भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३६७
दिन धंधे में रैनि नींद में ऐसे आयु गवाँई ॥
आठ पहरकी साठौ घरियां सो तौ बिरथा खोई ।
क्षणइक हरिको नाम न लीन्हो कुशल कहांते होई ॥
बालक था जब खेलत डोला तरुण भया मदमाता ।
वृद्धभये चिन्ता अति उपजी दुखमें कछुन सुहाता ॥
भूलो कहा चेत नर मूरुख काल खड़ो शर सांधे ।
बिषको तीर खैंचिकै मारै आय अचानक बांधे ॥
झूठे जगसे नेह छोड़करि सांचो नाम उचारो ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं अपना भलो बिचारो ॥
राग झँझौटी ॥
समझै नहिं मायाका मतवार ।
भूलिरहो धन धाम कुटुंबमें हरिगुरु दियो बिसार ॥
पाप दुकान लीपि औगुणसों पूंजी रची बिकार ।
कामके दाम क्रोध थैली धरि बैठा हाट पसार ॥
छल कांटे बिच कपट रुपइया निरख तौल निर्धार ।
कर्म ढेर कौड़िनको करिकै गिनि गिनि धरत सुधार ॥
कह लाया कह लै निकसैगा अपने जीव बिचार ।
कोइ दम अचरज देखि तमाशा क्षणइक राम सँभार ॥
नरदेही है लाल अमोलक ताकी लखी न सार ।
अन्त समय ज्यों हारो ज्वारी दोऊ कर चाले झार ॥
यह जग स्वप्ना जान बावरे आखिर यमसों रार ।
भुगतै कष्ट महादुख पावै सो जीवन धिरकार ॥
आवत काल अचानक तोपै कहैं शुकदेव पुकार ।
चरणदास अव राम सुमिरि ले नातर होहै ख्वार ॥