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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 471, कुल 690 में से

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पृष्ठ 471

४३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।

पूजा की विधि नीके जानौं जासों परसन देवा ॥
करि सनमान स्नान कराऊं चन्दन नेह लगाऊं ।
मीठे वचन पुष्प सोइ जानौं द्वै करि दीन चढ़ाऊं ॥
परसन करि करि दरसन पाऊं बार बार बलिजाऊं ।
चरणदास शुकदेव बतावैं आठपहर सुख पाऊं ॥
ये मन आतम पूजा कीजै ।
जितनी पूजा जगके माहीं सबहुन को फल लीजै ॥
जो जो देही ठाकुरद्वारे तिनमें आप विराजैं ।
देवल में देवत हैं परगट आछी विधिसों राजैं ॥
त्रैगुण भवन सँभारि पूजिये अनरस होन न पावै ।
जैसेको तैसाही परसौ प्रेम अधिक उपजावै ॥
और देवता दृष्टि न आवै धोखे को शिर नावै ।
आदि सनातनरूप सदाही मूरख ताहि न ध्यावै ॥
घटघट सूझै कोइ यक बूझै गुरु शुकदेव बतावैं ।
चरणदास यह सेवन कीन्हे जिवन्मुक्त फल पावैं ॥
राग विहागरा
सब जग पांचतत्त्वका उपासी ।
तुरियातीत सबन सों न्यारा अविनाशी निर्वासी ॥
कोई पूजै देवल मूरति सो पृथ्वी तत्त्व जानौं ।
कोई न्हावै पूजै तीरथ सो जलको तत्त्व मानौं ॥
अग्निहोत्र अरु सूरज पूजा सो पावक तत्त्व देखा ।
पवन खैंचि कुंभक को राखै वायुतत्त्व को लेखा ॥
कोई तत्त्वाकाश को पूजै ताको ब्रह्म बतावै ।
जो सबके देखन में आवै सो क्यों अलख कहावै ॥
परमतत्त्व पांचौ से आगे गुरु शुकदेव बखानै ।