भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 474, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ४३५
ज्ञान अज्ञान न पाइये नेम धर्म नहिं होय ॥
लाज गई अरु भय गयेरी अरी हेली अरु साथहि गई उपाधि ।
आशा अरु करणी गई खोये वाद विवाद ॥
मैं नाहीं हरिही रहेरी तू दौरत हरि ओट ।
पावैगी जब जानिहै हरि पावनके खोट ॥
गुरु शुकदेव सुनाइयारी अरी हेली चरणदास मन शोच ।
सब बातनसों जायगी रहै न तेरा खोज ॥
वह घर कैसा होय हेली जितके गये न बाहुरे ।
अमरपुरी जासों कहैरी अरी हेली मुक्तधाम है सोय ॥
विकट घाट वा ठौरकोरी शठ नहिं पावै पंथ ।
गुरुमुख ज्ञानी जाहिंहैं हरिसों सन्मुख संत ॥
त्रैगुण मत पहुँचे नहींरी अरी हेली छहौऋतुहाँ नाहिं ।
रवि शशि दोऊ हाँ नहीं नहीं धूप नहिं छाहिं ॥
अवधिनहीं कायानहींरी अरी हेली कलह कलेश न काल।
संशय शोक न पाइये नहिं माया को जाल ॥
गुरु शुकदेव दया करैं री अरी हेली चरणदास लहै देश ।
बिन सतगुरु नहिं पावई जो नानाकर भेश ॥
हेला ॥
दृष्टि उठाकर देख हेला ब्रह्म अनादि अरूप है।
आदि नहीं अन्तौ नहींरे हेला आप सनातन एक॥
नहिंधौला काला नहीं रे हेला हरा पीत नहिं लाल ।
तीनों गुणसे है परे नहीं पुरुष नहिं बाल ॥
शस्तर छेदि सकैन रे अरे हेला पावक सकै न जारि।
नीर भिजोय सकै नहीं ताहि न ब्यापै बयारि ॥