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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 466, कुल 690 में से

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पृष्ठ 466

शब्दवर्णन । ४२७
प्रीति रीतकी सार न जानैं डोलत भटके भटके ॥
किरिया कर्म भर्म उरझेरे ये माया के झटके ।
ज्ञान ध्यान दोउ पहुँचत नाहीं राम रहीमा फटके ॥
जग कुल रीति लोक मर्यादा मानत नाहीं हटके ।
चरणदास शुकदेव दयासों त्रैगुण तजिकै सटके ॥
राग सोरठ ॥
है कोइ जानै भेद हमार ।
सब सबमें हम सबके माहीं में मैं व्यापक मैं न्यारा ॥
हम अडोल हम डोलत निशिदिन हम सूक्ष्म हम भारा ।
हमहीं निर्गुण हमहीं सगुंण हमहीं दश अवतारा ॥
हमहा एक बहुतहो खेले हमहीं सकल पसारा ।
हमहीं ज्ञान ध्यान पुनि हमहीं हमहीं धारणहारा ॥
हमहीं आदि अन्त पुनि हमहीं हमहीं रूप अपारा ।
महाराज हम वार पार हैं हमहीं जग उजियारा ॥
हमहीं गुरु शुकदेव विराजैं हमहिं तरैं हम तारा ।
चरणदास घट हमहीं बोलैं समझै समझनहारा ॥
राग काफी ॥
मैं कोइ अजबहूँ मेरा अजब तमाशा जोर ।
मेरेहि पिण्ड खण्ड ब्रह्मण्डा मैं पूरण सब ठौर ॥
मैं ब्रह्मा मैं विष्णु महादेव मैं कमला मैं गौर ।
मैं रवि चन्द्र इन्द्र इन्द्राणी मैं गरजत घनघोर ॥
मैं गुण तीनि पांच तत्त्व मैं हीं मैं दश दिशि चहुँओर ।
मैं निहरूप रूपधरि नाना निशिदिन करत कलोर ॥