भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 444, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ४०५
राग बिहागरा ॥
अरे नर हरिका हेत न जाना ।
उपजाया सुमिरण के काजे तैं कछु औरे ठाना ॥
गर्भमाहिं जिन रक्षा कीन्ही ह्वां खाने को दीन्हा ।
जठर अग्निसों राखि लियो है अँग सम्पूर्ण कीन्हा ॥
बाहर आय बहुत सुधिलीन्ही दशन विना पयप्यायो ।
दांत भये भोजन बहु भांती हितसों तोहिं खिलायो ॥
और दिये सुख नानाविधि के समुझि देख मनमाहीं ।
भूलो फिरत महा गर्वायो तू कछु जानत नाहीं ॥
तव कारण सब कछु प्रभु कीन्हो तू कीन्हा निजकाजा ।
जग व्यौहार पगोही बोलै तोहिं न आवै लाजा ॥
अजहूं चेत उलट हरिसोंहीं जन्म सुफल करु भाई ।
चरणदास शुकदेव कहैं यों सुमिरण है सुखदाई ॥
राग काफी ॥
गुमराही छांड दिवाने मूरख बावरे ।
अतिदुर्लभ है नरदेह भया गुरुदेव शरण तू आवरे ॥
जगजीवन है निशिको स्वप्नो अपनो ह्यां कौन बतावरे ।
तोहिं पांच पचीसने घेरि लियो लखचौरासी भरमावरे॥
बीति गई सो बीति गई अजहूँ मनको समझावरे ।
मोहलोभसों भागिकैत्याग विषय कामक्रोधको धोयबहावरे ॥
शुकदेव कहैं सबही तजिकै मनमोहन सों लवलावरे ।
चरणदास पुकारि चिताय दियो मत चूकै ऐसे दाँवरे ॥
चलाआवै बलावै का द्योस कछू करिले भाई ।
ह्यांसे चलनाहोय अचानकही फिरि पाछे रहै अफसोस॥