भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पीकै विषय की मदिरा मतवारा होय रहा बेहोस ।
बाटमाहिं तौ शूल बबूलघने अरु जाना है कह कोस ॥
दमहीं दमहीं दम छीजतहै पलपल घटै तनजोस ।
माया मोह कुटुंबका सुख ऐसे जैसे दीखै मोती ओस ॥
शुकदेव दियो कृपा करिकै रामरसका प्याला नोस ।
चरणदास कहैं यहबात भलीं सुनिलैजै दोनों गोस ॥
राग सोरठ ॥
कछु मन तुम सुधिराखो वा दिनकी ।
जादिन तेरी देह छुटैगी ठौर बसौगे बनकी ॥
जिनके संग बहुत सुख कीन्हे मुख ढकि होयहैं न्यारे ।
यमको त्रास होय बहुभांती कौन छुटावनहारे ॥
देहरीलौं तेरी नारि चलैगी बड़ी पौरिलौं माई ।
मरघटलौं सबबीर भतीजे हंस अकेलो जाई ॥
द्रव्य गड़े अरु महल खड़ेही पूरतहैं घरमाहीं ।
जिनके काज पचे दिनराती सो सँग चालत नाहीं ॥
देव पितर तेरे काम न आवैं जिनकी सेवालावैं ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं हरि बिन मुक्ति न पावैं ॥
मोको भय अति वाही दिनको ।
जब वह पक्षी माया लोभी त्यागै पिंजरा तनको ॥
सुत दारा के मोह फँसो है लोभ लगो है धनको ।
काम क्रोधको कांपा खायो भयो अधीन सबनको ॥
पांच पहर धन्धे में खोया नाम न लेत भजनको ।
तीनि पहर नारी सँग मातो मानत सुख इन्द्रिनको ॥
आपन को ऊंचो करिजानै करि अभिमान बरनको ।