भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग नट व बिलावल ॥
अरे नर अपनो लाभ विचार ।
श्वास खजानो घटत सदाही ताको बेगि सँभार ॥
जोरि जाय सो बहुरि न आवै खरचै लाख हजार ।
ऐसो रतन अमोलक हीरा तू कर सों मतिडार ॥
सतसंगति में हितचित राखो दुष्टन संग निवार ।
मायाजाल अरु प्रीति कुटुंबकी ताको मन सों बिसार ॥
काम क्रोध अरु मोह लोभसे परबल बड़े बिकार ।
ज्ञान अग्नि अन्तरपर जारो तासे इनको जार ॥
विषय वासना इन्द्रिन के सुख बूड़िरह्यो संसार ।
चरणदास को नाव चढ़ाकै शुकदेव लियो उबार ॥
राग केदारा ॥
रे नर क्यों गवाँवै जनम ।
आयु तेरी बीती जाय नाहिं जानै मरम ॥
जनमपा हरिभजन करिले देहको यही धरम ।
लोक अरु परलोक सुधरै रहै तेरी शरम ॥
भक्तिसम कछु नाहिं दीखै योग यज्ञ तप करम ।
आन धर्म बिचार त्यागो मेट थोथे भरम ॥
चरणदास सतसंग मिलिकै आव हरिकी शरण ।
राम सुखदाई सुमिरि ले वही तारण तरण ॥
राग सोरठ ॥
अरे नर अफल जन्म मत खोरे ।
ज्यों तेलीको बैल फिरत है निशिदिन कोल्हू धोरे ॥
भक्ति बिहीने खर ह्वै आये ढोवत बोझा रोरे ।