भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 438, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंसांझभये वाको वाको पति घूरे ऊपर छोरै ॥
भ्रर्मत भ्रर्मत मनुष भयोहै ऊंचे आय चढ़ोरे ।
लख चौरासी योनि भुगुति करि फिर तामें न परोरे ॥
अबके चूके बहु पछितैहौ मान बचन तू मोरे ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं हरिपद सुरति धरोरे ॥
राग बिलावल ॥
अरे नर जन्म पदारथ खोयारे ।
बीती अवधि काल जब आया शीश पकरिकै रोयारे ॥
अब क्या होय कहा बनिआवै माहिं अविद्या सोयारे ।
साधु संग गुरुसेव न चीन्ही तत्त्व ज्ञान नहिं जोयारे ॥
आगे से हरि भक्ति न कीन्ही रसना राम न पोयारे ।
चौरासी यम दंड न छूटै आवागमन का दोयारे ॥
जो कछु किया सोई अब पावो वही लुनौ जो बोयारे ।
साहब सांचा न्याय चुकावो ज्यों का त्योंहीं होयारे ॥
कहूं पुकारे सब सुनि लीजौ चेतिजाव नर लोयारे ।
कहै शुकदेव चरणहींदासा यह मैदान यह गोयारे ॥
राग सारंग व राग नट व राग धनाश्री ॥
नट ज्यों नाचिगये कितने ।
दाता शूर सती सिधि साधक राव रंक जितने ॥
रावण कुम्भकरण से योधा बहुतक कौन गिनै ।
बहुतक इकछत राज करत थे पूजत लोग जिनै ॥
बहुतक भोगी नानाविधिसों करते भोग बिलास ।
बहुतक तपसी वनके वासी तन पर उपजी घास ॥
बहुतक ऋषि मुनि दुर्बासासे देते अडिग शराप ।