भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ४३३
चरणदास निश्चय मन आनौ बिरला जन कोइ जान ॥
राग जयकरी ॥
ब्रह्म अरूप धरे बहुरूप कहौ कोउ कैसो स्वरूप कहै ।
सबमें है सबसे है न्यारा कोई भेद अनूपलहै ॥
कहुं कहुं मूरख गुंगभयो है कहुं कहुं वक्ता वेदपढ़ै ।
कहुं कहुं राव रंक दुख सुख है कहुं कहुं भोगी भोगकरै ॥
कहुं कहुं राधे रूप बनावै कहुं कहुं मोहन रास रचै ।
मुड़ि मुड़ि जावै फेरि मनावै प्यार प्रीतिके चावचहै ॥
कहुंकहुं सूरति मोहनि मूरति कहुं कहुंलालन फंदपरे ।
कहुं कहुं मधुवा कहुं कहुं प्याला कहुंकहुं पीवत प्रेमभरे ॥
कहुं कहुं ज्ञानी नाना वानी कहुं भरम में भूलिरहे ।
शुकदेवा गुरु हो समझावैं चरणहिंदासा चरणगहे ॥
राग मंगलचांदूवा बिलावल ॥
कर्मकरि निष्कर्म होवै फेरि कर्म न कीजिये ।
भूलि कै कोइ कर्म साधै उलटि कर्म न दीजिये ॥
कर्म त्यागै जगै आतम यह निश्चयकरि जानिये ।
जब निर्भय पद सुलभपावै सांच हियमें आनिये ॥
सांच हियमें राखि अवधू नाम निर्गुण नितजपौ ।
अग्नि इन्द्री कर्म लकड़ी पंच अग्नी अस तपौ ॥
जैसे टूट गहनो खोज मेटै होय सोना अतिसुखी ।
ऐसे योग भक्ति वैरागसेती कर्म काटै गुरुमुखी ॥
जासों मिटै आपा आप सहजै ब्रह्मविद्या ठानिये ।
गुरू शुकदेव युक्ति भाषै चरणदास पिछानिये ॥