भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सुरति निरतिकी गम जहाँ नाहीं वे कहौ कैसे पावैं ॥
देश अटपटा वेगम नगरी निगुरे राह न पाया ।
चरणदास शुकदेव गुरूने किरपा करि पहुँचाया ॥
राग सोरठ ॥
हमारे गुरु हरि नगर दिखायाहो ।
उलटी वाट घाट जहाँ नाहीं निजपुर वास बसायाहो ॥
चन्द न सूर गगन नहिं तारे राति दिवस नहिं पायाहो ।
नहीं तिमिर जहाँ चांदनि नाहीं नहीं धूप नहिं छायाहो ॥
मनसों अगम सुगम नहिं बुधिसों अनभय अन्त न लायाहो ।
और कहौ कैसे करि पावै निगम नेति जेहि गायाहो ॥
है प्रत्यक्ष उदय सूरज ज्यों संपुट नाहिं छिपायाहो ।
बिन गुरु गमके अंजन आंजे दृष्टि नहीं दरशाया हो ॥
जनक जहाँ शुकदेव विराजैं चरणदास मिलि धाया हो ।
जगकी व्याधि लगन नहिं पाई किरपा करि पहुंचाया हो ॥
हमारे गुरु मारग बतलाया हो ।
आन देवकी सेवा त्यागी अज अविनाशी ध्याया हो ॥
हरि पूरण परसो निश्चयसों छांड़ौ झूठी माया हो ।
इकरस आतम नितही जानौ क्षणभंगी है काया हो ॥
चाहे मुक्तकरै तन किरिया भर्म अधिक भर्माया हो ।
वो करि पेड़ बबूल शूलके आँब कहो किन पाया हो ॥
अपना खोज किया नहिं कवहूं जल पाहन भटकाया हो ।
जैसे फल सेवत सेमर को कीर अधिक पछिताया हो ॥
ज्ञानपदारथ कठिन महानिधि बिन भेदी किन पाया हो ।
चरणदास घट सोहं सोहं तामें उलटि समाया हो ॥