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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

शब्दवर्णन । ४३७
अपने ही परकाश में आप रहा परकास ॥
राग हिंडोलना ॥
झूलत गुरुमुख सन्त अलख हिंडोलने ।
नाभि भृकुटी खंभ रोपे सोहं डोरी लाय ।
सुरति पटरी बैठि सजनी क्षण आवै क्षण जाय ॥
मन मनसा दोउ लगे झूलन धारणा लै संग ।
ध्यान झोटे देत सजनी भलो लागो रंग ॥
सखिसहेली सिमिटि आई पींग पींगन नेह ।
बूंद आनँद सब भिगोई सघन बरसै मेघ ॥
चार वाणी खड़ी गावैं महारँगीली नार ।
मुक्तिचारौ मालिनी जहाँ गुहि गुहि लावैं हार ॥
त्रिगुण बकुला उड़न लागे देखि बादल लै ।
संग पियके सदा झूलैं ताते लागै न भै ॥
चरणदास को नित झुलावैं ईश झूलैं शुकदेव ।
शिवसनकादिक नारद झूलैं करि करि गुरुकीसेव ॥
अथ सर्वअंग ॥
राग मंगल ॥
मन रोगी भयो पिंग कि कुबुधि विकार सों ।
बाढ़ी व्यथा अपार लोभ के भारसों ॥
कर्म्म भरो मतिहीन छील छलसों छयो ।
पांच पचीसौ घेरि मोह मदने दह्यो ॥
कैसे यह दुखजाय कि पूँछन को चल्यो ।
तब पूरण गुणवन्त वेद सतगुरु मिल्यो ॥
करगहि कियो विचार कह्यो समझायकै ।

४३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रेख जहाँ नहिं खिंचि सकैरे अरे हेला राई ना ठहराय ।
लेप जहाँ नहिं चढ़िसकै सकै नहिं कोइ पाय ॥
नहीं दूर निकटौ नहींरे अरे हेला नहीं प्रगट नहिं गूप ।
गुरु कृपा सो पाइये सुन्दर बहुत अनूप ॥
है अडोल डोलै नहीं रे अरे हेला है अबोल नहिं वोल ।
देशकाल सों रहित है और कहा कहूँ खोल ॥
जैसा था सोइ आज है रे अरे हेला नया पुराना नाहिं ।
जासों यह जग है भरो जग वाही के माहिं ॥
शक्ति घनी लीला घनी रे अरे हेला घने नाम बहुरूप ।
त्रै देवा से बहुत हैं इन्दर से बहु भूप ॥
चन्द्र घने सूरज घनेरे अरे हेला घने पिण्ड ब्रह्माण्ड ।
सब कुछ आपहि है रह्यो निर्मल अचल अखण्ड ॥
जनक दियो शुकदेवकोरे अरे हेला उनमोको कहिदीन ।
दरश भयो चरणदास को सदा रहौं लवलीन ॥
अचरज अलख अपार हेला वाकी गति नहिं पाइये ।
बहु निषेध जोपै करे रे अरे हेला तौ जावैगा हार ॥
बानीथकि बुधिहू थकैरे अरे हेला अनभय थकि थकि जाय ।
ब्रह्मादिक सनकादिकहू नारद थकि गुण गाय ॥
वेद थके अरु व्यासहुरे अरे हेला ज्ञानी थके अरु ज्ञान ।
शंकर से योगी थके करि करि निर्मल ध्यान ॥
बहुतक कथि कथिही गयेरे अरेहेला नेक न निबटी बूझ ।
वाचक ज्ञानी कहत हैं हमने पायो सूझ ॥
पांचौ इन्द्रियनसों लखैरे अरे हेला ताको सांच न मानि ।
जो जो इन सों देखिये तिनकी निश्चय हानि ॥
गुरु शुकदेव सुनावई रे अरे हेला समझ चरणहीं दास ।

शब्दवर्णन । ४३७
अपने ही परकाश में आप रहा परकास ॥
राग हिंडोलना ॥
झूलत गुरुमुख सन्त अलख हिंडोलने ।
नाभि भृकुटी खंभ रोपे सोहं डोरी लाय ।
सुरति पटरी बैठि सजनी क्षण आवै क्षण जाय ॥
मन मनसा दोउ लगे झूलन धारणालै संग ।
ध्यान झोटे देत सजनी भलो लागो रंग ॥
सखिसहेलीं सिमिटि आईं पींग पींगन नेह ।
बूंद आनंद सब भिगोई सघन बरसै मेह ॥
चार वाणी खड़ी गावें महारँगीली नार ।
मुक्तिचारौ मालिनी जहाँ गुहि गुहि लावैं हार ॥
त्रिगुण बकुला उड़न लागे देखि बादल लै ।
संग पियके सदा झूलैं ताते लागै न भै ॥
चरणदास को नित झुलावैं ईश झुलैं शुकदेव ।
शिवसनकादिक नारद झूलैं करि करि गुरुकीसेव ॥
अथ सर्वअंग ॥
राग मंगल ॥
मन रोगी भयो पिंग कि कुबुधि विकार सों ।
बढ़ी व्यथा अपार लोभ के भारसों ॥
कर्म्म भरो मतिहीन छील छलसों छयो ।
पांच पचीसौ घेरि मोह मदने दह्यो ॥
कैसे यह दुखजाय कि पूँछन को चल्यो ।
तब पूरण गुणवन्त वेद सतगुरु मिल्यो ॥
करगहि कियो विचार कह्यो समझायकै ।

४३८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जो कछु तेरे रोग सो देहुं बतायकै ॥
महापाप की ताप चढ़ी तोहिं धायकै ।
संशयको सनिपात मिल्यो है जायकै ॥
विषय विषय ज्वर रह्यो जु हिये समायकै ।
तृष्णाकी बहु प्यास रही मन भायकै ॥
सतसंगति को पक्ष कबौं नाहीं कियो ।
इन्द्रिन के रस रोग बिगरि सबही गयो ॥
कुसतसंग संग्रहणी जियमाहीं भई ।
ममताको मल बढ़ो भूख ताते गई ॥
काम क्रोधकौं कुष्ठ सकल तन छायकै ।
शोक शूलको मूल करेजे आयकै ॥
माया पवन झकोरसों सूजन बहुत है ।
त्रैगुणके त्रयदोष बात बहकी कहै ॥
चिन्ताही की चीस उठै दिन रातही ।
अतिनिन्दा से नींद गई ता साथही ॥
शीश गुमान पिराय दरद हिंसा घनो ।
कलह कल्पना भर्मसों रहतो उनमनो ॥
औरौ बड़ी उपाधि बढ़ै तेरी देहमें ।
भीजि रह्यो है शरीर पसेव सनेह में ॥
इन रोगनकी औषध देहुँ सुनायकै ।
भिन्न भिन्न मैं कहौं तोहिं समुझायकै ॥
कर्म्म करेजवा तोड़िकै सत्य गिलोयले ।
जत्तही की अजवायन आनि मिलोयदे ॥
चित्त चिरायता न्याय पीत पीपर भली ।

शब्दवर्णन । ४३६
नेम नोन सेंधकी नीकी सी डलीं ॥
हित के बर्तन माहीं तिन्हें भिजोयके ।
परमप्रेम जल तामें डारि समोयदे ॥
शील शिलापर पीसो छानि उमंगसों ।
पीवतही सब रोग नशेंगे अंगसों ॥
शुद्ध सुदर्शन चूर्ण हैगो स्वादही ।
ताके पाये जाय जगत की ब्याधही ॥
दया क्षमा सन्तोष यही माजून है।
होय अधिक आनन्द तत्त्व पदको लहै ॥
गुरु शुकदेव बतावैं औषध सार है।
चरणदास जो खाय कष्ट कोइ ना रहै ॥
राग धनाश्री ॥
मन में दीरघ भये विकारा ।
सतगुरु साहव वैद मिले बिनु कटै न रोग अपारा ॥
त्रैगुण के त्रैदोष पगो है काम क्रोध ज्वर जारा ।
तृष्णा वायु उठी उर अन्तर डोलत द्वारहि द्वारा ॥
विषय वासना पित कफ लागो इन्द्रिन के सुखसारा ।
सत्संगति रस करवा लागे करत न अङ्गीकारा ॥
सत पुरुषन को कहा न मानै शील क्षमा नहि धारा ।
रसना स्वाद तजौ नहिं मूरुख आपन पौ न सँभारा ॥
चरणदास शुकदेव मिले जब औषध ज्ञान विचारा ।
तनमनको सब रोग मिटायो आवागमन निवारा ॥
राग केदारा ॥
भाई रे विषमज्वर जग व्याधि ।
गुरू हमारे दई औषध खाय रहनी साधि ॥
३०

४४० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
शुद्ध चूरणहै सुदरशन निबल लखि मोहिं दीन ।
खात तन के कष्ट नाशौं रोग मन है क्षीन ॥
ज्ञान योगरु भक्ति त्रिफला धारणा नैपाल ।
रहे सतसंगति भवन में आश लगै न ब्याल ॥
कनककामिनि पथ बतायो भूलि कर न अहार ।
अति अजीरण होत इनते बढ़त बिकट विकार ॥
चरणदास शुकदेव कहिया औषधी निज सोय ।
विषम वेदन होय भारी जाहि क्षण में खोय ॥
गीत सावन के गावने का ॥
सखी सजनी हे तेरो पिया तेरे पास ।
अरी बौरी इत उत भटकी क्यों फिरैजी ॥
सखी सजनी हे सुरति निरति कर देख ।
अरी बौरी अपने महल रंग मानिये जी ॥
सखी सजनी हे मान अहूं सब खोय ।
अरी बौरी यह यौवन थिर ना रहै जी ॥
सखी सजनी हे बालम सन्मुख होय ।
अरी बौरी पिछली अरु सब खोइये जी ॥
सखी सजनी हे पिया मिलन कोरी साज ।
अरीबौरी न्हाय शिंगार बनाइये जी ॥
सखी सजनी हे चितकी चौकी धराय ।
अरी बौरी नायन सुमति बोलाइये जी ॥
सखी सजनी हे मनको कलश बनाव ।
अरी बौरी ज्ञानको नीर भराइयेजी ॥
सखी सजनी हे सच रचा अग्नि जराव ।

शब्दवर्णन । ४४१
अरी बौरी नीर गरम करि न्हाइयेजी ॥
सखी सजनी हे योग उबटनो लगाव ।
अरी बौरी कर्म को मैल उतारियेजी ॥
सखी सजनी हे करणी कंगही बहाव ।
अरी बौरी वेणी मुक्ति गुंधाइये जी ॥
सखी सजनी हे गुरूके चरण चितलाव ।
अरी बौरी सतसंगति पग लागियेजी ॥
सखी सजनी हे लाज सिंदुर निकासि ।
अरी बौरी खोलि शिंगार बनाइयेजी ॥
सखी सजनी हे नवधा भूषण धार ।
अरी बौरी जासों पिया रिझाइयेजी ॥
सखी सजनी हे प्रीति को काजल आंज ।
अरी बौरी प्रेम की मांग सँवारियेजी ॥
सखी सजनी हे बुधि बेसरि सजिलेहि ।
अरी बौरी पान विचारि चबाइयेजी ॥
सखी सजनी हे दया कर मेहँदी लगाव ।
अरी बौरी सांचो रंग न उतरैजी ॥
सखी सजनीं हे धीरज चूनरि लाल ।
अरी बौरी नख शिख शील शिंगारियेजी ॥
सखी सजनी हे काम क्रोध तजि लोभ ।
अरी बौरी मोह पीहर सों जिन करौजी ॥
सखी सजनी हे पांच सहेली साथ ।
अरी बौरी इनको संग न लीजियेजी ॥
सखी सजनी हे चालौ पियाकेरे पास ।
अरी बौरी सुपमन बाट सोहावनीजी ॥

४४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सखी सजनी हे गगन मण्डल पगधार ।
अरी बौरी पीय मिलै दुख सब हरैंजी ॥
सखी सजनी हे निर्गुण सेज विछाव ।
अरी बौरी हिलि मिलिकै रँगमानिये जी ॥
सखी सजनी हे पावैगी अटल सुहाग ।
अरी बौरी अजर अमर घर निर्मलेजी ॥
सखी सजनी हे गुरु शुकदेव अशीश ।
अरी बौरी चरणदास मनसा फलै जी ॥
भागीसाथन हे इह भूलैरी मतभूल ।
अरी हेली भर्म भूमि या देशकीजी ॥ भागीसाथनहे ।
बदला मायाकोरी रूप अरी हेली कुमति बूंदजित तित परैंजी ॥
भागीसाथनहे । कर्म वृक्षकीरी बेलि अरी हेली बारी फल लगि
विष भरेजी ॥ भागीसाथनहे । दुर्मति हरी हरी दूब अरी हेली
छलरूपी फूले फूल हैं जी ॥ भागीसाथनहे । त्रैगुण बोलत मोर
अरी हेली दम्भ कपटबकुला फिरैंजी ॥ भागीसाथनहे । पाप
पुण्य दोउ खम्भ अरी हेली नाग¹ स्वर्ग झोटा लगैजी ॥ भागी
साथनहे । मैं मेरी बँधी डोर अरी हेली तृष्णापटरी जित धरी
जी ॥ भागीसाथनहे । झूलत चावहि चाव अरी हेली नर नारी
सब भुलईंजो ॥ भागीसाथनहे । तपसी योगी गये झूल अरी
हेली फल चाहत अरु कामनाजी ॥ भागीसाथनहे । आशा
झुलावत नारि अरी हेली पांच पचीस मिलि गावईंजी ॥ भागी
साथनहे । या जगमें ऐसी भूल अरी हेली चरणदास झूलत
बचैजी ॥ भागीसाथनहे । इत तजि उतकोरी चाल अरी हेली
अमरनगर शुकदेव के जी ॥
१ पाताल ॥

शब्दवर्णन । ४४५
राग बरवा ॥
साधौरी संगत भवँरा दुर्लभ पइये लीजैजी तन मन
भौँराजी । जी मानै साधौरी संगत भवँरा प्यारीही लागै
आदि अनादी भवँरा कौने लखावै अपने सतगुरुजी संतोष
भवँराजी । जी मानै नरक निवारण सतगुरु प्यारोही लागै ॥
आपसकी चर्चा भवँरा कौने सुनावै अपने गुरु भाईजी संतोष
भवँराजी । जी मानै गुरुका तौ छोना भई या प्यारोही लागै ॥
आछे आछे लक्षण भवँरा कौने जुलावै अपने रहनीजी
संतोष भवँराजी । जी मानै कर्म छुटावन रहनी प्यारीही
लागै ॥ आछे आछे परचा भवँरा कौने दिखावै अपनी मुक्ति
संतोष भवँराजी । जी मानै काया जीतावन करणी प्यारीही
जागै ॥ आछी आछी वाणी भवँरा कौने उठावै अपने अन-
भैजी संतोष भवँराजी । जी मानै बुधिकी तौ मांजन अनभै
प्यारीही लागै ॥ चरणदास को तुरिया भवँरा कौने बसावै
अपने शुकदेवजी संतोष भवँराजी । जी मानै सिरका तौ
छत्तर शुकदेव प्यारोहो ॥
राग बिलावल ॥
अजब फकीरी साहबी भागनसौं पइये ।
प्रेमलगा जगदीश का कछु और न चहिये ॥
राव रंककौ सम गिनै कछु आशा नाहीं ।
श्राठ पहर सिमटे रहैं अपनेही माहीं ॥
वैर प्रीति उनके नहीं नहिं वाद विवादा ।
रूठे से जगमें रहें सुनैं सु अनहद नादा ॥
जो बोलै तौ हरिकथा नहिं मौनै राखैं ।
मिथ्या करुवा दुर्वचन कबहूं नहिं भाखैं ॥

४४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जीव दया अरु शीलता नखशिख सों धारैं ।
पांचौ चेले वश करें मन सों नहिं हारैं ॥
दुख सुख दोनों के परे आनँद दरसावै ।
जहां जाय अस्थल करें माया पवन न जावै ॥
हरिजन हरिके लाड़िले कोइ लहै न भेवा ।
शुकदेव कही चरणदाससों करि तिनकी सेवा ॥
( फुटकर पद )
राग परभाती ॥
और ख्याल सब छाड बावरे गोविंद के गुन गावरे ॥
श्रीहरिकथा सुनी नहिं कबहीं चाले जन्म गुमावरे ।
बिनाभक्ति चौरासी लखमें फिर फिर गोते खावरे ॥
सत्संगत की नाव बैठके उतर चलो दरियावरे ।
पैली पार मिलें हरि प्रीतम ज्ञानकी बल्ली लगावरै ॥
नौधाभक्ती करो कृष्णकी अनहद ताल बजावरै ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं जोतिमें जोति मिलावरै ॥
गज़ल ॥
मुझे कृष्ण के मिलने की आरज़ू है ।
शबो रोज दिल में यही जुस्तजू है ॥
नहीं भाती है मुझको बातें किसी की ।
सुनी जब से उस यार की गुफ्तगू है ॥
नहीं मुजको मतलब जहाँ में किसी से ।
चुभा जबसे दिलमें सनम खूबरू है ॥
जो आशक़ है उसका नहीं उस्से ग़ाफ़िल ।
तड़पता अज़ल से खड़ा रूबरू है ॥
शराबे मुहब्बत पिई जिसने, यारो ।

शब्दवर्णन । ४४५
हुआ दो जहाँ में वोही सुर्खरू है ॥
सभी आशकों पे किया कर्म तूने ।
मुआसी पे तेरा नहा दिल रजू है ॥
जहाँ देखे रनजीत वहीं हे वो हाज़िर ।
हर एकगुल में उसकी मिली मुश्कबू है ॥
पद ॥
पीले प्यालाहो मतवाला प्याला प्रेम हरी रसकारे ॥
जो दमजीवे हरि गुन गाले धन जोबन सुपना निशिकारे ।
पाप पुन्यको को भोगन आया कोन तेरा और तू किसकारे ।
बालापन खेलनमें खोया तरुण भये त्रियके बसकारे ।
वृद्धभया कफ वायु ने घेरा खाट पड़ा मारे मसकारे ॥
नाभि कमल में है कस्तूरी कैसे भरम मिटे पशुकारे ।
बिन सतगुरु इतना दुखपाया जैसे मृग भटके बनकारे ॥
भवसागर जो उतरा चाहै छाड़ कामिनी का चसकारे ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं नखशिख सर्प भरा विषकारे ॥
शब्द ॥
मुरशद मेरा दिल दरियाह दिलगह अन्दर खोजा ।
जिसके अन्दर सत्तर काबा मक्का तीसों रोज़ा ॥
चौदह तबक़ औलिया तिसमें भेद न होय जुदाई ।
सहस कमाल नमाज़ में ठाड़े दरशन जहाँ खुदाई ॥
हवा न हिर्स खुदी नहिं खूबी अनलहक़ जहाँ बानी ।
बिन चराग़ खाने सब रौशन जिसमें तख़्त सुबानी ॥
बिना अबर जहां बहु गुल फूले बिन अम्बर जहां बरसैं ।
बिन सरोद तम्बूर बजें जहां चशमे होम न दरसैं ॥
तिस दरगाह मसल्ला डारे बैठे क़ादर क़ाजी ।

४४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
न्याव करें सीने की पूछें रक्खें सबको राजी ॥
जिसके फल दीदार कियेसे नादिर होय फ़कीर ।
मारे काल कलन्दर जबलो मनवा धरे न धीर ॥
ऐसा हो जब कमला होई तब कमाल पद पावे ।
साहब मिल साहब को दरसे ज्यों जलबूँद समावे ॥
ऐसा हो सोइ पीर कहावे मनी मान सब खोवे ।
चरणदास ज़मींपर रोशन पाय पसारे सोवे ॥
शब्द ॥
जीवत मरजाय उलट आपमें समाय मन कहीं को न
जाय जिन्ह ऐसी दिलगीरी है । करे बन बाग बास जानत जे
भूख प्यास मेटे पर आस उन्हें अतिहि सबूरी है ॥ परम तत्त्व
को विचार चिन्ता सब डार हरि रस मतवार पाई ऐसी
अमीरी है। कहै चरणदास दोऊ दीन में पुकार यार सबही
आसान एक मुशकिल फ़कीरी है ॥
राग बिलावल ॥
ऐसा हो दरवेशही जगको बिसरावै ।
ईमान सबूरी सांच सों सोई बकसा जावै ॥
ज़न ज़र और ज़मीन को दिलमें नहिं लावै ।
फ़िक्र फ़कीरी को बुरा वह ज़िक्र छुटावै ॥
फ़ेफ़ाकेका गुण यही राज़क करै यादा ।
काफि कनाअत सुखघना आनन्द अगाधा ॥
रे रीयाज़त वलवान है हरि को अपनावै ।
आखिर को दीदार ही निश्चय करि पावे ॥
एज्ज़द को धारेरहै रहै सब सों नीचा ।

शब्दवर्णन । ४४७
शुकदेव कही चरणदास सों पावै पद ऊंचा ॥
वह वैरागी जानिये जाके राग न द्वेष ।
निर्द्वध ह्वै जग में फिरै चाहै सिद्ध न मोक्ष ॥
पांचन को एकै कर आनँद में रोक ।
त्रैगुण ते ऊपर बसै जहां हर्ष न शोक ॥
मन मूड़ै तन साध कै बाधा सब डार ।
तत्त्व तिलक माथे दिये शोभा अपरम्पार ॥
माला श्वास उसासकी हिरदय अस्थान ।
अलख पुरुषसों नेहरा त्रिकुटी मध्ये ध्यान ॥
काम क्रोध मोह लोभ ना यही नेम अचार ।
शुकदेव कही चरणदास सों करै ब्रह्मविचार ॥
राग सोरठ व बिलावल ॥
जो नर इतके भये न उतके ।
उतको प्रेम भक्ति नहिं उपजी इत नहिं नारी सुतके ॥
घरसों निकसि कहा उन कीन्हो घर घर भिक्षा मांगी ।
बाना सिंह चाल भेंड़नकी साधु भये अकि स्वांगी ॥
तन मूड़ा पै मन नहिं मूड़ा अनहद चित नहिं दीन्हा ।
इन्द्री स्वाद मिले विषयनसों बकबक बकबक कीन्हा ॥
माला करमें सुरति न हरिमैं यह सुमिरण कहु कैसा ।
बाहर वेष धारके बैठे अन्तर पैसा पैसा ॥
हिंसा अकस कुबुधि नहि छोड़ी हिरदय सांच न आया ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं बाना पहिरि लजाया ॥
राग मंगल ॥
महामूढ़ अज्ञान भक्ति में क्या करा ।
गुरु सों बेमुख होय बड़ापन चितधरा ॥

४४८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
मुक्त पंथकी ओरहि सूबीको चला ।
तैसे व्रत परिजाय जु नट भूला कला ॥
गिरा धरणि पर आय भया तन चूर है ।
जो कोई ऐसा होय बड़ाही कूर है ॥
जैसे वृक्ष ते टूटि' बिगड़ि फल जात है ।
ऐसे गुरुते छूटि कछू न रहात है ॥
द्रुमहीं सों लगि रहा जु फल नीको भया ।
पका भलीही भांति धनी के कर गया ॥
यहीं समझ गुरु संग कबौं नहिं त्यागिये ।
मनमें निश्चय लाय शरणहीं लागिये ॥
सब तन अंगन माहिं दीनता छाइये ।
गुरुके चरण निहारिकै शीश नवाहिये ॥
दोनों करको जोरिकै अस्तुति कीजिये ।
दर्शनकरि सुखपायकै शिक्षा लीजिये ॥
श्रीशुकदेव दयाल ने मोसों यों कही ।
चरणदास शिष जानिकै ऐसा हो सही ॥
राग सोरठ ॥
समझ रस कोइक पावै हो ।
गुरु बिन तपन बुझै नहीं प्यासा नर जावैहो ॥
बहुत मनुष ढूंढ़त फिरैं अँधरे गुरु सेवैहो ।
उनहूं को सूझै नहीं औरन कहँ देवैहो ॥
अँधरेको अधरा मिला नारी को नारीहो ।
ह्वां फल कैसे होयगा समझैं न अनारीहो ॥
गुरू शिष्य दोउ एक से एकै व्यवहाराहो ।
गये भरोसो डूबिकै वे नरक मँझाराहो ॥

शब्दवर्णन । ४४६
शुकदेव कहै चरणदास सों इनका मत कूराहो ।
ज्ञान मुक्ति जब पाइये मिलै सतगुरु पूराहो ॥ ॥
राग जैजैवन्ती ॥
गुरुबिन ज्ञान नाहीं तिमिर नशावै भाई ।
भरमत फिरै लोई जल और पाहन सोई बात नहीं बूझै
कोई तिनको बहधावै ॥ देवी और देव पूजै जहां कछु नाहीं
सूझै फेरि फेरि जावै दूजे तहां नहीं पावै । वैदकको भेद ठानै
जोतिष बिचारजाने काहूकी नाहि मानै करै मनभावै ॥ भूत
टोना जादू सेवै प्रभुका न नाम लेवै भक्ति में ना चित्त देवै गुण
नहिं गावै । श्रीशुकदेव कहै चरणदास होय रहै सोई मुक्तिधाम
लहै आपा जो उठावै ॥
राग गौरी ॥
सब जग भर्म भुलाना ऐसे ।
ऊंट कि पूंछसों ऊंट बँध्यो ज्यों भेड़ चालहै जैसे ॥
खरका शोक भूंस कूकुरकी देखा देखी चाली ।
तैसे कलुआ जाहिर भैरौ सेढ़ मशानी काली ॥
गाँवभूमि या हितकरि धावैं जाय बटाही दौरे ।
सद्दौ सरवर इष्ट धरतहैं लोग लुगाई बौरे ॥
राखै भाव श्वान गर्दभ को उनको ल्याय जिमावैं ।
ढेढ चमारन को शिरनावैं ऊंची जाति कहावैं ॥
दूध पूत पाथरसो मांगैं जाके मुख नहि नासा ।
लपसी पपड़ी ढेर करतहैं वह नहिं खावै मासा ॥
वाके आगे बकरा मारैं ताहि न हत्या जानैं ।
लै लोहू माथेसों लावैं ऐसे मूढ़ अयानैं ॥

४५० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
कहैं कि हमरे बालक ज्यावो बड़ी आयुबल दीजै ।
उनके आगे बिनती करतैं अँसुवन हिरदय भीजै ॥
भोपे भरड़े के पग लागैं साधुसन्त की निन्दा ।
चेतन को तजि पाहन पूजैं ऐसा यह जग अन्धा ॥
सतसंगतिकी ओर न झांकैं भक्ति करत सकुचावैं।
चरणदास शुकदेव कहत हैं क्यों न नरक को जावैं ॥
अरे नर क्या भूतन की सेवा ।
दृष्टि न आवै मुख नहिं बोलै ना लेवा ना देवा ॥
ज्यहि कारण घीज्योति जलावैं बहु पकवान बनावैं।
सो खच्चैं तू अधिक चावसों वह स्वप्ने नहिं खावैं ॥
राति जगावैं भोपा गावैं झूंठै मूड़ हलावैं ।
कुटुंब सहित तोहिं पैर परावैं मिथ्या वचन सुनावैं ॥
ताहि भरोसे जन्म गवाँवैं जीवत मरत न साथा ।
बड़भागन नर देही पाई खोवैं अपने हाथा ॥
चारि वरण में मैली बुधिका ऊंचनीच किन होई ।
जो कोइ झूंठी आशाराखै अगत जायगा सोई ॥
ताते सत विश्वास टेकगहु भक्ति करौ हरिकेरी ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं होय मुक्तिगति तेरी ॥
राग बिलावल ॥
सब सुखदायकहैं हरी मूरख नहिं जानै ।
मनमें धरि धरि कामना औरनको मानै ॥
जौ चाहै सन्तान को जप लालविहारी ।
सुन्दर बालक होहिंगे घरके उजियारी ॥
जो चाहै तू धनधना सेव कृष्ण मुरारी ।

शब्दवर्णन । ४५१
साखि सुदामा की सुनौ दइ विभव अपारी ॥
जगत बड़ाई जो चहै सुमिरौ यदुनाथा ।
नीच बहुत ऊंचे भये जगनायो माथा ॥
जो सिधहू वोही चहै करि-हरि हिय ध्याना ।
सिद्धि परापत होहिगी चढ़ि है परमाना ॥
चरणदास हूवो चहै भजिले भगवाना ।
कहैं गुरू शुकदेवजी होय मुक्त निदाना ॥
राग विहागरा ॥
साधो निन्दक मित्र हमारा ।
निन्दकको निकटे ही राखौं होन न देऊं न्यारा ॥
पाछे निन्दाकरि अघधोवैं सुनिमन मिटै विकारा ।
जैसे सोना तापि अग्निमें निर्मल करै सोनारा ॥
घन अहरन कसहीरा निबटै कीमत लक्ष हजारा ।
ऐसे यांचत दुष्टसन्तको करन जगत उजियारा ॥
योग यज्ञ जप पाप कटनहित करै सकल संसारा ।
बिन करणी मम कर्म्म कठिन सब मेटै निन्दक प्यारा ॥
सुखीरहौ निन्दक जगमाहीं रोग न हो तनसारा ।
हमरी निन्दा करनेवाला उतरै भवनिधि पारा ॥
निन्दक के चरणों की अस्तुति भाषौं वारंवारा ।
चरणदास कहैं सुनियो साधौ निन्दक साधक भारा ॥
राग सारंग ॥
अरे नर कहाकियो तुम ज्ञान ।
गई न हिंसा कुबुधि बड़ाई राग द्वेष की आन ॥
प्रभुताई को क्षण क्षण दौरै प्रभुको ना क्षण एक ।
अन्तर भोग जगतके प्यारे बाहर साधूवेष ॥

४५२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जैसे सिंह गऊतन धारो कपटरूप प्रकटायो ।
धोखाखाय पशू आ निकसो पंजा ताहि चलायो ॥
सुन्दररूप महा बगलेको एक टांग जल ध्यान ।
मनमें आशा मीन गहनकी कहां मिलैं भगवान ॥
गुरु शुकदेव बतायो मोको भीतर बाहर शुद्धि ।
चरणदास वा हरि जन जानौ ताकी है ब्रह्म बुद्धि ॥
राग केदार ॥
छले सब कनक कामिनि रूप ।
सुर असुर अरु यक्ष गंध्रब इन्द्र आदिक भूप ॥
सावित्री वश कियो ब्रह्मा पार्व्वती त्रिपुरारि ।
लीला कारण लक्ष्मी संग हरि लियो अवतार ॥
रावणसे अति बली मारे मौत जिन वश कीन ।
पशु नरनकी कौ चलावै एतौ अति आधीन ॥
रूप रस में दे धतूरा मोह फांसी डार ।
तप कि पूंजी छीनिकै कियो श्रृङ्गीऋष को ख्वार ॥
माया ठगिनी ठगे सबही बचे गुरु शुकदेव ।
रणजिता कोइ ऊबरो करि दास चरणन सेव ॥
राग सोरठ ॥
साधौ होनहार की बात ।
होत सोई जो होनहार है कापै मेटी जात ॥
कोटि सयानप बहुविधि कीन्हे बहुत तके कुशलात ।
होनहार ने उलटी कीन्ही जल में आगि लगात ॥
जो कछु होय होतव्यता भोंड़ी जैसी उपजै बुद्धि ।

शब्दवर्णन । ४५३
होनहार हिरदय मुख बोलै बिसरि जाय सब शुद्धि ॥
गुरुशुकदेव दयासों होनी धारि लई मन माहिं ।
चरणदास शोचे दुख उपजै समझेसों दुख जाहिं ॥
राग सीठना ॥
टुक रँग महल में आवकि निर्गुण सेज बिछी ।
जहाँ पवन गवन नहिं होय जहां जाय सुरति बसी ॥
जहाँ त्रय गुण बिन निर्वाण जहाँ नहिं सूर शसी ।
जहाँ हिलि मिलिकै सुखमान मुक्तिकी होय हँसी ॥
जहाँ पिय प्यारी मिलि एक कि आशा दुई नसी ।
जहाँ चरणदास गलतान कि शोभा अधिक लसी ॥
सुनु सुरत रँगीली हे कि हरिसा यार करौ ।
जब छूटै विघ्न विकार कि भव जल तुरत तरौ ॥
तुम त्रै गुण छैल बिसारि गगन में ध्यान धरौ ।
रस अमृत पीवो हे कि विषया सकल हरौ ॥
करि शील संतोष शिंगार क्षमाकी मांग भरौ ।
अब पांचौ तजि लगवार अमर घर पुरुष बरौ ॥
कहै चरणदास पिय देखि गुरु के पावँ परौ ।
जिव आतम बिगड़ी हे पुरुष को भूलि रही ॥
जब पिय बिसराई हे जने जन बाहँ गही ॥
तैं लाज गवांई हे कि पांचन पकड़ि लई ।
तेरे तीन लगे लगवार पचीसौ संग भई ॥
तैं जनम जनम रहि चूक कि यमकी मार सही ।
कहैं चरणदास बिन लाल कि भवजल जात बही ॥
टुक निर्गुण छैला सों कि नेह लगावरी ।
जाको अजर अमर है देश महल बेगमपुररी ॥

४५४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
जहाँ सदा सोहागिनि होय पिया सों मिलि रडुरि ।
जब आवागमन न होय मुक्ति चेरी तेरी ॥
कहैं चरणदास गुरु मिले सोई हां रहु बौरी ।
तब सुखसागर के बीच कि लहरि है रहरी ॥
तू सुन हे लंगर बौरी ।
तूपांचौ घेरि पचीसौ घेरी विषयवासना की है चेरी बारी
वारी दौरी । तैं पियभूली चौरासी डोली अङ्ग अङ्ग के सुखमें
फूली मायालाई डौरी ॥ तैं काम क्रोध सों नेह लगायो मन
माता सब जग भर्मायो मोह यार बांकोरी । चरणदास शुक-
देव बतावैं निर्गुण छैला तोहिं मिलावैं जो टुक चेतन होरी ॥
पर आशाहै दुखदाई ।
जिन धीरजसों पति रसिया छांड़ौ बांको मोह यार कियो
गाढ़ो क्रोधसों प्रीति लगाई ॥ जिन जतसत देवर सों मुख
मोड़ा दया बहिन सों नाता तोड़ा सुमति सौकि बिसराई ।
जो धर्म पिता के घरसों छूटी क्षमा मायसों योंहीं रूठी कुमति
परोसिन पाई ॥ सन्तोष चचाको कहा न माना चची दीनता
सों रिसठाना माया मधि बौराई । चरणदास कहै जब निज
पतिपावै श्रीशुकदेव शरण सो आवै शील शिंगार बनाई ॥
राग सीठना ॥
टुकदरशन दे हरि प्यारे ।
बिनदेखेमोहिंकलन परति यह देह जरतिहै व्याकुल प्राण हमारे ॥
तेरी भौंहें मटक और प्रेम लटक हिय अटकी नंददुलारे ।
तेरी सुन्दर सूरति मोहनि मूरति नैना अति मतवारे ॥
तुमसो को छैला सदा नवेला अलबेला बांकारे ।
मैंहूं चरणदासा तुम सुख रासा आसा पुरवो आरे ॥