भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ४०१
राग काफी ॥
कोई दिन जीवै तौ कर गुजरान ।
कहर गरूरी छांड़ दिवाने तजो अकस की बान ॥
चुगुली चोरी अरु निंदालै झूठ कपट अरु कान ।
इनको डारि गहौ जत सतको सोई अधिक सयान ॥
हरिहरि सुमिरौ क्षण नहिं विसरौ गुरु सेवा मनठानि ।
साधुनकी संगतिकर निश दिन आवै ना कुछहानि ॥
मुड़ौ कुमारग चलौ सुमारग पावै निजपुर बास ।
गुरु शुकदेव चेतावैं तोको समझ चरणहींदास ॥
एते पर क्यों हुआ मगरूर ।
क्षणभंगी यह तन बहुरंगी जरिवरि होइहै धूर ॥
मूछ मरोरि चलै वांकी गति अकड़ि अकड़िरहै घूर ।
छैल चिकनियां माया मद में मातो चकनाचूर ।
काम क्रोध के शस्तर बांधे लोभ रह्यो भरि पूर ॥
गुरु को ज्ञान न मनमें आवै ऐसा है बेसहूर ।
करि अभिमान जगत सच मानै हरिको जानै दूर ॥
चरणदास शुकदेव बतावै सांईं सदा हुजूर ॥
राग बिलावल ॥
राम नाम तैं क्यों बिसराया ।
सीखो कपट झपट छल बल बहु कामरु क्रोध मोह लव लाया ॥
चारि दिनाका जगत अचम्भा झूठे सुख में कहा लोभाया ।
क्षण इक सतसंगति नहिं कीन्ही जन्म अकारथ खोयबहाया ॥
वाद विवाद स्वादको चौकस विषय बास रस में लपटाया ।
दया धर्म हिरदय सों भूला परनिन्दा हिंसाको धाया ॥
चौरासीलख योनि भुगुति करि मनुष स्वरूप भाग्यसों पाया ।