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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 433, कुल 690 में से

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पृष्ठ 433

३६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जबलौं तेरी देह पराक्रम तबलौं सबन सोहावैरे ।
माय कहै मेरा पूत सपूता नारी हुक्म चलावैरे ॥
पल पल पल पल पलटै काया क्षण क्षण माहिं घटावैरे ।
बालक तरुण होय फिरि बूढ़ा वृद्ध अवस्था आवैरे ॥
तेल फुलेल सुगन्ध उबटनो अम्बर अतर लगावैरे ।
नाना विधिसों पिण्ड सँवारै जरिबरि धूरि समावैरे ॥
वैद हकीम करे बहु औषध पंडित जाप सुनावैरे ।
कोटि यत्न सों बचै न क्योंहीं देवी देव मनावैरे ॥
जिनको तू अपनेकरि जानै दुख में पास न आवैरे ।
कोई झिड़कै कोइ अनखावै कोई नाक चढ़ावैरे ॥
यह गति देखि कुटुँब अपने की इन में मत उरझावैरे ।
जबहीं यमसों पाला परिहै कोई नाहिं छुटावैरे ॥
औसर खोवै परके काजे अपनो मूल गवाँवैरे ।
बिन हरिनाम नहीं छुटकारो वेद पुराण बतावैरे ॥
चेतन रूप बसै घट अन्तर भर्मभूल बिसरावैरे ।
जो टुक ढूंढ़ खोज करि देखै आपेही में पावैरे ॥
जो चाहै चौरासी छूटै आवागमन नशावैरे ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं सतसंगति मनलावैरे ॥
राग बरवा ॥
तनका तनक भरोसा नाहीं काहे करत गुमानारे ।
ठोकर लगे नेकहू चलतै करिहैं प्राण पयानारे ॥
ऐंठ अकड़ सब छोड़ बावरे तेज तमक इतरानारे ।
रंचक जीवन जगत अचम्भा क्षणमाहीं मरजानारे ॥
मैं मैं मैं मैं क्यों करताहै माया माहिं लुभानारे ।