भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
मैं गुप्त मैं मुक्ता परगट मैंहीं भर्म झकोर ।
चरणदास मोबिन नहिं रंचक दूजा कोई और ॥
राग विहागरा ॥
गुप्तमतेकी बातरी जानै सोइ जानै ।
पशू ज्ञान अजमत को देखो अनभुस एकै सानै ॥
चलनीकी गति सबकी मति है मनमें अधिक सयानै ।
गहि असार सारको डारै निश्चल बुधि नहिं आनै ॥
हूँ गूंगो जगको नहीं सूझै सैन नहीं कोइ मानै ।
कासों कहौं अरु को सुनै सजनी कहूँ तौ को पहिंचानै ॥
सत्य ब्रह्मको जानत नाहीं मुरुख मुग्ध अयानै ।
चरणदासकह समुझतनहिंभोंदू फिरिफिरि झगरोठानै ॥
सुनिहो मुक्त मुक्त करूं तेरी ।
वेद पुराण जँजीर जरी है सबहीगत मारग मिलि घेरी ॥
तैं तौ मुक्ति बहुतकी कीन्ही जिन पापन उरझेरी ।
बन्धन सकल छुटाय काटूं जो आधीन होय तू मेरी ॥
स्वर्ग पताल ठौर नहिं तोको डोलत पेरी पेरी ।
अचल पुरुषसों जाय मिलाऊं तोहिं जानि साधनकी चेरी ॥
शुकदेव गुरु जब किरपा कीन्ही तू नाहीं कहुँ हेरी ।
चरणहिंदास वासना तजिकै आपहि आप करिहै निवेरी ॥
राग विहागरा व बिलावल ॥
अब हम ज्ञान गुरू से पाया ।
दुबिधा खोय एकता दरशी निश्चल ह्वै घर आया ॥
हिरदा शुद्ध हुआ बुधि निर्मल चाह रही नहिं कोई ।
ना कछु सुनौं न परसूं बूझं उलटि पलटि सब खोई ॥
समझभई जब आनंद पाये आतम आतम सूझा ।