भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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बहुतक ज्ञानी हरि है बैठे कहते आपहि आप ॥
हमहूं याचक नाचन आये यह नहिं अपना देश ।
चरणदास शुकदेव दया सों फिर नहिं काछूं भेश ॥
नट ज्यों नाचहि नाचिगये ।
तिन तिन भेश धरो जगमाहीं सो सो नाहिं रहे ॥
बहुतक स्वांग धरो राजा को बहुतक रङ्क भये ।
बहुतक भूप करणसे हुये कंचन दानदये ॥
बहुतक स्वांग सती के आये है गये अगिनमये ।
बहुतक चुण्डत मुण्डत योगी गुफा बनाय छये ॥
भीषम अरु द्रोणाचारज से शूरा बहुत ढये ।
रणसों पीठिदई नहिं कबहूं सन्मुख बाणलये ॥
बहुत यती सिधि है है बैठे लोगन चरण गहे ।
बहुतक कामी चतुर सयाने काम मुतास वहे ॥
उत्तम मध्यम काछ कछे हैं नाना स्वांग मचे ।
चरणदास शुकदेव दया सों प्रेमी होय नचे ॥
राग सारंग ॥
दुनिया मगन भये धन धाम ।
लालच मोह कुटुँबके पागे बिसरि गये हरिनाम ॥
एक घरी छुटकारो नाहीं बँधिरहे आठौयाम ।
पांच प्रहर धंधेमें माते तीन प्रहर सँग बाम ॥
फूले फिरत महा गर्बाये पवन भरे ये चाम ।
दीप कलश ज्यों बिनशि जायगो या तनको यहि काम ॥
साधु संग गुरुसेव न कीन्ही सुमिरे ना श्रीराम ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं कैसे पावों ठाम ॥