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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 442, कुल 690 में से

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पृष्ठ 442

शब्दवर्णन । ४०३
राग कान्हरा ॥
हरि बिन कौन तुम्हारो मीता ।
कुटुँब सँघाती स्वारथ लागे तेरी काहूको नहिं चीता ॥
तैं प्रभु ओरी सों मुख मोड़ा झूठे लोगन सों हितकीता ।
अरु तैं अपनी आंखों देखा कई बार दुख सुख हो बीता ॥
सम्पतिमें सबही घिरि आवैं विपतिपरे अधिकी दुखदीता ।
मूटी बांधि जनम नर लायो हाथ पसारि चलैगो रीता ॥
धरि धरि स्वांग फिरे तिनकारण कपि ज्यों नाचत ताताधीता ।
मुये न संगी होहिं तिहारे बाँधि जलावैं देह पलीता ॥
गुरुसेवा सतसंग न कीन्हीं कनक कामिनी सों करि प्रीता ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं मरत मरत हरिनाम न लीता ॥
राग रामकली ॥
धनि धनि वे नर हरि शरणाये ।
और पशुन सों सबही नीचे परमारथ के काम न आये ॥
अचरज मनुषा देही दुर्लभ बड़भाग्यान सों पाई ।
तीनोंपन में नाहिं सँभारी झूठे धंधे योंहिं गँवाई ॥
बालापन खेलन में खोया तरुण भया सँगनारी ।
बूढ़ाभये कुटुंब के संशय पावतहै अतिही दुखभारी ॥
जिन कारण तैं पाप कमाये सो नहिं चलि हैं लारी ।
तेरेही शिर आनिपरैगी जैहो अकेले नरक मँझारी ॥
गर्भ माहिं तैं बचन किये थे करिहौं भक्ति तुम्हारी ।
इहां आके कछु औरै कीन्हा प्रभु से झूठा हुआ अनारी ॥
हो सांचा अजहूं सुमिरणकर होहिं दयाल मुरारी ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं आगेहु पतित किये भवपारी ॥