सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 443, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 443

४०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
फिर फिर मूरुख जन्म गँवायो ।
हरिकी भक्ति साधुकी संगति गुरुकेचरणनमेंनहिंआयौ॥
धनके जोरन को दृढ़ कीन्हो महल करन व्रतधारो ।
टेकपकड़ कर नारी सेई शिरपर बोझ लियो अतिभारो॥
हैहै दुख नानाविधि केरे तन मन रोग बढ़ायो ।
जीवत मरतनहीं सुखपैहौ आवागमनको बीजजगायो ॥
भर्मि भर्मि चौरासी आयो मनुषा देही पाई ।
यातनकी कछुसार न जानी फिरि आगे चौरासी आई ॥
आंखि उघारि समुझ मनमाहीं हिरदय करौ बिचारा ।
ऐसा जन्म बहुरि कब पैहौ बिरथा खोवै जग व्यवहारा ॥
जानौगे जग छांड़ि चलौगे कोइ न संग तुम्हारे ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं याद करौगे बचन हमारे ॥
राग बिहाग ॥
रे नर हरि प्रताप ना जाना ।
तुवकारण सबकछुतिन कीन्हा सो करता न पिछाना ॥
जिहिप्रताप तेरिसुन्दरि काया हाथ पाँव मुखनासा ।
नैन दिये जासों सब सूझै होय रहा परकासा ॥
जिहि प्रताप नानाविधि भोजन वस्त्र अभूषण धारै ।
वाकानाहिं निहोरा मानै ताको नाहिं सँभारै ॥
जिहि प्रताप तू भूप भयो है भोग करै मनमानै ।
सुखलै वाको भूलि गयो है करि करि बहु अभिमानै ॥
अधिकी प्यार करै मातोसों पल पल में सुधि लेवै ।
तूतौ पीठि दियेही नितही सुमिरण सुरति न देवै ॥
कृत्यघनी औ नूनहरामी न्याव इँसाफ न तेरे ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं अजहूं चेत सबेरे ॥