भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवाण । ४३१
राग काफी ॥
इन नैनन निराकार लहा ।
कहन सुननकी कौन पतीजै जान अजान है सहज रहा ॥
जित देखो तित अलख निरंजन अमर अडोल अबोलमहा ।
ज्योति जगत बिच मिलमिल झलकै अगम अगोचर पूरि रहा ॥
अलख लखा जब बेगमहूवा भर्मकोट जब तुरत दहा ।
सर्वमयी सब ऊपर राजै शून्य स्वरूपी ठोसठहा ॥
जीवन्मुक्त भया मन मेरा निर्भय निर्गुण ज्ञान महा ।
गुरु शुकदेव करी जब किरपा चरणदास सुख सिन्धु बहा ॥
राग आसावरी ॥
जबसों मन चंचल घर आया ।
निर्मल भया मैलगये सगरे तीरथ ध्यान जु न्हाया ॥
निर्वासी ह्वै आनँद पाये या जगसों मुख मोड़ा ।
पांचो भई सहज वशमेरे जब इनका रस छोड़ा ॥
भय सब छूटे अब को लूटे दूजी आश न कोई ।
सिमिटिसिमिटिरहा अपनेमाहीं सकल विकलनहिं होई ॥
निजमन हूवा मिटिगा दूवा को वैरी को मीता ।
बन्धमुक्तका संशय नाहीं जन्म मरणकी चीता ॥
गुरु शुकदेव भेव मोहिं दीयो जबसों यह गति साधी ।
चरणदाससों ठाकुरहूये छुटिगये वाद विवादी ॥
हम तौ आतम पूजाधारी ।
समझिसमझिकरिनिश्चय कीन्ही और सबनपर भारी ॥
और देवल जहाँ धुँधली पूजा देवत दृष्टि न आवै ।
हमरा देवत परगट दीखै बोलै चालै खावै ॥
जित देखौं तित ठाकुरद्वारे करौं जहां नित सेवा ।