भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
लाहा कछू न किया हासिल योंही उलटा मूल गवांया ॥
श्रीशुकदेव पुकार चितावैं समझत ना केतो समझाया ।
चरणदास कलियुगके माहीं हरिगुण गावन सार बताया ॥
नाहीं रे कोइ हरि बिन तेरो ।
यह जग जाल महा दुखदाई तामें है इक रैनि बसेरो ॥
आनि फँसों मायाके फन्दन मोहममत कीन्हो उरझेरो ।
रंचकहू छुटकारो नाहीं बिषय स्वाद पांचौ ने घेरो ॥
साधु सन्त सों नेह न राखै दारा सुत सम्पति को चेरो ।
अन्तकाल बहुतै पछितैहौ जब मारै यम आय थपेरो ॥
धनके कारण घर घर डोलै पर काजे पचि मरत घनेरो ।
जोरत दाम बामवश ह्वैकै काम क्रोध सों हित बहुतेरो ॥
जो चाहै तू भलो आपनो तौ ह्यां से करु बेगि निबेरो ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं छांड़ि देहि सब विषय बखेरो ॥
राग धनाश्री ॥
अपना हरि बिन और न कोई ।
मात पिता सुत बन्धु कुटुंब सब स्वारथ ही के होई ॥
या कायाको भोग बहुतदै मर्दन करि करि धोई ।
सोभी छूटत नेक नेकसी संगन चाली वोई ॥
घरकी नारि बहुतही प्यारी तिनमें नाहीं दोई ।
जीवत कहती साथ बलूँगी डरपन लागी सोई ॥
जो कहिये यह द्रव्य आपनो जिन उज्ज्वल मति खोई ।
आवत कष्ट रखत रखवारी चलत प्राण ले जोई ॥
इस जगमें कोइ हितू न दीखै मैं समझाऊं तोई ।
चरणदास शुकदेव कहैं यों सुनिलीजौ नर लोई ॥