भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
४०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बहुतक ज्ञानी हरि है बैठे कहते आपहि आप ॥
हमहूं याचक नाचन आये यह नहिं अपना देश ।
चरणदास शुकदेव दया सों फिर नहिं काछूं भेश ॥
नट ज्यों नाचहि नाचिगये ।
तिन तिन भेश धरो जगमाहीं सो सो नाहिं रहे ॥
बहुतक स्वांग धरो राजा को बहुतक रङ्क भये ।
बहुतक भूप करणसे हुये कंचन दानदये ॥
बहुतक स्वांग सती के आये है गये अगिनमये ।
बहुतक चुण्डत मुण्डत योगी गुफा बनाय छये ॥
भीषम अरु द्रोणाचारज से शूरा बहुत ढये ।
रणसों पीठिदई नहिं कबहूं सन्मुख बाणलये ॥
बहुत यती सिधि है है बैठे लोगन चरण गहे ।
बहुतक कामी चतुर सयाने काम मुतास वहे ॥
उत्तम मध्यम काछ कछे हैं नाना स्वांग मचे ।
चरणदास शुकदेव दया सों प्रेमी होय नचे ॥
राग सारंग ॥
दुनिया मगन भये धन धाम ।
लालच मोह कुटुँबके पागे बिसरि गये हरिनाम ॥
एक घरी छुटकारो नाहीं बँधिरहे आठौयाम ।
पांच प्रहर धंधेमें माते तीन प्रहर सँग बाम ॥
फूले फिरत महा गर्बाये पवन भरे ये चाम ।
दीप कलश ज्यों बिनशि जायगो या तनको यहि काम ॥
साधु संग गुरुसेव न कीन्ही सुमिरे ना श्रीराम ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं कैसे पावों ठाम ॥
शब्दवर्णन । ४०१
राग काफी ॥
कोई दिन जीवै तौ कर गुजरान ।
कहर गरूरी छांड़ दिवाने तजो अकस की बान ॥
चुगुली चोरी अरु निंदालै झूठ कपट अरु कान ।
इनको डारि गहौ जत सतको सोई अधिक सयान ॥
हरिहरि सुमिरौ क्षण नहिं विसरौ गुरु सेवा मनठानि ।
साधुनकी संगतिकर निश दिन आवै ना कुछहानि ॥
मुड़ौ कुमारग चलौ सुमारग पावै निजपुर बास ।
गुरु शुकदेव चेतावैं तोको समझ चरणहींदास ॥
एते पर क्यों हुआ मगरूर ।
क्षणभंगी यह तन बहुरंगी जरिवरि होइहै धूर ॥
मूछ मरोरि चलै वांकी गति अकड़ि अकड़िरहै घूर ।
छैल चिकनियां माया मद में मातो चकनाचूर ।
काम क्रोध के शस्तर बांधे लोभ रह्यो भरि पूर ॥
गुरु को ज्ञान न मनमें आवै ऐसा है बेसहूर ।
करि अभिमान जगत सच मानै हरिको जानै दूर ॥
चरणदास शुकदेव बतावै सांईं सदा हुजूर ॥
राग बिलावल ॥
राम नाम तैं क्यों बिसराया ।
सीखो कपट झपट छल बल बहु कामरु क्रोध मोह लव लाया ॥
चारि दिनाका जगत अचम्भा झूठे सुख में कहा लोभाया ।
क्षण इक सतसंगति नहिं कीन्ही जन्म अकारथ खोयबहाया ॥
वाद विवाद स्वादको चौकस विषय बास रस में लपटाया ।
दया धर्म हिरदय सों भूला परनिन्दा हिंसाको धाया ॥
चौरासीलख योनि भुगुति करि मनुष स्वरूप भाग्यसों पाया ।
४०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
लाहा कछू न किया हासिल योंही उलटा मूल गवांया ॥
श्रीशुकदेव पुकार चितावैं समझत ना केतो समझाया ।
चरणदास कलियुगके माहीं हरिगुण गावन सार बताया ॥
नाहीं रे कोइ हरि बिन तेरो ।
यह जग जाल महा दुखदाई तामें है इक रैनि बसेरो ॥
आनि फँसों मायाके फन्दन मोहममत कीन्हो उरझेरो ।
रंचकहू छुटकारो नाहीं बिषय स्वाद पांचौ ने घेरो ॥
साधु सन्त सों नेह न राखै दारा सुत सम्पति को चेरो ।
अन्तकाल बहुतै पछितैहौ जब मारै यम आय थपेरो ॥
धनके कारण घर घर डोलै पर काजे पचि मरत घनेरो ।
जोरत दाम बामवश ह्वैकै काम क्रोध सों हित बहुतेरो ॥
जो चाहै तू भलो आपनो तौ ह्यां से करु बेगि निबेरो ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं छांड़ि देहि सब विषय बखेरो ॥
राग धनाश्री ॥
अपना हरि बिन और न कोई ।
मात पिता सुत बन्धु कुटुंब सब स्वारथ ही के होई ॥
या कायाको भोग बहुतदै मर्दन करि करि धोई ।
सोभी छूटत नेक नेकसी संगन चाली वोई ॥
घरकी नारि बहुतही प्यारी तिनमें नाहीं दोई ।
जीवत कहती साथ बलूँगी डरपन लागी सोई ॥
जो कहिये यह द्रव्य आपनो जिन उज्ज्वल मति खोई ।
आवत कष्ट रखत रखवारी चलत प्राण ले जोई ॥
इस जगमें कोइ हितू न दीखै मैं समझाऊं तोई ।
चरणदास शुकदेव कहैं यों सुनिलीजौ नर लोई ॥
शब्दवर्णन । ४०३
राग कान्हरा ॥
हरि बिन कौन तुम्हारो मीता ।
कुटुँब सँघाती स्वारथ लागे तेरी काहूको नहिं चीता ॥
तैं प्रभु ओरी सों मुख मोड़ा झूठे लोगन सों हितकीता ।
अरु तैं अपनी आंखों देखा कई बार दुख सुख हो बीता ॥
सम्पतिमें सबही घिरि आवैं विपतिपरे अधिकी दुखदीता ।
मूटी बांधि जनम नर लायो हाथ पसारि चलैगो रीता ॥
धरि धरि स्वांग फिरे तिनकारण कपि ज्यों नाचत ताताधीता ।
मुये न संगी होहिं तिहारे बाँधि जलावैं देह पलीता ॥
गुरुसेवा सतसंग न कीन्हीं कनक कामिनी सों करि प्रीता ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं मरत मरत हरिनाम न लीता ॥
राग रामकली ॥
धनि धनि वे नर हरि शरणाये ।
और पशुन सों सबही नीचे परमारथ के काम न आये ॥
अचरज मनुषा देही दुर्लभ बड़भाग्यान सों पाई ।
तीनोंपन में नाहिं सँभारी झूठे धंधे योंहिं गँवाई ॥
बालापन खेलन में खोया तरुण भया सँगनारी ।
बूढ़ाभये कुटुंब के संशय पावतहै अतिही दुखभारी ॥
जिन कारण तैं पाप कमाये सो नहिं चलि हैं लारी ।
तेरेही शिर आनिपरैगी जैहो अकेले नरक मँझारी ॥
गर्भ माहिं तैं बचन किये थे करिहौं भक्ति तुम्हारी ।
इहां आके कछु औरै कीन्हा प्रभु से झूठा हुआ अनारी ॥
हो सांचा अजहूं सुमिरणकर होहिं दयाल मुरारी ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं आगेहु पतित किये भवपारी ॥
४०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
फिर फिर मूरुख जन्म गँवायो ।
हरिकी भक्ति साधुकी संगति गुरुकेचरणनमेंनहिंआयौ॥
धनके जोरन को दृढ़ कीन्हो महल करन व्रतधारो ।
टेकपकड़ कर नारी सेई शिरपर बोझ लियो अतिभारो॥
हैहै दुख नानाविधि केरे तन मन रोग बढ़ायो ।
जीवत मरतनहीं सुखपैहौ आवागमनको बीजजगायो ॥
भर्मि भर्मि चौरासी आयो मनुषा देही पाई ।
यातनकी कछुसार न जानी फिरि आगे चौरासी आई ॥
आंखि उघारि समुझ मनमाहीं हिरदय करौ बिचारा ।
ऐसा जन्म बहुरि कब पैहौ बिरथा खोवै जग व्यवहारा ॥
जानौगे जग छांड़ि चलौगे कोइ न संग तुम्हारे ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं याद करौगे बचन हमारे ॥
राग बिहाग ॥
रे नर हरि प्रताप ना जाना ।
तुवकारण सबकछुतिन कीन्हा सो करता न पिछाना ॥
जिहिप्रताप तेरिसुन्दरि काया हाथ पाँव मुखनासा ।
नैन दिये जासों सब सूझै होय रहा परकासा ॥
जिहि प्रताप नानाविधि भोजन वस्त्र अभूषण धारै ।
वाकानाहिं निहोरा मानै ताको नाहिं सँभारै ॥
जिहि प्रताप तू भूप भयो है भोग करै मनमानै ।
सुखलै वाको भूलि गयो है करि करि बहु अभिमानै ॥
अधिकी प्यार करै मातोसों पल पल में सुधि लेवै ।
तूतौ पीठि दियेही नितही सुमिरण सुरति न देवै ॥
कृत्यघनी औ नूनहरामी न्याव इँसाफ न तेरे ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं अजहूं चेत सबेरे ॥
शब्दवर्णन । ४०५
राग बिहागरा ॥
अरे नर हरिका हेत न जाना ।
उपजाया सुमिरण के काजे तैं कछु औरे ठाना ॥
गर्भमाहिं जिन रक्षा कीन्ही ह्वां खाने को दीन्हा ।
जठर अग्निसों राखि लियो है अँग सम्पूर्ण कीन्हा ॥
बाहर आय बहुत सुधिलीन्ही दशन विना पयप्यायो ।
दांत भये भोजन बहु भांती हितसों तोहिं खिलायो ॥
और दिये सुख नानाविधि के समुझि देख मनमाहीं ।
भूलो फिरत महा गर्वायो तू कछु जानत नाहीं ॥
तव कारण सब कछु प्रभु कीन्हो तू कीन्हा निजकाजा ।
जग व्यौहार पगोही बोलै तोहिं न आवै लाजा ॥
अजहूं चेत उलट हरिसोंहीं जन्म सुफल करु भाई ।
चरणदास शुकदेव कहैं यों सुमिरण है सुखदाई ॥
राग काफी ॥
गुमराही छांड दिवाने मूरख बावरे ।
अतिदुर्लभ है नरदेह भया गुरुदेव शरण तू आवरे ॥
जगजीवन है निशिको स्वप्नो अपनो ह्यां कौन बतावरे ।
तोहिं पांच पचीसने घेरि लियो लखचौरासी भरमावरे॥
बीति गई सो बीति गई अजहूँ मनको समझावरे ।
मोहलोभसों भागिकैत्याग विषय कामक्रोधको धोयबहावरे ॥
शुकदेव कहैं सबही तजिकै मनमोहन सों लवलावरे ।
चरणदास पुकारि चिताय दियो मत चूकै ऐसे दाँवरे ॥
चलाआवै बलावै का द्योस कछू करिले भाई ।
ह्यांसे चलनाहोय अचानकही फिरि पाछे रहै अफसोस॥
४०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पीकै विषय की मदिरा मतवारा होय रहा बेहोस ।
बाटमाहिं तौ शूल बबूलघने अरु जाना है कह कोस ॥
दमहीं दमहीं दम छीजतहै पलपल घटै तनजोस ।
माया मोह कुटुंबका सुख ऐसे जैसे दीखै मोती ओस ॥
शुकदेव दियो कृपा करिकै रामरसका प्याला नोस ।
चरणदास कहैं यहबात भलीं सुनिलैजै दोनों गोस ॥
राग सोरठ ॥
कछु मन तुम सुधिराखो वा दिनकी ।
जादिन तेरी देह छुटैगी ठौर बसौगे बनकी ॥
जिनके संग बहुत सुख कीन्हे मुख ढकि होयहैं न्यारे ।
यमको त्रास होय बहुभांती कौन छुटावनहारे ॥
देहरीलौं तेरी नारि चलैगी बड़ी पौरिलौं माई ।
मरघटलौं सबबीर भतीजे हंस अकेलो जाई ॥
द्रव्य गड़े अरु महल खड़ेही पूरतहैं घरमाहीं ।
जिनके काज पचे दिनराती सो सँग चालत नाहीं ॥
देव पितर तेरे काम न आवैं जिनकी सेवालावैं ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं हरि बिन मुक्ति न पावैं ॥
मोको भय अति वाही दिनको ।
जब वह पक्षी माया लोभी त्यागै पिंजरा तनको ॥
सुत दारा के मोह फँसो है लोभ लगो है धनको ।
काम क्रोधको कांपा खायो भयो अधीन सबनको ॥
पांच पहर धन्धे में खोया नाम न लेत भजनको ।
तीनि पहर नारी सँग मातो मानत सुख इन्द्रिनको ॥
आपन को ऊंचो करिजानै करि अभिमान बरनको ।
शब्दवर्णन । ४०७
सतसंगतिके निकट न आवै जोहै ठाट तरनको ॥
यमकिंकर जब आनि गहैंगे तब ना धीर धरनको ।
गुरु शुकदेव सहाय करेंगे आसरो दास चरनको ॥
राग केदारा ॥
सो मेरो कहो मानरे भाई ।
ज्ञान गुरूको राख हिये में बंध कटि जाई ॥
बालपनते खेलि खोयो गई तरुणाई ।
चेत अजहूँ भली बरहै जराहूं आई ॥
जिनके कारण बिमुख हरिते फिरत भटकाई ।
कुटुम्ब सबही सुख के लोभी तेरे दुखदाई ॥
साधु पदवी धारणाधर छांड़ कुटिलाई ।
वासना तजि भोग जगके होय मुकताई ॥
बहुरि योनी नाहिं आवै परमपद पाई ।
चरणदास शुकदेवके घर आनँद अधिकाई ॥
भाईरे अवधि बीतीजात ।
अंजली जल घटत जैसे तारे ज्यों परभात ॥
श्वास पूंजी गांठि तेरे सो घटत दिन रात ।
साधु संगत पैंठ लागी ले लगै सोइ हाथ ॥
बड़ो सौदा हरि सँभारो सुमिरिलीजै प्रात ।
काम क्रोध दलाल ठगिया बणिजमत इनसाथ ॥
लोभ मोह बजाज छलिया लगैंहैं तेरि घात ।
शब्द गुरुको राखि हिरदय तौ दगा नहिं खात ॥
अपनी चतुराई बुधि पर मति फिरै इतरात ।
चरणदास शुकदेव चरण परश तजि कुलजात ॥
४०८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग सोरठ ॥
भाईरे स्वपन यह संसार ।
देह स्वप्ना जन्म स्वप्ना स्वपन कुल ब्योहार ॥
माय स्वप्ना बाप स्वप्ना स्वपन सुत अरु नारि ।
लाज स्वप्ना जाति स्वप्ना स्वपन अस्तुति गारि ॥
योग स्वप्ना भोग स्वप्ना कियो वेद निषेद् ।
स्वप्न सो जो होय मिटि है स्वप्न सुख अरु खेद ॥
बन्ध स्वप्ना मुक्ति स्वप्ना स्वप्न ज्ञान विचार ।
स्वपन है सो बिनशि जैहै रहैगो ततसार ॥
चरणदास स्वप्ना ब्रह्म सांचो एक रस नित ज्ञान ।
सत्य स्वप्ना झूठ स्वप्ना कहाकरूं निर्बान ॥
भाई रे तजौ जग जंजाल ।
संग तेरे नाहिं चालै महल बाहन माल ॥
मात पितु सुत और नारी बोल मीठे बैन ।
डारि फांसी मोहकी तोहिं ठगत हैं दिनरैन ॥
छलधतूरो दियो सब मिलि लाज लड्डू माहिं ।
जान अपने कह भुलानो चेतता क्यों नाहि ॥
बाज जैसे चिड़ी ऊपर भँवत तोपर काल ।
मारतै गहि लै चलैंगे यम सरीखे साल ॥
सदा सँघाती हरि बिसारो जन्म दीन्हो हार ।
चरणदास शुकदेव कहिया समझ मूढ़ गंवार ॥
भाई रे समझ जग ब्योहार ।
जबताईं तेरे धन पराक्रम करै सबही प्यार ॥
अपने सुखको सबहि चाहैं मित्र सुत अरु नारि ।
इन्हौं तौ अपवश कियो है मोह बेड़ी डारि ॥
शब्दवर्णन । ४०६
सबन तोकों भय दिखायो लाज लकुटीमार ।
बाजीगर के बांदरा ज्यों फिरत घर घर द्वार ॥
जबै तोको बिपति आवै जरा कोर बिकार ।
तबै तोसूं लाज मानैं करैं ना तेरि सार ॥
इनकि संगति सदा दुख है समझ मूढ़ गवाँर ।
हरि प्रियतम को सुमिरिले कहैं चरणदास पुकार ॥
राग विहाग ॥
ये सब अप स्वारथ के गरजी ।
जगमें हेत न कीजै काहूसों अपने मनको बरजी ॥
रोपें फन्द घात बहु डारें इनते तू डरयेजी ।
हृदय कपट बाहर मिठबोलैं यह छल हैगो कहजी ॥
सौगँद खाय झूठ बहु बोलैं भवसागर कैसे तरजी ।
दुख सुख दर्द दया नहिं बूझें इनसे छुटावो हरिजी ॥
वैरी मित्र सबै चुनिदेखे दिलके महरम कहजी ।
इनको दोष कहा कह दीजै यह कलियुगकी झरजी ॥
दुनियाभगल कुटिलबहु खोटी देखिछातीमेरी लरजी ।
चरणदास इनको तजि दीजै चल बस अपने घरजी ॥
राग आसावरी ॥
साधो राम भजेते सुखिया ।
राजा परजा नेमी दाता सबही देखे दुखिया ॥
जो कोई धनवंत जगतमें राखत लाख हजारा ।
उनको तौ संशयहै निशिदिन घटत बढ़त व्योहारा ॥
जिनके बहुसुत नाती कहिये और कुटुँब परिवारा ।
वें तौ जीवन मरणके काजे भरतरहैं दुखभारा ॥
नेमी नेम करत दुख पावै कर अस्नान सबेरा ।
४१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दाताको देबेका दुखहै जब मँगतों ने घेरा ॥
चारि वरण में कोउ न देखो जाको चिन्ता नाहीं ।
हरि की भक्ति बिना सब दुख है समझ देख मनमाहीं ॥
सतसंगति अरु हरि सुमरणकरि शुकदेवा गुरु कहिया ।
चरणदास बिपता सब तजिकै आनँद में नित रहिया ॥
राग सारंग ॥
नर रामभजे सुख पाय है ।
दुख भाजैं अरु पातक नाशौ जौरा निकट न आयहै ॥
चेत सबेरे कहूं पुकारे नातरु तू पछितायहै ।
जगत ठाट सब ह्यांकी शोभा संग न कोई जायहै ॥
बिन गोपाल तुम्हारो को है हमको देहु बतायहै ।
पकरि बांधि यम मारनलागैं जब को होय सहायहै ॥
देखु बिचारि समुझु मनमाहीं तो बुधि जो अधिकायहै ।
तौ तू आव उलटि हरि सौंहीं चालो जनम सिरायहै ॥
चरणदास शुकदेव कहतहैं अब यह अधिक सयानहै ।
गुरुकी शरण साधुकी संगति प्रभुको कीजै ध्यानहै ॥
राग भैरव ॥
चेतौरे नर करौ विचार । छलरूपी है यह संसार ॥
स्वभा मात पिता सुतबंधू । स्वभा है सबही सम्बन्धू ॥
देखैकहै सुनैसो स्वपना । याजगमें नाहीं कोइ अपना ॥
स्वभा धरती और अकाशा । स्वभा चन्द्रसूर्य परकाशा ॥
स्वभा जलथल पावक पौन । स्वभा योग भोग अरु मौन ॥
स्वभा मायाको व्यवहार । स्वभा कुलनाता परिवार ॥
स्वभा देश नाम अरु भेश । स्वभा उत्पति परलय शेश ॥
शब्दवर्णन । ४११
स्वप्ना राजा रानाराव । स्वप्नै बानिक बन्यो बनाव ॥
स्वप्नै लरै मरै अरु भागै । स्वप्नै सोवै स्वप्नै जागै ॥
स्वप्नाहै यह सबही ठाट । उठी पैंठ जब मुंदिगइ हाट ॥
जो कछुहै सो सबही स्वप्ना । सांचाहरि हरि हरिहरिजपना ॥
क्यों भूला मूरख मस्तान । अजहूँ समुझि लेहिगुरुज्ञान ॥
गफलत छांड़ि भजौ हरिनाम । जो चाहै तू निश्चल धाम ॥
ज्योंसोवत स्वप्नोदरशाय । आंखिखुलै जबहीं मिटिजाय ॥
ऐसेही सब स्वपना जान । अचल अखण्ड रहै भगवान ॥
सबठाँ ब्रह्म रह्यो भरपूर । ना अति निकट नहीं बहुदूर ॥
जो कोइ खोजै सोई पावै । ततदरशी यह भेद बतावै ॥
गुरु शुकदेव पुकारि चितावै । झूठसांचको न्याव चुकावै ॥
चरणदास सब स्वपना जान । सदा एकरस ब्रह्म पिछान ॥
राग मलार ॥
सतगुरु भवसागर डरभारी ।
काम क्रोध मद लोभ भवँर जित लरजत नाव हमारी ॥
तृष्णा लहर उठत दिन राती लागत अति झकझोरा ।
ममता पवन अधिक डरपावै कांपतहै मनमोरा ॥
और महाडर नानाविधिके क्षण क्षणमें दुख पाऊं ।
अन्तरयामी बिनती सुनिये यह मैं अरज सुनाऊं ॥
गुरु शुकदेव सहाय करौ अब धीरज रहा न कोई ।
चरणदास को पार उतारो शरण तुम्हारी सोई ॥
राग बिलावल ॥
भक्ति गरीबी लीजिये तजिये अभिमाना ।
दो दिन जगमें जीवना आखीर मरजाना ॥
४१२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पाप पुण्य लेखा लिखैं यम बैठे थाना ।
कह हिसाब तुम देहुगे जब जाहि दिवाना ॥
मात पिता कोइ ह्यां नहीं सबही बेगाना ।
द्रव्य जहां पहुँवै नहीं नहिं मीत पिछाना ॥
एकसों एकहि होयगी हां सांच तुलाना ।
काहूकी चालै नहीं छनै दूधरु पाना ॥
साहिबकी करि बन्दगी दे भूखे दाना ।
समझावैं शुकदेवजी चरणदास अयाना ॥
राग काफी ॥
घरी दोमें मेला बिछुरै साधो देखि तमाशा चलना
जे ह्यां आकर हुये इकट्ठे तिनसों बहुरि न मिलना ।
जैसे नाव नदी के ऊपर बाट बटेऊ आवैं ।
मिलि मिलि जुदेहोयँ पलमाहीं आप आपको जावैं ॥
या बारी बिच फूल घनेरे रंग सुगन्ध सुहावैं ।
लागैं खिलैं फेरि कुम्हिलावैं झरैं टूटि विनशावैं ॥
दारा सुत सम्पति को सुख ज्यों मोतीओस बिलावैं ।
ह्यांईं मिलैं और ह्यां नाशें ताको क्यों पछितावैं ॥
दै कुछ लै कुछ करिले करणी रहनी गहनी भारी ।
हरिसों नेह लगाय आपनो सो तेरो हितकारी ॥
सतसंगति को लाभ बड़ो है साध भक्त समुझावैं ।
चरणदास हो राम सुमिरिले गुरु शुकदेव बतावैं ॥
वह मेला सोइ भलाहै साधो जहँ सन्तों का भेला ।
जिनके रहै सदा हरिचरचा सुमिरैं राम सुहेला ॥
कथा कहैं अरु करें कीर्त्तन ज्ञान ध्यान समुझावैं ।
सोवत जागत बैठे चलते गोविंदके गुण गावैं ॥
शब्दवर्णन । ४१३
बोलैं अमृतवाणी सबसों कुमति कुबुद्धि छुटावैं ।
हरिकी भक्ति साधुकी संगति यह उपदेश बतावैं ॥
माला तिलक रामको बाना सुन्दर वेष बनावैं ।
घरघर होय आरती मंगल नवधासों चितलावै ॥
निशिदिन आनँदरूप दिवाली सदा वसन्त सोहायो ।
प्रेम महोत्सव नितही उत्सव सबै ठाट मनभायो ॥
या बिधि सों मन मगनहोय करि भजन करैं अतिभारी ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं घटमें होय उज्यारी ॥
राग पर्ज ॥
राम धन जो कोइ पावैहो ।
राज बड़ाई इन्द्र पदवी सुरति न लावै हो ॥
आठ सिद्धि नौनिद्धि के लालच नहिं लागै हो ।
तीनिलोक तुच्छ जानिकै तामें नहिं पागैहो ॥
अर्थ धर्म काम मोक्षकी करणी नहिं ठानै हो ।
चारि मुक्त बैकुंठ लौं कछु वस्तु न जानैहो ॥
सबसे नीचा ह्वै चलै मुख झूठ न भाखैहो ।
हिंसा अकस वासना कोइ नेक न राखैहो ॥
साधुनकी करि चाकरी जब वह धन आवैहो ।
चरणदास से रंकको शुकदेव बसावैहो ॥
जिन्हैं हरिभक्ति पियारी हो ।
मात पिता सहजै छुटैं छुटे सुत अरु नारी हो ॥
लोक भोग फीके लगैं सम अस्तुति गारीहो ।
हानि लाभ नहिं चाहिये सब आशा हारीहो ॥
जगसों मुख मोरै रहैं करैं ध्यान मुरारीहो ।
जित मनुवाँ लागोरहै भइ घट उजियारीहो ॥
४१४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरु शुकदेव बताइया प्रेमी गति भारीहो ।
चरणदास चारौ वेदसों औरै कछु न्यारी हो ॥
रेखता राग भट्यार ॥
तजिकै जगतकी रीतिको करु आपनी तदबीर । इस जग
भरोसे ख्वारहो सुन यारमन ॥ यारमन गये शाह अमीर ।
एकदम करारी है नहीं क्षणक्षण में फेरैंरंग ॥ कबहूं तौ हैरां
सुखधना सुन यारमन । यारमन चल विचल बेढँग ॥ हश-
मत व शौकत थिर नहीं मत देखिहो मगरूर । ठहराव ताको
है नहीं सुन यारमन ॥ यारमन भग्गल बड़ाईधूर । जाहिं
श्वासा सबचले ज्यों आवदर गिरवाल ॥ याद साहबकी
करो सुन यारमन । यारमन सुमिर हरि हरि हाल ॥
शुकदेव सतगुरु ने मुझे कायम बतायो राम । चरणहिंदासा
चित धरो सुन यारमन ॥ यारमन जपौ आठौ याम ॥
रेखता ॥
दोदिनका जगमें जीवना करताहै क्यों गुमान ।
ऐबेशहूर गीदी टुक रामको पिछान ॥
दावा खुदीका दूरकर अपने तू दिलसेती ।
चलताहै अकड़ अकड़ जवानीका जोश आन ॥
मुरसदका ज्ञान समझिकै हुशियार हो शिताब ।
गफलतको छांड़ि सोहबत साधौंकी खूबजान ॥
दौलतकाजौम ऐसे ज्यों आब का हुबाब ।
जाता रहेगा क्षणमें पछितायगा निदान ॥
दिन रात खोवताहै दुनिया के कारबार ।
इकपलभि याद सांई कि करता नहीं अजान ॥
शब्दवर्णन । [पृष्ठ ४१५]
शुकदेव गुरू ज्ञान चरणदास को कहैं ।
भजु रामनाम सांचा पद मुक्तका निधान ॥
हेला ॥
जगको आवन जानि हेला याको शोक न कीजिये ।
यह संसार असारहैरै अरे हेला हरिसों कर पहिंचान ॥
कुटुंब संगआयो नहीं रे अरे हेला ना कोइ संग न जाय ।
ह्यांईं मिलैं ह्यांईं बीछुरैं ताको झुरै बलाय ॥
महल द्रव्य किस कामकेरे अरे हेला चलै न काहू साथ ।
राम तजे इनसों पगे हारी अपने हाथ ॥
जीवत काया धोवतेरे अरै तेल फुलेल लगाय ।
मजलिस करिकै बैठते मूये काग न खाय ॥
लाभभये हरषै नहीं रे अरे हेला हानि भये दुख नाहिं ।
ज्ञानीजन वहि जानिये सब पुरुषन के माहिं ॥
गुरु शुकदेव चितावईरे अरे हेला चरणदास हिय राखि ।
मनुष जन्म दुर्लभ मिलै वेद कहत हैं साखि ॥
झूठी जगकी प्रीति है नहीं छांडूं हरिसों मीत हेला ।
रंग कुसुम संसारकोरे अरे हेला प्रभुको रंग मजीठ ॥
धन यौवन थिर ना रहैरे अरे हेला मतकर गर्व गुमान ।
क्षण क्षण औसर जातहै हरिसों कर पहिंचान ॥
अन्तसमय पछितायगोरे हेला जब यम घेरैं आय ।
जिनके सँग तू मिल रहो कोइ न छुटावै जाय ॥
बीति गई सो जानदे रे अरे हेला अजहूं समझ गवाँर ।
शरण गहो सत्संग की गुरुके वचन सँभार ॥
श्रीशुकदेव बताइयारे अरे हेला रामनाम ततसार ।
चरणदास यों कहतहैं लैले उतरो पार ॥
४१६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बोलत टेढ़ी बात हेला माया मदमातो रहै ।
सबहीसों ऐंठो फिरैरे अरे हेला क्षणमें वेग रिसात ॥
व्याज बढ़ा दुगुने करैरे अरे हेला करै चौगुने दाम ।
नानारस के स्वाद ले खाय फुलावै चाम ॥
करसों कबहुं न दानदेरे अरे हेला शीश ननावै साध ।
जिह्वासों हरि ना जपै बहुत करै बकवाद ॥
पगसों तीरथ ना रमैरे अरे हेला सुनै न श्रीभागवत ।
अकड़ अकड़ मनमाहिं यों जानि बड़ो कुलगोत ॥
परछाहीं देखे चलेरे अरे हेला बांकी बांधै पाग ।
सो देही किस कामकी खैहैं श्वान न काग ॥
पुत्र कलत्र हैं घनेरे अरे हेला सुख में करत कलोल ।
हरिभक्तन सों नेह ना कहै क्रोधके बोल ॥
धर्म कर्म कछु ना करै अरे हेला नहिं सतगुरुसों प्रीति ।
हरिचरचा सों जरिमरै यह डूबनकी रीति ॥
जगको सांचो जानिकैरै अरे हेला हरिको दियो बिसार ।
अन्तसमय यम त्रास दै डारै नरक मँझार ॥
श्रीशुकदेव ऐसे कहीरे अरे हेला छांड़ विषय जंजाल ।
चरणदास भजु रामको सोई उतारै पार ॥
हेली ॥
यह अवसर फिरि नाहिं हेली राम भजन करिलिजिये ।
यह तन क्षण क्षण जात है ज्यों तरुवर की छांह ॥
पिछले दिन सब खो दियेरी अरी हेली कियो न हरिसोंसीर ।
रहे सो ऐसो जानिले ज्यों अंजलि को नीर ॥
बचै सो लाहा लीजियेरी सतसंगति के माहिं ।
शब्दवर्णन । ४१७-
हिलमिल हरियश गाइये दृढ़ता जीकी बाहिं ॥
जन्म सफल जब होयगो कुल पारायण होय ।
एकरु सौ पीढ़ी तरैं रसना हरिगुण पोय ॥
यही स्मृति यहि वेद है यहि साधन को भेव ।
चरणदास हिय में धरौ कहिया गुरु शुकदेव ॥
और न मीता कोय हेली समुझि सँभारो रामजी ।
जीवत की रक्षा करै मुये मुक्त करें तोहिं ॥
अरु सब स्वारथके सगेरी अन्त न कोई साथ ।
सुखमें सबही रल मिलै दुखमें सुनै न बात ॥
छल करि मनकी बूझले पाछे दारै घात ।
तिनको तू अपनो कहै सो दोषी है जात ।
भेद न अपनो दीजियेरी अरी हेली कोऊ कैसो होय ।
हिरदय की हिरदय रहैं हरिही जानै सोय ॥
कै गुरु अपनो जानिये कै सतसंगत वास ।
गुरु शुकदेव बतावई देख चरणहींदास ॥
यह नहिं अपना देश हेली ह्वां नहिं मनको दीजिये ।
अपने घरको चालियेरी करि योगिनिको वेष ॥
कानन मुद्रा योगकीरी अरी हेली ज्ञान जटा शिरधारि ।
चोला भक्ति सोहावनो धीरज आसन मारि ॥
सेली¹ सतवैराग की अरी हेली शील विभूति रमाय ।
यतकी सींगी कीजिये वारंवार बजाय ॥
कर्म जलाय धूनी करो झूमौं दशवेंद्वार ।
अमल सुधारस पीजिये बाढ़ रंग अपार ॥
इसबाने पियको मिलौरी अरी हेली सदासुहागिनिहोय।
१ गुदरी ।
४१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरु शुकदेव बतावई चरणदास बन सोय ॥
अथ ज्ञान अंग ॥
राग करषा ॥
साधो गुरु दया आपको यों विचारा ।
झूठ अरु सांचको समुझिकरि मूलसों माया अरु ब्रह्मको
किया न्यारा ॥ पांच अरु तीन गुण देहको ठाटहै तासुको लगत
है सब विकारा । ब्रह्म अडोल अबोल अतोल है और निर्लिप्त
हरि निर्विकारा ॥ जाके रूप नहिं रेख अरु नाम सूरत नहीं सोई
निज तत्त्वहै निराकारा । सुरति अरु निरति दोऊ जहां थकिरहैं
तहां बिन भान अतिहै उज्यारा ॥ बिना गुरुमुखी कोउ पहुँचि
हां ना सकै कनक अरु कामिनी घेरि मारा । चलै सोइ सन्त
निर्वाण द्वै शूरमा ज्ञान अरु ध्यानको कर अहारा ॥ आवा अरु
गमनकी टूटि फांसी गई पायो गुरु भेद गयो तिमिर सारा ।
चरणदास शुकदेव मिले भर्म सब दलि मले होय रणजीत
अविगति निहारा ॥
साधो ब्रह्म दरियाव नहिं वारपारा ।
आदि अरु मध्यकहुं अन्त सूझै नहीं नेतिही नेति वेदन पुकारा ॥
मूल परकिर्त्तिसी बहुत लहरें उठैं सकै को पाय गुणहैं अपारा ।
विरंचि महादेवसे मीन बहुतै जहां होय परगट कभी गोत मारा ॥
तासुमें बुदबुदे अण्ड उपजें मिटें गुरु दई दृष्टि जासों निहारा ।
छका छवि देखिकै अतिथिका भेषकरि जगे जब भाग निरखी
बहारा ॥ मरजिया पैठिया थाह पाई नहीं थका हांईरहा फिर न
आया । गयाथा लाभको मूल खोया सबै भया आश्चर्य आपन
गवाँया ॥ पाल बिन सिन्धु अरु निरा आनन्द है आपही आप
शब्दवर्णन । ४१६
हौ निराधारा । चरणदास शुकदेव दोऊ तहां रलमिले तुरतहीं
मिटिगया खोज सारा ॥
राग धनाश्री ॥
सहजगति ज्ञान समाधि लगाई ।
रूप नाम जहाँ किरिया छूटी हू मैं रहन न पाई ॥
बिन आसन बिन संयम साधन परमातम सुधि पाई ।
शिव शक्ती मिलि एक भये हैं मन माया न हिराई ॥
मगनरहौं दुख सुख दोउ मेटै चाह अचाह मिटाई ।
जीवन मरण एक सों लागै तबते आप गवाँई ॥
मैं नाहीं नख शिख हरि राजैं आदि अन्त मध्याई ।
शङ्का कर्म कौनको लागै काकी होय मुकताई ॥
सकल आपदा व्याधि टरी सब दुई कहां मो माहीं ।
सब हमहीं रामा नहिं पइये सब रामा हम नाहीं ॥
नित आनन्द काल भय नाहीं गुरु शुकदेव समाधी ।
चरणदास निज रूप समाने यह तौ समझ अगाधी ॥
निरन्तर अटल समाधि लगाई ।
ऐसी लगी टरै नहिं कबहूं करणी आश छुटाई ॥
काको जप तप ध्यान कौन को कौन करै अब पूजा ।
कियो विचार नेक नहिं निकसै हरिबिन और न दूजा ॥
मुद्रा पांच सहजगति साधी आलस आसन सोई ।
सब रस ब्रह्म मूल जब शोधा आप विसर्जन होई ॥
भूलो बन्ध मुक्तिगति साधन ज्ञान विवेक भुलाना ।
आतम अरु परमातम भूला मन भयो तत गलताना ॥
अंचल समाधि अन्त नहिं ताको गुरु शुकदेव बताई ।
चरणदास को खोज न पइये सागर लहर समाई ॥