भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूधा भया सकल मन मेरो नेक न कहूं अरूझा ॥
मैं सबहुन में सब मोहूं में सांच यही करि जाना ।
यही वही है वही यही है दूजा भाव मिटाना ॥
शुकदेवा ने सब सुख दीन्हे तिरपत होय अधायो ।
चरणदास निकसा नहिं रंचक परमातम दरशायो ॥
राग विलाव विहागरा ॥
गुरु विन कौन डुबोवनहारा ।
ब्रह्म समुद्रमें जो कोइ बूड़ो छुटिगये सकल विकारा ॥
सिंधु अथाह अगाध अचल है जाको वार न पारा ।
वाकी लहरि मिटत वाही में कौन तरैको तारा ॥
त्रैगुणरहत सदाही चेतन ना काहू उनहारा ।
निराकार आकार न कोई निर्मल अति निर्धारा ॥
अकरी अलख अरूप अनादी तिमिर नहीं उजियारा ।
तामें अण्ड दिपत ऐसे करि ज्यों जल मध्ये तारा ॥
काल ज्वाल भै भूती नाहीं तहां नहीं भ्रमभारा ।
चरणदास शुकदेव दयासों बूड़िगयेही पारा ॥
राग सोरठ व आसावरी ॥
सतगुरु निजपुर धाम बसाये ।
जितकेगये अमर हैं बैठे भवजल बहुरि न आये ॥
योगी योग युक्ति करिहारे ध्यानी ध्यान लगावैं ।
हरिजन गुरुकी दया बिना यों दृष्टि नहीं दरशावैं ॥
पंडित मुंडित चुंडित ढूंढें पढ़ि सुनि वेद पुरानैं ।
जासों वै सब पायो चाहें सो वै नेति बखानैं ॥
जंगम यती तपी संन्यासी सबही बहदिशि धावैं ।