सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 470

शब्दवाण । ४३१
राग काफी ॥
इन नैनन निराकार लहा ।
कहन सुननकी कौन पतीजै जान अजान है सहज रहा ॥
जित देखो तित अलख निरंजन अमर अडोल अबोलमहा ।
ज्योति जगत बिच मिलमिल झलकै अगम अगोचर पूरि रहा ॥
अलख लखा जब बेगमहूवा भर्मकोट जब तुरत दहा ।
सर्वमयी सब ऊपर राजै शून्य स्वरूपी ठोसठहा ॥
जीवन्मुक्त भया मन मेरा निर्भय निर्गुण ज्ञान महा ।
गुरु शुकदेव करी जब किरपा चरणदास सुख सिन्धु बहा ॥
राग आसावरी ॥
जबसों मन चंचल घर आया ।
निर्मल भया मैलगये सगरे तीरथ ध्यान जु न्हाया ॥
निर्वासी ह्वै आनँद पाये या जगसों मुख मोड़ा ।
पांचो भई सहज वशमेरे जब इनका रस छोड़ा ॥
भय सब छूटे अब को लूटे दूजी आश न कोई ।
सिमिटिसिमिटिरहा अपनेमाहीं सकल विकलनहिं होई ॥
निजमन हूवा मिटिगा दूवा को वैरी को मीता ।
बन्धमुक्तका संशय नाहीं जन्म मरणकी चीता ॥
गुरु शुकदेव भेव मोहिं दीयो जबसों यह गति साधी ।
चरणदाससों ठाकुरहूये छुटिगये वाद विवादी ॥
हम तौ आतम पूजाधारी ।
समझिसमझिकरिनिश्चय कीन्ही और सबनपर भारी ॥
और देवल जहाँ धुँधली पूजा देवत दृष्टि न आवै ।
हमरा देवत परगट दीखै बोलै चालै खावै ॥
जित देखौं तित ठाकुरद्वारे करौं जहां नित सेवा ।