भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 431, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें३६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जो बिछुरैं सो बहुरि न मिलि हैं जो युगजाहिं अनंत ॥
राम सँघाती नेक न बिछुरैं ताहि सँभारत नाहीं ।
अपनी काया सोऊ न अपनी समझि देखु मनमाहीं ॥
चरणदास शुकदेव चितावैं छाँड़ौ जग उरझेरा ।
अमर नगर पहिचान सिदौसी जितकर निश्चल डेरा ॥
जानै कोइ संत सुजान यह जग स्वपना है ॥
स्वप्न कुटुंबी आपा मानै स्वप्ना वैरागी लै ।
स्वप्नै लेना स्वप्नै देना स्वप्नै निर्भयभै ॥
स्वप्नै राजा राज करतहै स्वप्नै योगी योग ।
स्वप्नै दुखिया दुख बहुपावै स्वप्नै भोगी भोग ॥
स्वप्नै शूरा रणमें जूझै स्वप्नै दाता दान ।
स्वप्नै पियसँग पायकजरिया स्वप्न मान अपमान ॥
स्वप्नै ज्ञानी गुरुगम जागै अपना रूप निहारि ।
अज्ञानी सोवत स्वप्ने में डसे अविद्या नारि ॥
चरणदास शुकदेव चितावै स्वप्ना सो सब झूठ ।
अचरज समझ अगाध पुरानी मौन गहौ गहि मूठ ॥
राग ललित ॥
चेत सबेरे चलना बाट । यह सब जानौ झूठा ठाट ॥
जग सरायमें कहा भुलानो । भठियारी के मोह लुभानो ॥
तुझको तौ बहु कोसन जानो । करि हिसाब बनियें की हाट ॥
कुँटुब मित्र कोइ हितू न तेरा । अपने स्वारथ ही को घेरा ॥
ह्यां नहि तेरा निश्चल डेरा । उठिये हूजै वेगि उचाट ॥
चलने की तदबीर न कीन्हीं । खोंटी राह थाह नहिं चीन्हीं ॥
मंजिलों की खरची नहिं लीन्हीं । गाफिल सोवै अजहूँ खाट ॥