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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

३६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भक्ति परापत ताहिसु चरणों आपरै ॥
कहैं गुरू शुकदेव चरणहीं दाससों ।
सब मन्तर शिरमौर सुमिर हरिनांम को ॥
राग काफी ॥
क्या दिखलावै शान यह कुछ थिर न रहैगा ।
दारा सुत अरु माल मुल्कका कहा करै अभिमान ॥
रावण कुम्भकरण हिरणाकुश राजा कर्ण सँभार ।
अर्जुन नकुल भीमसे योधा माटी हुय निदान ॥
क्षणक्षण तेरो तन छीजत है सुंनु मूरुख अज्ञान ।
फिरि पछिताये कहा होयगा जब यम घेरैं आन ॥
विनशैं जल थल रवि शशि तारे सकल सृष्टिकीहानि ।
अजहूँ चेत हेतकरु हरिसों ताहीकी पहिंचानि ॥
नवधाभक्ति साधुकी संगति प्रेम सहित कर ध्यान ।
चरणदास शुकदेव सुमिरले जो चाहौ कल्यान ॥
राम नाम चितलाव अरु सब शोक निवारो ।
सकल बिकल सब मनके टारो निश्चय करि ह्यांआव ॥
तीरथ वर्त सभी फल देवैं राम नाम तुलनाहिं ।
पार लगावन मुक्ति करावन समझि देखु मनमाहिं ॥
पढ़ौ पढ़ावौ भेद न पावौ कछू न लागै हाथ ।
अर्थ विचारौ तौ तुम जानौ कै सन्तनको साथ ॥
उमिरि गवाँवै तुच्छ स्वादन में करि पाँचंन सों भोग ।
अन्तकाल दुख होहिं घनेरे तन मन लिपटैं रोग ॥
लोक परलोक महासुख पावै जो सुमिरै हरिनांम ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं होवैं पूरणकाम ॥

शब्दवर्णन ३६१
राग मालश्री ॥
थिर नहीं रहना है आख़िर मौतनिदान ।
देखत देखत बहुतक बिनशे आवत तुम्हरी बार ।
यतन करौ कोइ नाना विधि के बचै नहीं नरनार ॥
वे योगेश्वर वशकरि मौतै जड़िये वज्र किवाँड़ ।
ह्वै बैठे ज्यों मरना नाहीं माटी ह्वै गये हाड़ ॥
कित गये रावण कुंभकरणसे हरणाकुश शिशुपाल ।
शंकर दियो अमर वर जिनको सोभी खाये काल ॥
यह तन बर्तन कांचकोरे ठत्रक लगे खिलिजाय ।
आज मरै क कोटि वर्षलौं अन्त नहीं ठहराय ॥
बीतत अवधि अलावा आवै छोड़ि जगतकी आस ।
गुरु शुकदेव बतावै तोको समुझु चरणहींदास ॥
क्षणभंगी छलरूप यह तन ऐसारे ।
जाको मौत लगी बहु विधि सों नाना अंग ले बान ।
विष अरु शस्त्र रोग बहुतकहैं और बिघन बहुहान ॥
निश्चय बिनशै बचै न क्योंहीं यत्न किये बहुदान ।
ग्रह नक्षत्र अरु

३६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जो बिछुरैं सो बहुरि न मिलि हैं जो युगजाहिं अनंत ॥
राम सँघाती नेक न बिछुरैं ताहि सँभारत नाहीं ।
अपनी काया सोऊ न अपनी समझि देखु मनमाहीं ॥
चरणदास शुकदेव चितावैं छाँड़ौ जग उरझेरा ।
अमर नगर पहिचान सिदौसी जितकर निश्चल डेरा ॥
जानै कोइ संत सुजान यह जग स्वपना है ॥
स्वप्न कुटुंबी आपा मानै स्वप्ना वैरागी लै ।
स्वप्नै लेना स्वप्नै देना स्वप्नै निर्भयभै ॥
स्वप्नै राजा राज करतहै स्वप्नै योगी योग ।
स्वप्नै दुखिया दुख बहुपावै स्वप्नै भोगी भोग ॥
स्वप्नै शूरा रणमें जूझै स्वप्नै दाता दान ।
स्वप्नै पियसँग पायकजरिया स्वप्न मान अपमान ॥
स्वप्नै ज्ञानी गुरुगम जागै अपना रूप निहारि ।
अज्ञानी सोवत स्वप्ने में डसे अविद्या नारि ॥
चरणदास शुकदेव चितावै स्वप्ना सो सब झूठ ।
अचरज समझ अगाध पुरानी मौन गहौ गहि मूठ ॥
राग ललित ॥
चेत सबेरे चलना बाट । यह सब जानौ झूठा ठाट ॥
जग सरायमें कहा भुलानो । भठियारी के मोह लुभानो ॥
तुझको तौ बहु कोसन जानो । करि हिसाब बनियें की हाट ॥
कुँटुब मित्र कोइ हितू न तेरा । अपने स्वारथ ही को घेरा ॥
ह्यां नहि तेरा निश्चल डेरा । उठिये हूजै वेगि उचाट ॥
चलने की तदबीर न कीन्हीं । खोंटी राह थाह नहिं चीन्हीं ॥
मंजिलों की खरची नहिं लीन्हीं । गाफिल सोवै अजहूँ खाट ॥

शब्दवर्णन । ३६३
मग माहीं ठग बाग लगाये । बहुत मुसाफिर जित परचाये ॥
अरु उनको बिष लड्डू खवाये । मारि लिये स्वादन के घाट ॥
सावधान कोइ हाथ न आये । बचकर चले सो निरभय धाये ॥
उनके छलके पेच न खाये । नेक न लागी तिनको आंट ॥
मन चंचलका घोड़ा कीजै । ध्यान लगाम ताहि मुखदीजै ॥
ह्वै असवार ताहि गहि लीजै । भवसागर का चौड़ा फांट ॥
चरणदास शुकदेव चितावै । अपना जानि तोहिं समझावै ॥
तेरे भले कि बात बतावै । बारबार कहुं तोको डांट ॥
राग आसावरी ॥
गुरु मुख यह जग झूठ लखाया ।
साधसंत अरु वेद कहतहैं और पुराणन गाया ॥
मृगतृष्णा के नीर लोभाना सीपी रूपा जाना ।
फटिक शिलापर पीक परी है मूरुख लाल लोभाना ॥
स्वप्ने में सब ठाट ठटो है कुल नाते परिवारा ।
दृष्टि खुली जब सबही नाशे रहो नहीं आकारा ॥
ताते चेत भजन कर हरिको हां मत मनको पागौ ।
वा घरगये बहुरि नहिं आवै आवागमन न लागौ ॥
या स्वप्नेमें लाभ यही है चरणदास सुखभाखो ।
योगेश्वर जापद मिलिरहिया तुरियाहित चितराखो ॥
राग बरवा ॥
या तनको कुहगर्व करतहै ओला ज्यों गलजावैरे ।
जैसे बर्तन बनो काँचको ठबकलगे बिगसावैरे ॥
झूठ कपट अरु छल बल करिकै खोंटे कर्म कमावैरे ।
बाजीगरके बांदर कीज्यों नाचत नाहिं लजावैरे ॥

३६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जबलौं तेरी देह पराक्रम तबलौं सबन सोहावैरे ।
माय कहै मेरा पूत सपूता नारी हुक्म चलावैरे ॥
पल पल पल पल पलटै काया क्षण क्षण माहिं घटावैरे ।
बालक तरुण होय फिरि बूढ़ा वृद्ध अवस्था आवैरे ॥
तेल फुलेल सुगन्ध उबटनो अम्बर अतर लगावैरे ।
नाना विधिसों पिण्ड सँवारै जरिबरि धूरि समावैरे ॥
वैद हकीम करे बहु औषध पंडित जाप सुनावैरे ।
कोटि यत्न सों बचै न क्योंहीं देवी देव मनावैरे ॥
जिनको तू अपनेकरि जानै दुख में पास न आवैरे ।
कोई झिड़कै कोइ अनखावै कोई नाक चढ़ावैरे ॥
यह गति देखि कुटुँब अपने की इन में मत उरझावैरे ।
जबहीं यमसों पाला परिहै कोई नाहिं छुटावैरे ॥
औसर खोवै परके काजे अपनो मूल गवाँवैरे ।
बिन हरिनाम नहीं छुटकारो वेद पुराण बतावैरे ॥
चेतन रूप बसै घट अन्तर भर्मभूल बिसरावैरे ।
जो टुक ढूंढ़ खोज करि देखै आपेही में पावैरे ॥
जो चाहै चौरासी छूटै आवागमन नशावैरे ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं सतसंगति मनलावैरे ॥
राग बरवा ॥
तनका तनक भरोसा नाहीं काहे करत गुमानारे ।
ठोकर लगे नेकहू चलतै करिहैं प्राण पयानारे ॥
ऐंठ अकड़ सब छोड़ बावरे तेज तमक इतरानारे ।
रंचक जीवन जगत अचम्भा क्षणमाहीं मरजानारे ॥
मैं मैं मैं मैं क्यों करताहै माया माहिं लुभानारे ।

शब्दवर्णन । ३६५
बहु परिवार देखिकै फूली मूरुख मूढ़ अयानारे ॥
टेढ़ो चलै मरोरत मुच्छैं, बिषयबास लपटानारे ।
आपनको ऊंचो करिजानै मातो मद अभिमानारे ॥
पीर फकीर औलिया योगी रहें न राजा रानारे ।
धरणि अकास सूरशशि नाशैं तेरा क्या उनमानारे ॥
ठाढ़े घातकरैं शिरपै यम ताने तीर कमानारे ।
पलक पैंड़पै तकितकिमारैं काल अचानक बानारे ॥
श्वासनिकसि फटि आंखिजाहिं जब कायाजरै निदानारे ।
तोको बांधि नरक लै जैहैं करिहैं अगिनि तपानारे ॥
अजहूं चेत सीखिले गुरुकी करिले ठौर ठिका नारे ।
अमर नगर पहिंचान सिदौसी तब नहिं आवन जानारे ॥
हरिकी भक्ति साधुकी संगति यह मत वेद पुरानारे ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं परम पुरातन ज्ञानारे ॥
राग सोरठै ॥
यह तन बालू का सा डेरा ।
जैसे दामिनि दमक चमकको क्षणनहिं रहत उजेरा ॥
मैड़ी मण्डप मुल्क खजानो अरु परिवार घनेरा ।
सो सब कौतुक सों दीखतहै राम सँभार सबेरा ॥
गज घोड़ा अरु चाकर चेरा आखिर कोई न तेरा ।
जिनके कारण भ्रर्मत डोलै करता मेरा मेरा ॥
थोड़े से जीवनके काजे बहुतक करत बखेरा ।
कालबलीकी खबरि नहीं है करहि अचानक घेरा ॥
कहैं शुकदेव समझ नर भोंदू छांड़ि विषय उरझेरा ।
चरणदास हरिनाम भजन बिन कैसे होय निबेरा ॥

३६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दम का नहीं भरोसारे करिले चलनेका सामान ।
तन पिंजरेसों निकसि जायगो पलमें पक्षी प्रान ॥
चलतै फिरतै सोवत जागत करत खान अरु पान ।
क्षण क्षण क्षण क्षण आयु घटतिहै होत देहकी हान ॥
माल मुलुक अरु सुख सम्पतिमें क्यों हूवां गलतान ।
देखत देखत बिनशि जायगो मति करु मान गुमान ॥
कोई रहन न पावै जगमें यह तू निश्चय जान ।
अजहूं समुझि छांडु कुटिलाई मूरुख नर अज्ञान ॥
टेरि चितावैं ज्ञान बतावैं गीता वेद पुरान ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं रामनाम उरआन ॥
राग काफी ॥
वह बोलता कितगया काया नगरि तजिकै ।
दशदरवाजे ज्योके त्योंहीं कौन राह गयो भजिकै ॥
सूनादेश गाँव भया सूना सूने घरके बासी ।
रूपरंग कछु औरै हूवा देहीभई उदासी ॥
साजन थे सो दुर्जन हूये तनको बांधि निकारा ।
चितासँवारि लिटाकरि तामें ऊपर धरा अँगाारा ॥
ढहगया महल चहलथी जामें मिलिगया माटी माहीं ।
पुत्र कलत्र भाइ अरु बांधव सबही ठोंक जलाई ॥
देखतहीका नाता जगमें मुये संग नहिं कोई ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं हरि बिन मुक्ति न होई ॥
समझौरे भाई लोगो समझौरे हम कहत पुकारे ।
अरे हां नहि रहना करना अन्त पयाना ॥
मोह कुटुंबके औसर खोयो हरिकी सुधि बिसराई ।

शब्दवर्णन । ३६७
दिन धंधे में रैनि नींद में ऐसे आयु गवाँई ॥
आठ पहरकी साठौ घरियां सो तौ बिरथा खोई ।
क्षणइक हरिको नाम न लीन्हो कुशल कहांते होई ॥
बालक था जब खेलत डोला तरुण भया मदमाता ।
वृद्धभये चिन्ता अति उपजी दुखमें कछुन सुहाता ॥
भूलो कहा चेत नर मूरुख काल खड़ो शर सांधे ।
बिषको तीर खैंचिकै मारै आय अचानक बांधे ॥
झूठे जगसे नेह छोड़करि सांचो नाम उचारो ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं अपना भलो बिचारो ॥
राग झँझौटी ॥
समझै नहिं मायाका मतवार ।
भूलिरहो धन धाम कुटुंबमें हरिगुरु दियो बिसार ॥
पाप दुकान लीपि औगुणसों पूंजी रची बिकार ।
कामके दाम क्रोध थैली धरि बैठा हाट पसार ॥
छल कांटे बिच कपट रुपइया निरख तौल निर्धार ।
कर्म ढेर कौड़िनको करिकै गिनि गिनि धरत सुधार ॥
कह लाया कह लै निकसैगा अपने जीव बिचार ।
कोइ दम अचरज देखि तमाशा क्षणइक राम सँभार ॥
नरदेही है लाल अमोलक ताकी लखी न सार ।
अन्त समय ज्यों हारो ज्वारी दोऊ कर चाले झार ॥
यह जग स्वप्ना जान बावरे आखिर यमसों रार ।
भुगतै कष्ट महादुख पावै सो जीवन धिरकार ॥
आवत काल अचानक तोपै कहैं शुकदेव पुकार ।
चरणदास अव राम सुमिरि ले नातर होहै ख्वार ॥

३६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग नट व बिलावल ॥
अरे नर अपनो लाभ विचार ।
श्वास खजानो घटत सदाही ताको बेगि सँभार ॥
जोरि जाय सो बहुरि न आवै खरचै लाख हजार ।
ऐसो रतन अमोलक हीरा तू कर सों मतिडार ॥
सतसंगति में हितचित राखो दुष्टन संग निवार ।
मायाजाल अरु प्रीति कुटुंबकी ताको मन सों बिसार ॥
काम क्रोध अरु मोह लोभसे परबल बड़े बिकार ।
ज्ञान अग्नि अन्तरपर जारो तासे इनको जार ॥
विषय वासना इन्द्रिन के सुख बूड़िरह्यो संसार ।
चरणदास को नाव चढ़ाकै शुकदेव लियो उबार ॥
राग केदारा ॥
रे नर क्यों गवाँवै जनम ।
आयु तेरी बीती जाय नाहिं जानै मरम ॥
जनमपा हरिभजन करिले देहको यही धरम ।
लोक अरु परलोक सुधरै रहै तेरी शरम ॥
भक्तिसम कछु नाहिं दीखै योग यज्ञ तप करम ।
आन धर्म बिचार त्यागो मेट थोथे भरम ॥
चरणदास सतसंग मिलिकै आव हरिकी शरण ।
राम सुखदाई सुमिरि ले वही तारण तरण ॥
राग सोरठ ॥
अरे नर अफल जन्म मत खोरे ।
ज्यों तेलीको बैल फिरत है निशिदिन कोल्हू धोरे ॥
भक्ति बिहीने खर ह्वै आये ढोवत बोझा रोरे ।

सांझभये वाको वाको पति घूरे ऊपर छोरै ॥
भ्रर्मत भ्रर्मत मनुष भयोहै ऊंचे आय चढ़ोरे ।
लख चौरासी योनि भुगुति करि फिर तामें न परोरे ॥
अबके चूके बहु पछितैहौ मान बचन तू मोरे ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं हरिपद सुरति धरोरे ॥
राग बिलावल ॥
अरे नर जन्म पदारथ खोयारे ।
बीती अवधि काल जब आया शीश पकरिकै रोयारे ॥
अब क्या होय कहा बनिआवै माहिं अविद्या सोयारे ।
साधु संग गुरुसेव न चीन्ही तत्त्व ज्ञान नहिं जोयारे ॥
आगे से हरि भक्ति न कीन्ही रसना राम न पोयारे ।
चौरासी यम दंड न छूटै आवागमन का दोयारे ॥
जो कछु किया सोई अब पावो वही लुनौ जो बोयारे ।
साहब सांचा न्याय चुकावो ज्यों का त्योंहीं होयारे ॥
कहूं पुकारे सब सुनि लीजौ चेतिजाव नर लोयारे ।
कहै शुकदेव चरणहींदासा यह मैदान यह गोयारे ॥
राग सारंग व राग नट व राग धनाश्री ॥
नट ज्यों नाचिगये कितने ।
दाता शूर सती सिधि साधक राव रंक जितने ॥
रावण कुम्भकरण से योधा बहुतक कौन गिनै ।
बहुतक इकछत राज करत थे पूजत लोग जिनै ॥
बहुतक भोगी नानाविधिसों करते भोग बिलास ।
बहुतक तपसी वनके वासी तन पर उपजी घास ॥
बहुतक ऋषि मुनि दुर्बासासे देते अडिग शराप ।

४०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बहुतक ज्ञानी हरि है बैठे कहते आपहि आप ॥
हमहूं याचक नाचन आये यह नहिं अपना देश ।
चरणदास शुकदेव दया सों फिर नहिं काछूं भेश ॥
नट ज्यों नाचहि नाचिगये ।
तिन तिन भेश धरो जगमाहीं सो सो नाहिं रहे ॥
बहुतक स्वांग धरो राजा को बहुतक रङ्क भये ।
बहुतक भूप करणसे हुये कंचन दानदये ॥
बहुतक स्वांग सती के आये है गये अगिनमये ।
बहुतक चुण्डत मुण्डत योगी गुफा बनाय छये ॥
भीषम अरु द्रोणाचारज से शूरा बहुत ढये ।
रणसों पीठिदई नहिं कबहूं सन्मुख बाणलये ॥
बहुत यती सिधि है है बैठे लोगन चरण गहे ।
बहुतक कामी चतुर सयाने काम मुतास वहे ॥
उत्तम मध्यम काछ कछे हैं नाना स्वांग मचे ।
चरणदास शुकदेव दया सों प्रेमी होय नचे ॥
राग सारंग ॥
दुनिया मगन भये धन धाम ।
लालच मोह कुटुँबके पागे बिसरि गये हरिनाम ॥
एक घरी छुटकारो नाहीं बँधिरहे आठौयाम ।
पांच प्रहर धंधेमें माते तीन प्रहर सँग बाम ॥
फूले फिरत महा गर्बाये पवन भरे ये चाम ।
दीप कलश ज्यों बिनशि जायगो या तनको यहि काम ॥
साधु संग गुरुसेव न कीन्ही सुमिरे ना श्रीराम ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं कैसे पावों ठाम ॥

शब्दवर्णन । ४०१
राग काफी ॥
कोई दिन जीवै तौ कर गुजरान ।
कहर गरूरी छांड़ दिवाने तजो अकस की बान ॥
चुगुली चोरी अरु निंदालै झूठ कपट अरु कान ।
इनको डारि गहौ जत सतको सोई अधिक सयान ॥
हरिहरि सुमिरौ क्षण नहिं विसरौ गुरु सेवा मनठानि ।
साधुनकी संगतिकर निश दिन आवै ना कुछहानि ॥
मुड़ौ कुमारग चलौ सुमारग पावै निजपुर बास ।
गुरु शुकदेव चेतावैं तोको समझ चरणहींदास ॥
एते पर क्यों हुआ मगरूर ।
क्षणभंगी यह तन बहुरंगी जरिवरि होइहै धूर ॥
मूछ मरोरि चलै वांकी गति अकड़ि अकड़िरहै घूर ।
छैल चिकनियां माया मद में मातो चकनाचूर ।
काम क्रोध के शस्तर बांधे लोभ रह्यो भरि पूर ॥
गुरु को ज्ञान न मनमें आवै ऐसा है बेसहूर ।
करि अभिमान जगत सच मानै हरिको जानै दूर ॥
चरणदास शुकदेव बतावै सांईं सदा हुजूर ॥
राग बिलावल ॥
राम नाम तैं क्यों बिसराया ।
सीखो कपट झपट छल बल बहु कामरु क्रोध मोह लव लाया ॥
चारि दिनाका जगत अचम्भा झूठे सुख में कहा लोभाया ।
क्षण इक सतसंगति नहिं कीन्ही जन्म अकारथ खोयबहाया ॥
वाद विवाद स्वादको चौकस विषय बास रस में लपटाया ।
दया धर्म हिरदय सों भूला परनिन्दा हिंसाको धाया ॥
चौरासीलख योनि भुगुति करि मनुष स्वरूप भाग्यसों पाया ।

४०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
लाहा कछू न किया हासिल योंही उलटा मूल गवांया ॥
श्रीशुकदेव पुकार चितावैं समझत ना केतो समझाया ।
चरणदास कलियुगके माहीं हरिगुण गावन सार बताया ॥
नाहीं रे कोइ हरि बिन तेरो ।
यह जग जाल महा दुखदाई तामें है इक रैनि बसेरो ॥
आनि फँसों मायाके फन्दन मोहममत कीन्हो उरझेरो ।
रंचकहू छुटकारो नाहीं बिषय स्वाद पांचौ ने घेरो ॥
साधु सन्त सों नेह न राखै दारा सुत सम्पति को चेरो ।
अन्तकाल बहुतै पछितैहौ जब मारै यम आय थपेरो ॥
धनके कारण घर घर डोलै पर काजे पचि मरत घनेरो ।
जोरत दाम बामवश ह्वैकै काम क्रोध सों हित बहुतेरो ॥
जो चाहै तू भलो आपनो तौ ह्यां से करु बेगि निबेरो ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं छांड़ि देहि सब विषय बखेरो ॥
राग धनाश्री ॥
अपना हरि बिन और न कोई ।
मात पिता सुत बन्धु कुटुंब सब स्वारथ ही के होई ॥
या कायाको भोग बहुतदै मर्दन करि करि धोई ।
सोभी छूटत नेक नेकसी संगन चाली वोई ॥
घरकी नारि बहुतही प्यारी तिनमें नाहीं दोई ।
जीवत कहती साथ बलूँगी डरपन लागी सोई ॥
जो कहिये यह द्रव्य आपनो जिन उज्ज्वल मति खोई ।
आवत कष्ट रखत रखवारी चलत प्राण ले जोई ॥
इस जगमें कोइ हितू न दीखै मैं समझाऊं तोई ।
चरणदास शुकदेव कहैं यों सुनिलीजौ नर लोई ॥

शब्दवर्णन । ४०३
राग कान्हरा ॥
हरि बिन कौन तुम्हारो मीता ।
कुटुँब सँघाती स्वारथ लागे तेरी काहूको नहिं चीता ॥
तैं प्रभु ओरी सों मुख मोड़ा झूठे लोगन सों हितकीता ।
अरु तैं अपनी आंखों देखा कई बार दुख सुख हो बीता ॥
सम्पतिमें सबही घिरि आवैं विपतिपरे अधिकी दुखदीता ।
मूटी बांधि जनम नर लायो हाथ पसारि चलैगो रीता ॥
धरि धरि स्वांग फिरे तिनकारण कपि ज्यों नाचत ताताधीता ।
मुये न संगी होहिं तिहारे बाँधि जलावैं देह पलीता ॥
गुरुसेवा सतसंग न कीन्हीं कनक कामिनी सों करि प्रीता ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं मरत मरत हरिनाम न लीता ॥
राग रामकली ॥
धनि धनि वे नर हरि शरणाये ।
और पशुन सों सबही नीचे परमारथ के काम न आये ॥
अचरज मनुषा देही दुर्लभ बड़भाग्यान सों पाई ।
तीनोंपन में नाहिं सँभारी झूठे धंधे योंहिं गँवाई ॥
बालापन खेलन में खोया तरुण भया सँगनारी ।
बूढ़ाभये कुटुंब के संशय पावतहै अतिही दुखभारी ॥
जिन कारण तैं पाप कमाये सो नहिं चलि हैं लारी ।
तेरेही शिर आनिपरैगी जैहो अकेले नरक मँझारी ॥
गर्भ माहिं तैं बचन किये थे करिहौं भक्ति तुम्हारी ।
इहां आके कछु औरै कीन्हा प्रभु से झूठा हुआ अनारी ॥
हो सांचा अजहूं सुमिरणकर होहिं दयाल मुरारी ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं आगेहु पतित किये भवपारी ॥

४०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
फिर फिर मूरुख जन्म गँवायो ।
हरिकी भक्ति साधुकी संगति गुरुकेचरणनमेंनहिंआयौ॥
धनके जोरन को दृढ़ कीन्हो महल करन व्रतधारो ।
टेकपकड़ कर नारी सेई शिरपर बोझ लियो अतिभारो॥
हैहै दुख नानाविधि केरे तन मन रोग बढ़ायो ।
जीवत मरतनहीं सुखपैहौ आवागमनको बीजजगायो ॥
भर्मि भर्मि चौरासी आयो मनुषा देही पाई ।
यातनकी कछुसार न जानी फिरि आगे चौरासी आई ॥
आंखि उघारि समुझ मनमाहीं हिरदय करौ बिचारा ।
ऐसा जन्म बहुरि कब पैहौ बिरथा खोवै जग व्यवहारा ॥
जानौगे जग छांड़ि चलौगे कोइ न संग तुम्हारे ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं याद करौगे बचन हमारे ॥
राग बिहाग ॥
रे नर हरि प्रताप ना जाना ।
तुवकारण सबकछुतिन कीन्हा सो करता न पिछाना ॥
जिहिप्रताप तेरिसुन्दरि काया हाथ पाँव मुखनासा ।
नैन दिये जासों सब सूझै होय रहा परकासा ॥
जिहि प्रताप नानाविधि भोजन वस्त्र अभूषण धारै ।
वाकानाहिं निहोरा मानै ताको नाहिं सँभारै ॥
जिहि प्रताप तू भूप भयो है भोग करै मनमानै ।
सुखलै वाको भूलि गयो है करि करि बहु अभिमानै ॥
अधिकी प्यार करै मातोसों पल पल में सुधि लेवै ।
तूतौ पीठि दियेही नितही सुमिरण सुरति न देवै ॥
कृत्यघनी औ नूनहरामी न्याव इँसाफ न तेरे ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं अजहूं चेत सबेरे ॥

शब्दवर्णन । ४०५
राग बिहागरा ॥
अरे नर हरिका हेत न जाना ।
उपजाया सुमिरण के काजे तैं कछु औरे ठाना ॥
गर्भमाहिं जिन रक्षा कीन्ही ह्वां खाने को दीन्हा ।
जठर अग्निसों राखि लियो है अँग सम्पूर्ण कीन्हा ॥
बाहर आय बहुत सुधिलीन्ही दशन विना पयप्यायो ।
दांत भये भोजन बहु भांती हितसों तोहिं खिलायो ॥
और दिये सुख नानाविधि के समुझि देख मनमाहीं ।
भूलो फिरत महा गर्वायो तू कछु जानत नाहीं ॥
तव कारण सब कछु प्रभु कीन्हो तू कीन्हा निजकाजा ।
जग व्यौहार पगोही बोलै तोहिं न आवै लाजा ॥
अजहूं चेत उलट हरिसोंहीं जन्म सुफल करु भाई ।
चरणदास शुकदेव कहैं यों सुमिरण है सुखदाई ॥
राग काफी ॥
गुमराही छांड दिवाने मूरख बावरे ।
अतिदुर्लभ है नरदेह भया गुरुदेव शरण तू आवरे ॥
जगजीवन है निशिको स्वप्नो अपनो ह्यां कौन बतावरे ।
तोहिं पांच पचीसने घेरि लियो लखचौरासी भरमावरे॥
बीति गई सो बीति गई अजहूँ मनको समझावरे ।
मोहलोभसों भागिकैत्याग विषय कामक्रोधको धोयबहावरे ॥
शुकदेव कहैं सबही तजिकै मनमोहन सों लवलावरे ।
चरणदास पुकारि चिताय दियो मत चूकै ऐसे दाँवरे ॥
चलाआवै बलावै का द्योस कछू करिले भाई ।
ह्यांसे चलनाहोय अचानकही फिरि पाछे रहै अफसोस॥

४०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पीकै विषय की मदिरा मतवारा होय रहा बेहोस ।
बाटमाहिं तौ शूल बबूलघने अरु जाना है कह कोस ॥
दमहीं दमहीं दम छीजतहै पलपल घटै तनजोस ।
माया मोह कुटुंबका सुख ऐसे जैसे दीखै मोती ओस ॥
शुकदेव दियो कृपा करिकै रामरसका प्याला नोस ।
चरणदास कहैं यहबात भलीं सुनिलैजै दोनों गोस ॥
राग सोरठ ॥
कछु मन तुम सुधिराखो वा दिनकी ।
जादिन तेरी देह छुटैगी ठौर बसौगे बनकी ॥
जिनके संग बहुत सुख कीन्हे मुख ढकि होयहैं न्यारे ।
यमको त्रास होय बहुभांती कौन छुटावनहारे ॥
देहरीलौं तेरी नारि चलैगी बड़ी पौरिलौं माई ।
मरघटलौं सबबीर भतीजे हंस अकेलो जाई ॥
द्रव्य गड़े अरु महल खड़ेही पूरतहैं घरमाहीं ।
जिनके काज पचे दिनराती सो सँग चालत नाहीं ॥
देव पितर तेरे काम न आवैं जिनकी सेवालावैं ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं हरि बिन मुक्ति न पावैं ॥
मोको भय अति वाही दिनको ।
जब वह पक्षी माया लोभी त्यागै पिंजरा तनको ॥
सुत दारा के मोह फँसो है लोभ लगो है धनको ।
काम क्रोधको कांपा खायो भयो अधीन सबनको ॥
पांच पहर धन्धे में खोया नाम न लेत भजनको ।
तीनि पहर नारी सँग मातो मानत सुख इन्द्रिनको ॥
आपन को ऊंचो करिजानै करि अभिमान बरनको ।

शब्दवर्णन । ४०७
सतसंगतिके निकट न आवै जोहै ठाट तरनको ॥
यमकिंकर जब आनि गहैंगे तब ना धीर धरनको ।
गुरु शुकदेव सहाय करेंगे आसरो दास चरनको ॥
राग केदारा ॥
सो मेरो कहो मानरे भाई ।
ज्ञान गुरूको राख हिये में बंध कटि जाई ॥
बालपनते खेलि खोयो गई तरुणाई ।
चेत अजहूँ भली बरहै जराहूं आई ॥
जिनके कारण बिमुख हरिते फिरत भटकाई ।
कुटुम्ब सबही सुख के लोभी तेरे दुखदाई ॥
साधु पदवी धारणाधर छांड़ कुटिलाई ।
वासना तजि भोग जगके होय मुकताई ॥
बहुरि योनी नाहिं आवै परमपद पाई ।
चरणदास शुकदेवके घर आनँद अधिकाई ॥
भाईरे अवधि बीतीजात ।
अंजली जल घटत जैसे तारे ज्यों परभात ॥
श्वास पूंजी गांठि तेरे सो घटत दिन रात ।
साधु संगत पैंठ लागी ले लगै सोइ हाथ ॥
बड़ो सौदा हरि सँभारो सुमिरिलीजै प्रात ।
काम क्रोध दलाल ठगिया बणिजमत इनसाथ ॥
लोभ मोह बजाज छलिया लगैंहैं तेरि घात ।
शब्द गुरुको राखि हिरदय तौ दगा नहिं खात ॥
अपनी चतुराई बुधि पर मति फिरै इतरात ।
चरणदास शुकदेव चरण परश तजि कुलजात ॥

४०८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग सोरठ ॥
भाईरे स्वपन यह संसार ।
देह स्वप्ना जन्म स्वप्ना स्वपन कुल ब्योहार ॥
माय स्वप्ना बाप स्वप्ना स्वपन सुत अरु नारि ।
लाज स्वप्ना जाति स्वप्ना स्वपन अस्तुति गारि ॥
योग स्वप्ना भोग स्वप्ना कियो वेद निषेद् ।
स्वप्न सो जो होय मिटि है स्वप्न सुख अरु खेद ॥
बन्ध स्वप्ना मुक्ति स्वप्ना स्वप्न ज्ञान विचार ।
स्वपन है सो बिनशि जैहै रहैगो ततसार ॥
चरणदास स्वप्ना ब्रह्म सांचो एक रस नित ज्ञान ।
सत्य स्वप्ना झूठ स्वप्ना कहाकरूं निर्बान ॥
भाई रे तजौ जग जंजाल ।
संग तेरे नाहिं चालै महल बाहन माल ॥
मात पितु सुत और नारी बोल मीठे बैन ।
डारि फांसी मोहकी तोहिं ठगत हैं दिनरैन ॥
छलधतूरो दियो सब मिलि लाज लड्डू माहिं ।
जान अपने कह भुलानो चेतता क्यों नाहि ॥
बाज जैसे चिड़ी ऊपर भँवत तोपर काल ।
मारतै गहि लै चलैंगे यम सरीखे साल ॥
सदा सँघाती हरि बिसारो जन्म दीन्हो हार ।
चरणदास शुकदेव कहिया समझ मूढ़ गंवार ॥
भाई रे समझ जग ब्योहार ।
जबताईं तेरे धन पराक्रम करै सबही प्यार ॥
अपने सुखको सबहि चाहैं मित्र सुत अरु नारि ।
इन्हौं तौ अपवश कियो है मोह बेड़ी डारि ॥

शब्दवर्णन । ४०६
सबन तोकों भय दिखायो लाज लकुटीमार ।
बाजीगर के बांदरा ज्यों फिरत घर घर द्वार ॥
जबै तोको बिपति आवै जरा कोर बिकार ।
तबै तोसूं लाज मानैं करैं ना तेरि सार ॥
इनकि संगति सदा दुख है समझ मूढ़ गवाँर ।
हरि प्रियतम को सुमिरिले कहैं चरणदास पुकार ॥
राग विहाग ॥
ये सब अप स्वारथ के गरजी ।
जगमें हेत न कीजै काहूसों अपने मनको बरजी ॥
रोपें फन्द घात बहु डारें इनते तू डरयेजी ।
हृदय कपट बाहर मिठबोलैं यह छल हैगो कहजी ॥
सौगँद खाय झूठ बहु बोलैं भवसागर कैसे तरजी ।
दुख सुख दर्द दया नहिं बूझें इनसे छुटावो हरिजी ॥
वैरी मित्र सबै चुनिदेखे दिलके महरम कहजी ।
इनको दोष कहा कह दीजै यह कलियुगकी झरजी ॥
दुनियाभगल कुटिलबहु खोटी देखिछातीमेरी लरजी ।
चरणदास इनको तजि दीजै चल बस अपने घरजी ॥
राग आसावरी ॥
साधो राम भजेते सुखिया ।
राजा परजा नेमी दाता सबही देखे दुखिया ॥
जो कोई धनवंत जगतमें राखत लाख हजारा ।
उनको तौ संशयहै निशिदिन घटत बढ़त व्योहारा ॥
जिनके बहुसुत नाती कहिये और कुटुँब परिवारा ।
वें तौ जीवन मरणके काजे भरतरहैं दुखभारा ॥
नेमी नेम करत दुख पावै कर अस्नान सबेरा ।