फिर न
आया । गयाथा लाभको मूल खोया सबै भया आश्चर्य आपन
गवाँया ॥ पाल बिन सिन्धु अरु निरा आनन्द है आपही आप
शब्दवर्णन । ४१६
हौ निराधारा । चरणदास शुकदेव दोऊ तहां रलमिले तुरतहीं
मिटिगया खोज सारा ॥
राग धनाश्री ॥
सहजगति ज्ञान समाधि लगाई ।
रूप नाम जहाँ किरिया छूटी हू मैं रहन न पाई ॥
बिन आसन बिन संयम साधन परमातम सुधि पाई ।
शिव शक्ती मिलि एक भये हैं मन माया न हिराई ॥
मगनरहौं दुख सुख दोउ मेटै चाह अचाह मिटाई ।
जीवन मरण एक सों लागै तबते आप गवाँई ॥
मैं नाहीं नख शिख हरि राजैं आदि अन्त मध्याई ।
शङ्का कर्म कौनको लागै काकी होय मुकताई ॥
सकल आपदा व्याधि टरी सब दुई कहां मो माहीं ।
सब हमहीं रामा नहिं पइये सब रामा हम नाहीं ॥
नित आनन्द काल भय नाहीं गुरु शुकदेव समाधी ।
चरणदास निज रूप समाने यह तौ समझ अगाधी ॥
निरन्तर अटल समाधि लगाई ।
ऐसी लगी टरै नहिं कबहूं करणी आश छुटाई ॥
काको जप तप ध्यान कौन को कौन करै अब पूजा ।
कियो विचार नेक नहिं निकसै हरिबिन और न दूजा ॥
मुद्रा पांच सहजगति साधी आलस आसन सोई ।
सब रस ब्रह्म मूल जब शोधा आप विसर्जन होई ॥
भूलो बन्ध मुक्तिगति साधन ज्ञान विवेक भुलाना ।
आतम अरु परमातम भूला मन भयो तत गलताना ॥
अंचल समाधि अन्त नहिं ताको गुरु शुकदेव बताई ।
चरणदास को खोज न पइये सागर लहर समाई ॥
४२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
राग सोरठ ॥
हो अवगति जो जानै सोइ जानै ।
सब की दृष्टि परे अविनाशी कोइ कोइ जन पहिंचाने ॥
रेख जहां नहि खिंचि सकै रे ठहरै ना ह्वां राई ।
चीत चितेरा ना सकैरै पुस्तक लिखा न जाई ॥
श्वेत श्याम नहिं राता पीरा हरी भांति नहिं होई ।
अति असूंध अदृष्ट अकथ है कहि सुनि सकै न कोई ॥
सर्वस में अरु सब देशन में सर्व अंग सब माहीं ।
कटै जलै भीजै नहिं छीजै हलै चलै वह नाहीं ॥
नहिं गाढ़ा नहिं झीना कहिये नहिं सूक्ष्म नहिं भारी ।
बाला तरुणा बूढ़ा नाहीं ना वह पुरुष न नारी ॥
नहीं दूर नहिं निकट हमारे नहीं प्रकट नहिं गूझै ।
ज्ञान आँख की पलक उघारौ जब देखौरे सूझै ॥
वासों उतपति परलय होई वह दोऊते न्यारा ।
चरणदास शुकदेव दया सों
शब्दवर्णन । ४२१
भीतर बाहर पूरि रह्यो है अण्ड पिण्ड सों न्यारा ।
शुकदेवा गुरु भेद बतायो चरणहिंदासा वारा ॥
राग पर्ज ॥
गुरू हमारे अलख लखाया हो ।
देखतही ऐसे गये जल नोन घुलाया हो ॥
नखशिख ढूंढूं आपको कहिं आप न पाया हो ।
रामहिं रामा है रहा हम मूल गवाँया हो ॥
बरत करैं हम होय तौ सब नेम भुलाया हो ।
फल चाहनवारो गयो हरि हेरि हिराया हो ॥
ज्ञाता मिटिज्ञानू मिटै अरु ज्ञेय मिटाया हो ।
सोच समझ सबहीगई चरणदास नशाया हो ॥
राग धनाश्री व विलावल व सोरठ ॥
साधो भाई यह जग यों सत नाहीं ।
मीन पहार समुद विच मिरगा खेत अकाशे माहीं ॥
जलकी पोट कोट धूवांको अखल ब्रह्मको तीरं ।
बांझको पूत सींग शशशा को मृगतृष्णा को नीरं ॥
स्वप्नको भूप द्रव्य स्वप्नेको अरु जंगलको द्वारं ।
गणिका शील नाच भूतनको नारिसों ब्याहत नारं ॥
मावश को शशि रैनि को सूरज दूध नरन की छाती ।
यह सब कहनि कहावनि देखी चींटी ले भागी हाथी ॥
ऐसहि झूठ जगत सच नाहीं भेद विचारो पायो ।
चरणदास शुकदेव दया सों सांचहि सांच मिलायो ॥
४३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग रामकली ॥
सतगुरु अक्षर मोहिं पढ़ायो ।
लेखन लिखान स्याही सेती ना वह काग़ज़ मध्य चढ़ायो ॥
ना लगमात न माथे बिन्दी अरुण पीत नहिं काला ।
ऐँड़ा बेंड़ा टेढ़ा नाहीं ना वह आल जँजाला ॥
ताको देखि थकी सब करणी सबहीं साधन भागे ।
सिद्धैं भईं भोरके तारे मुक्ति न दीखै आगे ॥
जाके पढ़े पढ़न सब छूटै आशा पोथी फारी ।
मैंतो भया करम का हीना कहै सरस्वति ठाढ़ी ॥
गुरु शुकदेव पढ़ायो अक्षर अगम देश चटशाला ।
चरणदास जब पण्डित हुये धारि तिलक अरु माला ॥
वह अक्षर कोइ बिरला पावै ।
जा अक्षर के लाग न बिन्दी सतगुरु सैनहिं सैन बतावै ॥
क्षरही नाद वेद अरु पण्डित क्षरज्ञानी अज्ञानी ।
बांचन अक्षर क्षरही जानौ क्षरही चारों वानी ॥
ब्रह्मा शेष महेश्वर क्षरही क्षरही त्रैगुण माया ।
क्षरही सहित लिये अवतारा क्षर ह्यांतक जहाँ माया ॥
पांचौ मुद्रा योग युक्ति क्षर क्षरही लगै समाधा ।
आठौ सिद्धि मुक्तिफल क्षरही क्षरही तन मन साधा ॥
रवि शशि तारामण्डल क्षरही क्षरही धरणि अकासा ।
क्षरही नीर पवन अरु पावक नरक स्वर्ग क्षर वासा ॥
क्षरही उतपति परलय क्षरही क्षरही जाननहारा ।
चरणदास शुकदेव बतावैं निरअक्षर है सबसों न्यारा ॥
शब्दवर्णन । ४२३
राग भैरव ॥
हरिको सकल निरन्तर पाया ।
माटी भाँड़े खाँड़ खिलौने ज्यों तरवरमें छाया ॥
ज्यों कंचन में भूषण राजै सूरत दर्पण मांहीं ।
पुतली खम्भ खम्भमें पुतली दुतिया तौ कछु नाहीं ॥
ज्यों लोहे में जौहर परगट सूतहि तानैबानै ।
ऐसे राम सकल घटमाहीं बिन सतगुरु नहिं जानै ॥
मेहँदी में रँग गन्ध फुलन में ऐसे ब्रह्मरु माया ।
जलमें पाला पाले में जल चरणदास दरशाया ॥
राग ईमन ॥
सखीरी हिलमिल रहिया पीव ।
पुष्प मध्य ज्यों गंध विराजे पिंड माहिं यों जीव ॥
जैसे अग्नि काठके अन्तर लाली है मेहँदीव ।
माटी में भाँड़े हैं तैसे दूध मध्य ज्यों घीव ॥
शुकदेवा गुरु तिमिर नशायो ज्ञान दियो कर दीव ।
चरणदास कहैं परगट दरशो अमर अखंडितसीव् ॥
राग सारंग ॥
साधो अचरज निर्गुण रामका ।
नाममर्याद ठिकाना नाहीं नाहीं द्वारा धामका ॥
मात पिता कुल गोत न वाके भेष न पुरुषा वामका ।
रूप न रेख नहीं कछु किरिया लेश नहीं ह्वां नामका ॥
सरवन लोचन रसनहिं नासा त्वचा न चोला चामका ।
आदि न अन्त न अरधै उरधै नहि ठिंगना नहिं लाँबका ॥
देखा सुना कहा नहिं जाई नहिं धौला नहिं श्यामका ।
२३
४२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास शुकदेव सुभावे नहिं बिनशै नहिं यामका ॥
राग सारँग ॥
घट घट में रमता रमिरह्यो ।
चेतन तजै भजै जल पाहन मूरख भ्रममें भ्रमि रह्यो ॥
एक अखण्ड रह्यो सब व्यापक लख चौरासी समरह्यो ।
प्रकट भानु ऐसे हरि दरशौं संपुट में नहिं खमरह्यो ॥
आपाजानि भूल फिर आपन नखशिखसों नहिं हमरह्यो ।
चरणदास शुकदेवहि रलगयो वचन विलासन गमरह्यो ॥
राग मालश्री ॥
तेरी गति अपरम्पार पार कैसे पइयेहो ।
योग युक्ति युगताहारे उनहूँ सुधि नहिं पाई ।
चित बुधिमनकी गमि जहाँ नाहीं सुरतिथकै थकि जाई ॥
नेति नेति कहि निगम पुकारै कहु कोउ कैसे पावै ।
ध्यान न लागै ज्ञान न सूझै अनभयहू फिरि आवै ॥
निर्गुणरूप निरालम्ब आसन केहि विधि लखिहै कोऊ ।
ब्रह्मा शेष महेश्वर थाके सकल शिरोमणि सोऊ ॥
वाणी शब्द रहित तुरियापद गुरु शुकदेव सुनायो ।
चरणहिंदास समझ सब बिसरी खोजत खोज हिरायो ॥
वा बिन और न कोय वही गुलजारी रे ।
जग फुलवारी फूलि रही है नाना रंग अनंत ।
आदि वृक्ष ताकी सब लीला नितही रहत वसंत ॥
पांच डार पाँच रंग हैं रे शाखा बहुत बिचार ।
अद्भुत गति कछु कहत न आवै फूले पुष्प अपार ॥
पात फूल फल सोहने रे ह्वै ह्वै छिपि छिपि जाहिं ।
निश्चल द्रुम इकरस रहैरे उतपति परलय नाहिं ॥
शब्दवर्णन । ४२५
बिन सींचे बिन मूल कोरे अचरज अधिक सुबास ।
जित तित खिलो शुकदेव हेरे नहीं चरणही दास ॥
राग बिहागरा ॥
तेरे बहुत रूप बहु बानी ।
तूही एक अनेक भयो है जिन जानी जिन जानी ॥
रवि शशि विष्णु महेश्वर तूही तूही चतुर बिनानी ।
ऋषिमुनि देवत सिद्ध तुही है तूही है ब्रह्मज्ञानी ॥
तुवबिन दूजो और न पइये गावत वेद पुरानी ।
कोउ कहै मायाहै दूजी तौ वह कितसों आनी ॥
तू आकाश पवन अरु पावक तू धरती तू पानी ।
तीनौगुण तोही सों निकसे तोही माहिं समानी ॥
दश ओतार तूही धर आयो तू इष्टी तू ध्यानी ।
तूही रास तुहि रास खिलइया तू ठाकुर ठकुरानी ॥
तूही गुरु शुकदेव विराजै चरणदास सिख मानी ।
गुप्त प्रकट सब तूही तूहै अद्भुत लीला ठानी ॥
यह सब एक एकही होई ।
जाके ऐसी निश्चय आव जीवन्मुक्ता सोई ॥
जैसे मनका डोर गुहे है काहू माला पोई ।
एकहि श्वास सकल घट व्यापक भूलो कहै जुदोई ॥
हमहूँ वही वही जग सारा शिव ब्रह्मादिक वोई ।
एकहि ब्रह्म अचल अविनाशी और न दुतिया कोई ॥
जिन समझा तिन आनँद पाया बिनसमझे दिया रोई ।
चरणदास नहि हरिही हरि हैं सब मैं मैं में खोई ॥
जबते एक एक करि माना ।
कौन कथै का सुननेहारा कोहै किन पहिं चाना ॥
४२६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तब को ज्ञानी ज्ञान कहां है ज्ञेय कहां ठहराना ।
ध्यानी ध्येय जहां नहिं पइये तहां न पइये ध्याना ॥
जब कहां बंध मुक्त भुगतइया काको आवन जाना ।
को सेवक अरु कौन सहायक कहां लाभ कित हाना ॥
जब को उपजै कौन मरत है कौन करै पछिताना ।
को है जगत जगत को कर्त्ता त्रैगुण को अस्थाना ॥
तू तू तू अरु मैं मैं नाहीं सबही दे बिसराना ।
चरणदास शुकदेव कहां है जो है सो भगवाना ॥
राग केदार व सोरठ ॥
सो लखि हम निर्गुण झरि पाई ।
जहां न वेद कतेब पहुँचै नहीं ठकुराई ॥
चारवरण आश्रम नहीं कर्म ना काई ।
नरक अरु वैकुंठ नाहीं नहीं तन ताई ॥
प्रेम अरु जहाँ नेम नाहीं लगन ना लाई ।
आठ अँग जहँ योग नाहीं नहीं सिद्धाई ॥
आदि अरु जहाँ अंत नाहीं नहीं मध्याई ।
एक ब्रह्म अखण्ड अविचल माया नाराई ॥
ज्ञान अरु अज्ञान नाहीं नहीं मुकताई ।
चरणदास शुकदेव सम तहाँ दुई जरिजाई ॥
राग सोरठ व नट बिलावल ॥
सो नैना मोरे तुरिया ततपद अटके ।
सुरति निरतिकी गम नहिं सजनी जहां मिलनको लटके ॥
भूला जगत बकत कछु औरै वेद पुराणन ठटके ।
शब्दवर्णन । ४२७
प्रीति रीतकी सार न जानैं डोलत भटके भटके ॥
किरिया कर्म भर्म उरझेरे ये माया के झटके ।
ज्ञान ध्यान दोउ पहुँचत नाहीं राम रहीमा फटके ॥
जग कुल रीति लोक मर्यादा मानत नाहीं हटके ।
चरणदास शुकदेव दयासों त्रैगुण तजिकै सटके ॥
राग सोरठ ॥
है कोइ जानै भेद हमार ।
सब सबमें हम सबके माहीं में मैं व्यापक मैं न्यारा ॥
हम अडोल हम डोलत निशिदिन हम सूक्ष्म हम भारा ।
हमहीं निर्गुण हमहीं सगुंण हमहीं दश अवतारा ॥
हमहा एक बहुतहो खेले हमहीं सकल पसारा ।
हमहीं ज्ञान ध्यान पुनि हमहीं हमहीं धारणहारा ॥
हमहीं आदि अन्त पुनि हमहीं हमहीं रूप अपारा ।
महाराज हम वार पार हैं हमहीं जग उजियारा ॥
हमहीं गुरु शुकदेव विराजैं हमहिं तरैं हम तारा ।
चरणदास घट हमहीं बोलैं समझै समझनहारा ॥
राग काफी ॥
मैं कोइ अजबहूँ मेरा अजब तमाशा जोर ।
मेरेहि पिण्ड खण्ड ब्रह्मण्डा मैं पूरण सब ठौर ॥
मैं ब्रह्मा मैं विष्णु महादेव मैं कमला मैं गौर ।
मैं रवि चन्द्र इन्द्र इन्द्राणी मैं गरजत घनघोर ॥
मैं गुण तीनि पांच तत्त्व मैं हीं मैं दश दिशि चहुँओर ।
मैं निहरूप रूपधरि नाना निशिदिन करत कलोर ॥
४२८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
मैं गुप्त मैं मुक्ता परगट मैंहीं भर्म झकोर ।
चरणदास मोबिन नहिं रंचक दूजा कोई और ॥
राग विहागरा ॥
गुप्तमतेकी बातरी जानै सोइ जानै ।
पशू ज्ञान अजमत को देखो अनभुस एकै सानै ॥
चलनीकी गति सबकी मति है मनमें अधिक सयानै ।
गहि असार सारको डारै निश्चल बुधि नहिं आनै ॥
हूँ गूंगो जगको नहीं सूझै सैन नहीं कोइ मानै ।
कासों कहौं अरु को सुनै सजनी कहूँ तौ को पहिंचानै ॥
सत्य ब्रह्मको जानत नाहीं मुरुख मुग्ध अयानै ।
चरणदासकह समुझतनहिंभोंदू फिरिफिरि झगरोठानै ॥
सुनिहो मुक्त मुक्त करूं तेरी ।
वेद पुराण जँजीर जरी है सबहीगत मारग मिलि घेरी ॥
तैं तौ मुक्ति बहुतकी कीन्ही जिन पापन उरझेरी ।
बन्धन सकल छुटाय काटूं जो आधीन होय तू मेरी ॥
स्वर्ग पताल ठौर नहिं तोको डोलत पेरी पेरी ।
अचल पुरुषसों जाय मिलाऊं तोहिं जानि साधनकी चेरी ॥
शुकदेव गुरु जब किरपा कीन्ही तू नाहीं कहुँ हेरी ।
चरणहिंदास वासना तजिकै आपहि आप करिहै निवेरी ॥
राग विहागरा व बिलावल ॥
अब हम ज्ञान गुरू से पाया ।
दुबिधा खोय एकता दरशी निश्चल ह्वै घर आया ॥
हिरदा शुद्ध हुआ बुधि निर्मल चाह रही नहिं कोई ।
ना कछु सुनौं न परसूं बूझं उलटि पलटि सब खोई ॥
समझभई जब आनंद पाये आतम आतम सूझा ।
सूधा भया सकल मन मेरो नेक न कहूं अरूझा ॥
मैं सबहुन में सब मोहूं में सांच यही करि जाना ।
यही वही है वही यही है दूजा भाव मिटाना ॥
शुकदेवा ने सब सुख दीन्हे तिरपत होय अधायो ।
चरणदास निकसा नहिं रंचक परमातम दरशायो ॥
राग विलाव विहागरा ॥
गुरु विन कौन डुबोवनहारा ।
ब्रह्म समुद्रमें जो कोइ बूड़ो छुटिगये सकल विकारा ॥
सिंधु अथाह अगाध अचल है जाको वार न पारा ।
वाकी लहरि मिटत वाही में कौन तरैको तारा ॥
त्रैगुणरहत सदाही चेतन ना काहू उनहारा ।
निराकार आकार न कोई निर्मल अति निर्धारा ॥
अकरी अलख अरूप अनादी तिमिर नहीं उजियारा ।
तामें अण्ड दिपत ऐसे करि ज्यों जल मध्ये तारा ॥
काल ज्वाल भै भूती नाहीं तहां नहीं भ्रमभारा ।
चरणदास शुकदेव दयासों बूड़िगयेही पारा ॥
राग सोरठ व आसावरी ॥
सतगुरु निजपुर धाम बसाये ।
जितकेगये अमर हैं बैठे भवजल बहुरि न आये ॥
योगी योग युक्ति करिहारे ध्यानी ध्यान लगावैं ।
हरिजन गुरुकी दया बिना यों दृष्टि नहीं दरशावैं ॥
पंडित मुंडित चुंडित ढूंढें पढ़ि सुनि वेद पुरानैं ।
जासों वै सब पायो चाहें सो वै नेति बखानैं ॥
जंगम यती तपी संन्यासी सबही बहदिशि धावैं ।
४३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सुरति निरतिकी गम जहाँ नाहीं वे कहौ कैसे पावैं ॥
देश अटपटा वेगम नगरी निगुरे राह न पाया ।
चरणदास शुकदेव गुरूने किरपा करि पहुँचाया ॥
राग सोरठ ॥
हमारे गुरु हरि नगर दिखायाहो ।
उलटी वाट घाट जहाँ नाहीं निजपुर वास बसायाहो ॥
चन्द न सूर गगन नहिं तारे राति दिवस नहिं पायाहो ।
नहीं तिमिर जहाँ चांदनि नाहीं नहीं धूप नहिं छायाहो ॥
मनसों अगम सुगम नहिं बुधिसों अनभय अन्त न लायाहो ।
और कहौ कैसे करि पावै निगम नेति जेहि गायाहो ॥
है प्रत्यक्ष उदय सूरज ज्यों संपुट नाहिं छिपायाहो ।
बिन गुरु गमके अंजन आंजे दृष्टि नहीं दरशाया हो ॥
जनक जहाँ शुकदेव विराजैं चरणदास मिलि धाया हो ।
जगकी व्याधि लगन नहिं पाई किरपा करि पहुंचाया हो ॥
हमारे गुरु मारग बतलाया हो ।
आन देवकी सेवा त्यागी अज अविनाशी ध्याया हो ॥
हरि पूरण परसो निश्चयसों छांड़ौ झूठी माया हो ।
इकरस आतम नितही जानौ क्षणभंगी है काया हो ॥
चाहे मुक्तकरै तन किरिया भर्म अधिक भर्माया हो ।
वो करि पेड़ बबूल शूलके आँब कहो किन पाया हो ॥
अपना खोज किया नहिं कवहूं जल पाहन भटकाया हो ।
जैसे फल सेवत सेमर को कीर अधिक पछिताया हो ॥
ज्ञानपदारथ कठिन महानिधि बिन भेदी किन पाया हो ।
चरणदास घट सोहं सोहं तामें उलटि समाया हो ॥
शब्दवाण । ४३१
राग काफी ॥
इन नैनन निराकार लहा ।
कहन सुननकी कौन पतीजै जान अजान है सहज रहा ॥
जित देखो तित अलख निरंजन अमर अडोल अबोलमहा ।
ज्योति जगत बिच मिलमिल झलकै अगम अगोचर पूरि रहा ॥
अलख लखा जब बेगमहूवा भर्मकोट जब तुरत दहा ।
सर्वमयी सब ऊपर राजै शून्य स्वरूपी ठोसठहा ॥
जीवन्मुक्त भया मन मेरा निर्भय निर्गुण ज्ञान महा ।
गुरु शुकदेव करी जब किरपा चरणदास सुख सिन्धु बहा ॥
राग आसावरी ॥
जबसों मन चंचल घर आया ।
निर्मल भया मैलगये सगरे तीरथ ध्यान जु न्हाया ॥
निर्वासी ह्वै आनँद पाये या जगसों मुख मोड़ा ।
पांचो भई सहज वशमेरे जब इनका रस छोड़ा ॥
भय सब छूटे अब को लूटे दूजी आश न कोई ।
सिमिटिसिमिटिरहा अपनेमाहीं सकल विकलनहिं होई ॥
निजमन हूवा मिटिगा दूवा को वैरी को मीता ।
बन्धमुक्तका संशय नाहीं जन्म मरणकी चीता ॥
गुरु शुकदेव भेव मोहिं दीयो जबसों यह गति साधी ।
चरणदाससों ठाकुरहूये छुटिगये वाद विवादी ॥
हम तौ आतम पूजाधारी ।
समझिसमझिकरिनिश्चय कीन्ही और सबनपर भारी ॥
और देवल जहाँ धुँधली पूजा देवत दृष्टि न आवै ।
हमरा देवत परगट दीखै बोलै चालै खावै ॥
जित देखौं तित ठाकुरद्वारे करौं जहां नित सेवा ।
४३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पूजा की विधि नीके जानौं जासों परसन देवा ॥
करि सनमान स्नान कराऊं चन्दन नेह लगाऊं ।
मीठे वचन पुष्प सोइ जानौं द्वै करि दीन चढ़ाऊं ॥
परसन करि करि दरसन पाऊं बार बार बलिजाऊं ।
चरणदास शुकदेव बतावैं आठपहर सुख पाऊं ॥
ये मन आतम पूजा कीजै ।
जितनी पूजा जगके माहीं सबहुन को फल लीजै ॥
जो जो देही ठाकुरद्वारे तिनमें आप विराजैं ।
देवल में देवत हैं परगट आछी विधिसों राजैं ॥
त्रैगुण भवन सँभारि पूजिये अनरस होन न पावै ।
जैसेको तैसाही परसौ प्रेम अधिक उपजावै ॥
और देवता दृष्टि न आवै धोखे को शिर नावै ।
आदि सनातनरूप सदाही मूरख ताहि न ध्यावै ॥
घटघट सूझै कोइ यक बूझै गुरु शुकदेव बतावैं ।
चरणदास यह सेवन कीन्हे जिवन्मुक्त फल पावैं ॥
राग विहागरा
सब जग पांचतत्त्वका उपासी ।
तुरियातीत सबन सों न्यारा अविनाशी निर्वासी ॥
कोई पूजै देवल मूरति सो पृथ्वी तत्त्व जानौं ।
कोई न्हावै पूजै तीरथ सो जलको तत्त्व मानौं ॥
अग्निहोत्र अरु सूरज पूजा सो पावक तत्त्व देखा ।
पवन खैंचि कुंभक को राखै वायुतत्त्व को लेखा ॥
कोई तत्त्वाकाश को पूजै ताको ब्रह्म बतावै ।
जो सबके देखन में आवै सो क्यों अलख कहावै ॥
परमतत्त्व पांचौ से आगे गुरु शुकदेव बखानै ।
शब्दवर्णन । ४३३
चरणदास निश्चय मन आनौ बिरला जन कोइ जान ॥
राग जयकरी ॥
ब्रह्म अरूप धरे बहुरूप कहौ कोउ कैसो स्वरूप कहै ।
सबमें है सबसे है न्यारा कोई भेद अनूपलहै ॥
कहुं कहुं मूरख गुंगभयो है कहुं कहुं वक्ता वेदपढ़ै ।
कहुं कहुं राव रंक दुख सुख है कहुं कहुं भोगी भोगकरै ॥
कहुं कहुं राधे रूप बनावै कहुं कहुं मोहन रास रचै ।
मुड़ि मुड़ि जावै फेरि मनावै प्यार प्रीतिके चावचहै ॥
कहुंकहुं सूरति मोहनि मूरति कहुं कहुंलालन फंदपरे ।
कहुं कहुं मधुवा कहुं कहुं प्याला कहुंकहुं पीवत प्रेमभरे ॥
कहुं कहुं ज्ञानी नाना वानी कहुं भरम में भूलिरहे ।
शुकदेवा गुरु हो समझावैं चरणहिंदासा चरणगहे ॥
राग मंगलचांदूवा बिलावल ॥
कर्मकरि निष्कर्म होवै फेरि कर्म न कीजिये ।
भूलि कै कोइ कर्म साधै उलटि कर्म न दीजिये ॥
कर्म त्यागै जगै आतम यह निश्चयकरि जानिये ।
जब निर्भय पद सुलभपावै सांच हियमें आनिये ॥
सांच हियमें राखि अवधू नाम निर्गुण नितजपौ ।
अग्नि इन्द्री कर्म लकड़ी पंच अग्नी अस तपौ ॥
जैसे टूट गहनो खोज मेटै होय सोना अतिसुखी ।
ऐसे योग भक्ति वैरागसेती कर्म काटै गुरुमुखी ॥
जासों मिटै आपा आप सहजै ब्रह्मविद्या ठानिये ।
गुरू शुकदेव युक्ति भाषै चरणदास पिछानिये ॥
३३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग सोरठ ॥
साधो भर्मा यह संसारा ।
गतमति लोक बड़ाई उरझे कैसे हो छुटकारा ॥
भर्म पड़े नानाविधि सेती तीरथ वर्त्त अचारा ।
देह कर्म अभिमानी भूले छूछपकरि ततडारा ॥
योगी योगयुक्त करि हारे पण्डित वेदपुराना ।
षट दर्शन पग आप पुजावैं पहिरि पहिरि रँगबाना ॥
जानत नाहिं आप हम को हैं को है वह भगवाना ।
को यह जगत कौनगति लागै समझै ना अज्ञाना ॥
जाकारण तुम इत उत डोलो ताको पावत नाहीं ।
चरणदास शुकदेव बतायो हरि नारायण माहीं ॥
हेली ॥
यह अचरजकी बात हेली कौन सुनै कासों कहूं ।
दूर हुतो जब चाव थोरी अरी हेली अब नहिं छोड़ै साथ ॥
जहँ देखौं तहाँ साँवरोरी अरी हेली तनमन रहो समाय ।
अंतर्यामी एक है द्वितीया ना ठहराय ॥
मत भटकै भय भर्म में री उलटि आपको देख ।
तोही में हरि बसत हैं गावत वेद विशेख ॥
जब तू मोसी होयगी री अरी हेली तब समझैगी बात ।
गूंगे को स्वप्नो भयो यह सुख कहो न जात ॥
जो चाहै हरिसों मिलोरी अरी गुरु शुकदेव मनाव ।
चरणदास सखी ने कह्यो आप आप में पाव ॥
हरि पाये फल देख हेली पावत ही खोई गई ।
जात अटक कुल खोय गयेरी अरी हेली खोये वरण अरुभेष ॥
जन्म मरण सब खोगयेरी अरी हेली बंधमुक्त गये खोय ।
शब्दवर्णन । ४३५
ज्ञान अज्ञान न पाइये नेम धर्म नहिं होय ॥
लाज गई अरु भय गयेरी अरी हेली अरु साथहि गई उपाधि ।
आशा अरु करणी गई खोये वाद विवाद ॥
मैं नाहीं हरिही रहेरी तू दौरत हरि ओट ।
पावैगी जब जानिहै हरि पावनके खोट ॥
गुरु शुकदेव सुनाइयारी अरी हेली चरणदास मन शोच ।
सब बातनसों जायगी रहै न तेरा खोज ॥
वह घर कैसा होय हेली जितके गये न बाहुरे ।
अमरपुरी जासों कहैरी अरी हेली मुक्तधाम है सोय ॥
विकट घाट वा ठौरकोरी शठ नहिं पावै पंथ ।
गुरुमुख ज्ञानी जाहिंहैं हरिसों सन्मुख संत ॥
त्रैगुण मत पहुँचे नहींरी अरी हेली छहौऋतुहाँ नाहिं ।
रवि शशि दोऊ हाँ नहीं नहीं धूप नहिं छाहिं ॥
अवधिनहीं कायानहींरी अरी हेली कलह कलेश न काल।
संशय शोक न पाइये नहिं माया को जाल ॥
गुरु शुकदेव दया करैं री अरी हेली चरणदास लहै देश ।
बिन सतगुरु नहिं पावई जो नानाकर भेश ॥
हेला ॥
दृष्टि उठाकर देख हेला ब्रह्म अनादि अरूप है।
आदि नहीं अन्तौ नहींरे हेला आप सनातन एक॥
नहिंधौला काला नहीं रे हेला हरा पीत नहिं लाल ।
तीनों गुणसे है परे नहीं पुरुष नहिं बाल ॥
शस्तर छेदि सकैन रे अरे हेला पावक सकै न जारि।
नीर भिजोय सकै नहीं ताहि न ब्यापै बयारि ॥
४३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रेख जहाँ नहिं खिंचि सकैरे अरे हेला राई ना ठहराय ।
लेप जहाँ नहिं चढ़िसकै सकै नहिं कोइ पाय ॥
नहीं दूर निकटौ नहींरे अरे हेला नहीं प्रगट नहिं गूप ।
गुरु कृपा सो पाइये सुन्दर बहुत अनूप ॥
है अडोल डोलै नहीं रे अरे हेला है अबोल नहि बोल ।
देशकाल सों रहित है और कहा कहुँ खोल ॥
जैसा था सोइ आज है रे अरे हेला नया पुराना नाहिं ।
जासों यह जग है भरो जग वाही के माहिं ॥
शक्ति घनी लीला घनी रे अरे हेला घने नाम बहुरूप ।
त्रै देवा से बहुत हैं इन्दर से बहु भूप ॥
चन्द्र घने सूरज घनेरे अरे हेला घने पिण्ड ब्रह्माण्ड ।
सब कुछ आपहि है रह्यो निर्मल अचल अखण्ड ॥
जनकदियो शुकदेवकोरे अरे हेला उनमोंको कहिदीन ।
दरश भयो चरणदास को सदा रहौं लवलीन ॥
अचरज अलख अपार हेला वाकी गति नहिं पाइये ।
बहु निषेध जोपै करे रे अरे हेला तौ जावैगा हार ॥
बानीथकि बुधिहूयथकैरे अरे हेला अनभय थकि थकि जाय ।
ब्रह्मादिक सनकादिकहू नारद थकि गुण गाय ॥
वेद थके अरु व्यासहूरे अरे हेला ज्ञानी थके अरु ज्ञान ।
शंकर से योगी थके करि करि निर्मल ध्यान ॥
बहुतक कथि कथिही गयेरे अरेहेला नेक न निबटी बूझ ।
वाचक ज्ञानी कहत हैं हमने पायो सूझ ॥
पांचौ इन्द्रियनसों लखैरे अरे हेला ताको सांच न मानि ।
जो जो इन सों देखिये तिनकी निश्चय हानि ॥
गुरु शुकदेव सुनावई रे अरे हेला समझ चरणहीं दास ।