भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भक्ति परापत ताहिसु चरणों आपरै ॥
कहैं गुरू शुकदेव चरणहीं दाससों ।
सब मन्तर शिरमौर सुमिर हरिनांम को ॥
राग काफी ॥
क्या दिखलावै शान यह कुछ थिर न रहैगा ।
दारा सुत अरु माल मुल्कका कहा करै अभिमान ॥
रावण कुम्भकरण हिरणाकुश राजा कर्ण सँभार ।
अर्जुन नकुल भीमसे योधा माटी हुय निदान ॥
क्षणक्षण तेरो तन छीजत है सुंनु मूरुख अज्ञान ।
फिरि पछिताये कहा होयगा जब यम घेरैं आन ॥
विनशैं जल थल रवि शशि तारे सकल सृष्टिकीहानि ।
अजहूँ चेत हेतकरु हरिसों ताहीकी पहिंचानि ॥
नवधाभक्ति साधुकी संगति प्रेम सहित कर ध्यान ।
चरणदास शुकदेव सुमिरले जो चाहौ कल्यान ॥
राम नाम चितलाव अरु सब शोक निवारो ।
सकल बिकल सब मनके टारो निश्चय करि ह्यांआव ॥
तीरथ वर्त सभी फल देवैं राम नाम तुलनाहिं ।
पार लगावन मुक्ति करावन समझि देखु मनमाहिं ॥
पढ़ौ पढ़ावौ भेद न पावौ कछू न लागै हाथ ।
अर्थ विचारौ तौ तुम जानौ कै सन्तनको साथ ॥
उमिरि गवाँवै तुच्छ स्वादन में करि पाँचंन सों भोग ।
अन्तकाल दुख होहिं घनेरे तन मन लिपटैं रोग ॥
लोक परलोक महासुख पावै जो सुमिरै हरिनांम ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं होवैं पूरणकाम ॥